नज़रिया: गठबंधन की राजनीति और निजी महत्वाकांक्षा की 'माया'

  • 20 जून 2018
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मंच पर माथे से माथा जोड़कर खड़ी सोनिया गांधी और मायावती की तस्वीर आपको याद होगी, महागठबंधन के साझीदारों की आपसी मेल-मोहब्बत की जीवंत तस्वीर.

लेकिन उसके कुछ ही दिन बाद मध्य प्रदेश में अकेले और सभी 230 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान करके मायावती ने महागठबंधन की उम्मीदों को संदेह के दायरे में ला दिया है.

मध्य प्रदेश में डेढ़ दशक पहले सत्ता से बेदखल हो चुकने के बाद इस बार सत्ता में लौटने को आतुर दिख रही कांग्रेस की ओर से पिछले कुछ दिनों से दावा किया जा रहा था कि बसपा के साथ चुनावी गठबंधन की बातचीत जारी है और जल्दी ही सब कुछ तय हो जाएगा.

इस आशय के संकेत ख़ुद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ और प्रदेश चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया की ओर से भी दिए गए थे.

बसपा के ताज़ा बयान से जहाँ कांग्रेस की उम्मीदों को फ़िलहाल झटका लगा है, वहीं भाजपा ने निश्चित ही फौरी तौर पर राहत महसूस की होगी. भाजपा की पूरी कोशिश होगी कि बसपा अंत तक अपने इसी फ़ैसले पर कायम रहे और अकेले ही चुनाव मैदान में उतरे.

गुजरात और कर्नाटक में भी बसपा का कांग्रेस से तालमेल नहीं हुआ था, जिसका फ़ायदा भाजपा को ही मिला था. गुजरात में बसपा अकेले लड़ी थी और कर्नाटक में उसने जनता दल (एस) के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था.

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बसपा का जनाधार और उसकी क्षमता

वैसे तो बसपा का मुख्य जनाधार उत्तर प्रदेश में ही है, लेकिन उत्तर भारत के अन्य हिंदीभाषी राज्यों में भी उसका इतना जनाधार तो है ही कि वह ख़ुद भले न जीते, हार जीत की संभावनाओं को प्रभावित कर सकती है.

ऐसे राज्यों में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ, पंजाब, उत्तराखंड, हरियाणा और दिल्ली आते हैं. इसके अलावा गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे खासी दलित आबादी वाले सूबों में भी उसका ठीक-ठाक जनाधार है.

इस साल के अंत में चार राज्यों में विधानसभा चुनाव होना है उनमें मिज़ोरम को छोड़कर, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में दलित वोट एक फ़ैक्टर है. इन तीनों ही राज्यों में बसपा अपने सीमित जनाधार के बूते भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है.

मध्य प्रदेश में 15, राजस्थान में 17 और छत्तीसगढ में 11 फ़ीसदी दलित आबादी है. इन तीनों ही सूबों में बसपा अभी तक हर चुनाव में अकेले ही मैदान में उतरती रही है.

पार्टी का प्रदर्शन

मध्य प्रदेश में बसपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में 6 फ़ीसद वोट शेयर के साथ चार सीटों पर जीत हासिल की थी. उससे पहले के तीन विधानसभा चुनावों के मुकाबले यह उसका सबसे कमज़ोर प्रदर्शन था. 1998 के विधानसभा चुनाव में उसने 6 फ़ीसदी वोटों के साथ 11 सीटें जीती थीं जो कि उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था.

राजस्थान में भी वह 2008 के विधानसभा चुनाव में 7 फ़ीसदी वोटों के साथ 6 सीटें जीतने में कामयाब रही थी, जहां तक छत्तीसगढ की बात है, वहां उसे कभी उल्लेखनीय कामयाबी तो नहीं मिली, लेकिन वह हर चुनाव में चार से पांच फ़ीसदी वोट ज़रूर हासिल करती रही है.

हालांकि मध्य प्रदेश में बसपा की ओर से गठबंधन न करने के फ़ैसले का ऐलान उसकी प्रदेश इकाई के अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद अहिरवार ने किया है, लिहाजा इसे अंतिम फ़ैसला नहीं माना जा सकता क्योंकि बसपा में तालमेल या गठबंधन करने-तोड़ने अथवा किसी पार्टी को समर्थन देने या न देने का अंतिम फ़ैसला सिर्फ़ पार्टी की सुप्रीमो मायावती ही करती हैं.

पार्टी की इस रीति-नीति को देखते हुए समझा जा सकता है कि प्रादेशिक नेतृत्व ने यह दो-टूक ऐलान पार्टी सुप्रीमो की सहमति या उनके निर्देश पर ही किया होगा. बसपा के बारे में यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है कि गठबंधन की राजनीति में दूसरी पार्टियों से अपनी शर्तें मनवाने, भरपूर मोलभाव करने और साझीदार दलों से अपने जनाधार के समर्थन की भरपूर क़ीमत वसूलने में इस पार्टी का कोई सानी नहीं है.

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रणनीति

प्रदेश अध्यक्ष से कराई गई घोषणा के पीछे मायावती की मोलभाव करने और अपनी पार्टी के लिए अधिकतम सीटें हासिल करने की रणनीति दिखती है.

दरअसल, मायावती इस बात को अच्छी तरह समझती हैं कि चुनावी राजनीति के लिहाज से कांग्रेस इस समय अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है, संख्या के लिहाज से वह लोकसभा में ही दयनीय स्थिति में नहीं है, बल्कि देश के अधिकतर राज्यों में भी एक-एक करके वह सत्ता से बेदखल हो चुकी है.

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ में भी वह पिछले डेढ़ दशक से सत्ता से बाहर है, राजस्थान में भी इस समय वह विपक्ष में है. मायावती इस हक़ीक़त को भी जानती हैं कि पिछले चार वर्षों के दौरान हर तरफ़ से लुटी-पिटी कांग्रेस के लिए अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले इन तीनों राज्यों के चुनाव जीवन-मरण से जुडे हैं.

अगर इन राज्यों में तमाम प्रतिकूल स्थितियों के बावजूद भाजपा फिर सत्ता में लौट आती है तो लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की सारी संभावनाएं लगभग ख़त्म हो जाएंगी, इसी हक़ीक़त को समझते-बूझते हुए मायावती अपनी रणनीति बुन रही हैं. उन्हें लगता है कि यही मौका है जब वह कांग्रेस को ज़्यादा से ज़्यादा झुका कर उससे अपनी पार्टी के लिए अधिकतम सीटें ले सकती हैं.

चुनावी राजनीति में अपनी पार्टी के जनाधार की ताक़त और अहमियत का एहसास मायावती पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में तीन संसदीय सीटों गोरखपुर, फूलपुर और कैराना के उपचुनाव में करा चुकी हैं. गोरखपुर और फूलपुर में बसपा ने समाजवादी पार्टी को तथा कैराना में राष्ट्रीय लोकदल को समर्थन दिया था. तीनों ही जगह भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा. उपचुनाव के इन नतीजों ने भी मायावती की मोलभाव करने की क्षमता को मज़बूत किया है.

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प्रधानमंत्री पद पर नज़र

दरअसल, मायावती का लक्ष्य सिर्फ़ विधानसभा चुनावों में अधिक से अधिक सीटें लड़ना और जीतना ही नहीं है, उनकी निगाहें अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव पर भी हैं. वे विधानसभा की ज़्यादा से ज़्यादा सीटें जीतकर 2019 के लोकसभा चुनाव में बनने वाले संभावित व्यापक गठबंधन में भी अपनी पार्टी के लिए ज़्यादा से ज़्यादा सीटों पर दावेदारी करने की स्थिति में आना चाहती हैं.

वे जानती हैं कि 2019 के लिए अंदरूनी विपक्षी राजनीति की बिसात बिछ चुकी है, अगर त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति बने तो वो प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी ठोक सकें उसके लिए उन्होंने अभी से तैयारी शुरू कर दी है.

देश की अन्य क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं की तरह मायावती की भी यह राजनीतिक हसरत किसी से छुपी नहीं है, यही निजी महत्वाकांक्षा की माया है जो राहुल गांधी और गठबंधन के भविष्य के लिए बहुत बड़ी चुनौती है.

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