महबूबा मुफ़्ती: पिता की परछाईं से अपने वजूद तक

  • 21 जून 2018
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59 वर्षीय महबूबा मुफ़्ती जम्मू-कश्मीर की पहली महिला मुख्यमंत्री थीं. हालांकि महबूबा कार्यकाल पूरा नहीं करने के मामले में पहली मुख्यमंत्री नहीं थीं.

महबूबा से पहले भी ऐसे कई मुख्यमंत्री रहे हैं जो अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए और बीच में ही राज्यपाल के हाथ में प्रदेश की कमान दे दी गई.

महबूबा के मुख्यमंत्री बनने का सफ़र आसान नहीं था. महबूबा की दोनों बेटियों इर्तिका और इल्तिजा ने स्कूल जाना शुरू ही किया था कि मां-बाप के रिश्तों में दरार आ गई.

पति जावेद इक़बाल शाह ने महबूबा के पिता मुफ़्ती मोहम्मद सईद के भारत की राष्ट्रीय राजनीति से राज्य की राजनीति में क़दम रखने से पहले ही उन्हें तलाक़ दे दिया था.

1989 में वीपी सिंह की सरकार में मुफ़्ती मोहम्मद सईद भारत के पहले मुस्लिम गृह मंत्री बने थे.

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बेटी की रिहाई के लिए चरमपंथी छोड़े गए

मुफ़्ती मोहम्मद सईद के गृह मंत्री रहते हुए उनकी छोटी बेटी डॉक्टर रुबिया सईद को चरमपंथियों ने अगवा कर लिया था. रुबिया को चरमपंथियों के क़ब्ज़े से छुड़ाने के लिए भारत सरकार को पांच चरमपंथियों को रिहा करना पड़ा था.

1947 में भारत की आज़ादी के बाद शेख अब्दुल्ला कश्मीर के पहले मुख्यमंत्री बने थे और मुफ़्ती मोहम्मद सईद तब से ही इस परिवार के मुखर विरोधी रहे हैं.

हालांकि मुफ़्ती मोहम्मद सईद के विरोध के बावजूद शेख अब्दुल्ला कश्मीर के बड़े नेता बने और वो घाटी की निर्णायक आवाज़ के रूप में सामने आए.

मुफ़्ती मोहम्मद सईद कांग्रेस से जुड़े थे और उन्होंने लंबे समय तक ख़ुद को राष्ट्रीय राजनीति तक सीमित रखा.

सालों बाद शेख की जेल से रिहाई के बाद केंद्र ने 1975 में उनसे समझौता किया था और उन्हें मुख्यमंत्री बनाया. मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने तब शेख से समर्थन वापस ले लिया.

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पहली बार राज्यपाल शासन

इसका नतीज़ा यह हुआ कि पहली बार केंद्र ने राज्यपाल के हाथों में जम्मू-कश्मीर की कमान दे दी.

अपने पति से तलाक़ के बाद से महबूबा अपने माता-पिता के साथ रह रही थीं और बेटियों को पढ़ने के लिए अमरीका भेज दिया था. सईद को लगा कि महबूबा राजनीति को साध सकती हैं तो उन्होंने पहली बार 1996 में महबूबा को चुनावी मैदान में उतारा.

1996 में 6 सालों के राज्यपाल शासन के बाद विधानसभा चुनाव हुए. महबूबा मुफ़्ती अपने गृह विधानसभा क्षेत्र बिजबिनहारा से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतने में सफल रहीं.

इस जीत के साथ ही उन्होंने प्रदेश में नेशनल कॉन्फ़्रेंस और उसके नेता फ़ारूक अब्दुल्ला को एक मज़बूत विपक्ष के तौर पर चुनौती देना शुरू कर दिया.

जम्मू-कश्मीर की राजनीति में महबूबा की पहचान एक साहसी नेता की रही है. महबूबा जल्द ही प्रदेश की वंशवादी राजनीति के ख़िलाफ़ एक मज़बूत कश्मीरी आवाज़ बनकर उभरीं.

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चरमपंथियों से सहानुभूति

महबूबा ने बड़ी समझदारी से हथियारबंद चरमपंथियों से बातचीत करने की वकालत शुरू कर दी. किसी भी चरमपंथी के मारे जाने के बाद महबूबा उसके परिवार के घर जाने लगीं और शोक में वो भी रो पड़ती थीं.

1998 में मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने कांग्रेस से इस्तीफ़ा दे दिया और उन्होंने पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी का गठन किया. मुफ़्ती ने कश्मीरियों से वैकल्पिक राजनीति का वादा किया और इस बात को मज़बूती से उठाया कि एक परिवार ने पूरे कश्मीर का दोहन किया है.

महबूबा ने पीडीपी को कश्मीरियों के बीच लोकप्रिय बनाने की चुनौती को स्वीकार किया. इसके लिए उन्होंने जिस राह को चुना उसे कई लोग 'उदार अलगाववाद' कहते हैं.

महबूबा की पीडीपी ने भारत-विरोधी लाइन पर चलने की कोशिश की. उन्होंने पार्टी के झंडे का रंग हरा और चुनाव चिह्न क़लम और दवात को चुना. यह मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट के झंडे की नक़ल थी बस फ़र्क़ इतना था कि इनके झंडे पर क़लम दवात की जगह तराजू था. जल्द ही पीडीपी ने कश्मीर की जनभावनाओं को नेशनल कॉन्फ़्रेंस के ख़िलाफ़ अपने पक्ष में करना शुरू कर दिया.

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हर चुनाव में बढ़ीं सीटें

साल 2002 में पीडीपी ने 87 सीटों पर चुनाव लड़ा जिसमें से उसके हाथ सिर्फ़ 16 सीटें लगीं. इसके बाद कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई और मुफ़्ती मोहम्मद सईद मुख्यमंत्री बन गए, लेकिन पर्दे के पीछे महबूबा मौजूद थीं.

इसी दौरान एक हिंदू मंदिर को ज़मीन देने का विवाद खड़ा हुआ और कश्मीर में अलगाववादी सड़क पर आ गए. इसी विवाद के बीच महबूबा मुफ़्ती ने साल 2008 में चुनाव से ठीक एक महीने पहले कांग्रेस से अपना समर्थन वापस ले लिया.

इसके बाद उन्होंने अपनी सीट संख्या बढ़ाने के लिए और ज़्यादा मेहनत की.

2008 का चुनाव एक अहम विधानसभा चुनाव था, जिसमें पीडीपी के हाथ 21 सीटें आईं, लेकिन इस बार कांग्रेस ने महबूबा मुफ़्ती की जगह नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ जाने का फ़ैसला किया और उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने.

महबूबा ने इसके बाद एक ज़बर्दस्त विपक्ष की भूमिका निभाई, जिसमें उन्होंने उमर अब्दुल्ला सरकार के ख़िलाफ़ कथित मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप लगाए.

इस दौरान महबूबा ने उमर अब्दुल्ला की नीतियों का भी मुखर होकर विरोध किया.

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बीजेपी से गठबंधन

2014 के विधानसभा चुनाव में महबूबा की पार्टी को 28 सीटों पर कामयाबी मिली. महबूबा की सीटें तो बढ़ गईं, लेकिन बीजेपी के साथ सरकार गठन सबसे बड़ी चुनौती थी.

हिंदू बहुल इलाक़े जम्मू में बीजेपी ने 25 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया था. नेशनल कॉन्फ़्रेंस 15 सीटों पर सिमट गई थी जबकि कांग्रेस के हिस्से में 12 सीटें ही आईं.

महूबूबा और मुफ़्ती मोहम्मद सईद 28 सीटें जीतकर भी ख़ुश नहीं थे, क्योंकि सरकार बनाने के लिए ये सीटें काफ़ी नहीं थी.

सरकार बनाने के लिए बीजेपी के साथ इनका समझौता हुआ. एक साझा एजेंडे पर दोनों दलों के बीच समझौता हुआ. इस एजेंडे में पाकिस्तान और अलगाववादियों से बातचीत पर भी सहमति बनी थी.

इसके साथ ही कई और चीज़ें शामिल थीं. बीजेपी ने एजेंडे की बातों को बहुत गंभीरता से नहीं लिया. 2016 में मुफ़्ती मोहम्मद सईद का निधन हो गया.

इस मौत के बाद महबूबा ने बीजेपी के साथ आगे बढ़ने के लिए क़रीब ढाई महीने का वक़्त लिया. मार्च 2016 में महबूबा मुफ़्ती प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं.

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कुछ ही महीने बाद चरमपंथी कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने पर कश्मीर सुलग उठा. सड़कों पर हिंसक प्रदर्शन होने लगे. बुरहान वानी के मारे जाने के बाद भड़की हिंसा में 200 आम लोग और कई चरमपंथी मारे गए.

इसके साथ ही पेलेट गन से कइयों की आंखों की रौशनी चली गई.

बीजेपी के साथ गठबंधन ख़त्म होने के हालात इस साल की शुरुआत में ही बन गए थे. महबूबा के भाई तसादुक़ मुफ़्ती अपनी बहन की सरकार में मंत्री थे और उन्होंने जम्मू के कठुआ में एक बच्ची के साथ कथित बलात्कार के बाद कहा था कि यह साझेदारी एक अपराध में भागीदारी के साथ ख़त्म हो रही है.

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गठबंधन की मजबूरी

इस बलात्कार को लेकर कुछ बीजेपी नेताओं का रवैया मीडिया में काफ़ी विवादित रहा था. इसे लेकर बीजेपी ने अपने दो मंत्रियों को बर्खास्त भी किया, लेकिन चीज़ें फिर भी दुरुस्त नहीं हो पाईं.

जब गृह मंत्रालय ने रमज़ान के दौरान चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अभियान बंद करने की घोषणा की तो महबूबा ने इसका स्वागत किया. महबूबा ने कहा कि बातचीत के ज़रिए ही मसलों को सुलझाया जा सकता है.

चरमपंथियों ने भारत सरकार के युद्धविराम को ख़ारिज कर दिया. अलगाववादियों ने भी इस पर बहुत ख़ुशी नहीं जताई. महबूबा ने कहा कि रमज़ान के बाद भी युद्धविराम को जारी रखना चाहिए, लेकिन गृह मंत्रालय ने 17 जून को इसे ख़त्म करने की घोषणा कर दी.

युद्धविराम ख़त्म होने के ठीक दो दिन बाद ही बीजेपी नेता और जम्मू-कश्मीर के पार्टी प्रभारी राम माधव ने पीडीपी से समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी.

महबूबा ने इसके लिए बहुत शिकायत नहीं की, लेकिन उन्होंने कहा कि भारी सैन्य तैनाती से कश्मीर का मसला नहीं सुलझेगा. महबूबा ने कहा कि यह गठबंधन सत्ता के लिए नहीं था बल्कि दिल्ली और जम्मू-कश्मीर के बीच संवाद को बढ़ाना था.

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