नज़रिया: इंदिरा की इमरजेंसी, आडवाणी की आशंका और जेपी का संघर्ष

  • 25 जून 2018
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जून महीने की 25 तारीख़ की काली रात देश को आपातकाल और सेंसरशिप के हवाले कर नागरिक अधिकार छीन लिए गए थे.

राजनीतिक विरोधियों को उनके घरों, ठिकानों से उठाकर जेलों में डाल दिया गया था. अभिव्यक्ति की आजादी पर सेंसरशिप का ताला जड़ दिया गया था.

पत्र-पत्रिकाओं में वही सब छपता और आकाशवाणी पर वही प्रसारित होता था जो उस समय की सरकार चाहती थी. प्रकाशन-प्रसारण से पहले सामग्री को सरकारी अधिकारी के पास भेज कर उसे सेंसर करवाना पड़ता था.

हुआ ये था कि महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के चरम पर पहुंचने से क्रुद्ध देश भर के छात्र-युवा 72 साल के बुजुर्ग समाजवादी-सर्वोदयी नेता, लोकनायक जयप्रकाश नारायण के पीछे अहिंसक और अनुशासित तरीके से लामबंद होने लगे थे.

गुजरात और बिहार की परिधि को लांघते हुए सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन देश के अन्य हिस्सों में भी जंगल की आग की तरह फैलने लगा. इस आंदोलन ने न सिर्फ राज्यों की कांग्रेसी सरकारों बल्कि केंद्र में सर्वशक्तिमान इंदिरा गांधी की सरकार को भी भीतर से झकझोर दिया था.

तभी 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा का ऐतिहासिक फ़ैसला आ गया.

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Image caption जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा

जस्टिस सिन्हा ने अपने फ़ैसले में रायबरेली से इंदिरा गांधी के लोकसभा चुनाव को चुनौती देने वाली समाजवादी नेता राजनारायण की याचिका पर फैसला सुनाते हुए प्रधानमंत्री के संसदीय चुनाव को अवैध घोषित कर दिया. उनकी लोकसभा सदस्यता रद्द करने के साथ ही उन्हें छह वर्षों तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य भी घोषित कर दिया था.

24 जून को सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फ़ैसले पर मुहर लगा दी थी, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की छूट दे दी थी. वह लोकसभा में जा सकती थीं लेकिन वोट नहीं कर सकती थीं.

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उस दिन इलाहाबाद कोर्ट के बाहर और भीतर क्या हुआ सुनिए मोहन लाल शर्मा से

इंदिरा के पद नहीं छोड़ने की स्थिति में अगले दिन 25 जून को जेपी ने अनिश्चितकालीन देशव्यापी आंदोलन का आह्वान किया था. दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी ने राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर की मशहूर कविता की पंक्ति-'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है,' का उद्घोष किया था.

जेपी ने अपने भाषण में कहा था, "मेरे मित्र बता रहे हैं कि मुझे गिरफ़्तार किया जा सकता है क्योंकि हमने सेना और पुलिस को सरकार के गलत आदेश नहीं मानने का आह्वान किया है."

"मुझे इसका डर नहीं है और मैं आज इस रैली में भी अपने उस आह्वान को दोहराता हूं ताकि कुछ दूर, संसद में बैठे लोग भी सुन लें. मैं आज फिर सभी पुलिस कर्मियों और जवानों का आह्वान करता हूं कि इस सरकार के आदेश नहीं मानें क्योंकि इस सरकार ने शासन करने की अपनी वैधता खो दी है."

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Image caption रामलीला मैदान में जय प्रकाश नारायण की रैली

इंदिरा गांधी ने अपने छोटे बेटे संजय गांधी, कानून मंत्री हरिराम गोखले और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे जैसे कुछ ख़ास सलाहकारों से मंत्रणा के बाद 'आंतरिक उपद्रव' की आशंका के मद्देनजर संविधान की धारा 352 का इस्तेमाल करते हुए आधी रात को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से देश में 'आंतरिक आपातकाल' लागू करने का फरमान जारी करवा दिया था.

आपातकाल के वो दिन

आपातकाल के शिकार या कहें उसका सामना करने वालों में मैं भी था. तब मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय के क्रिश्चियन कालेज का छात्र था और समाजवादी युवजन सभा के बैनर तले समाजवादी आंदोलन और जेपी आंदोलन में भी सक्रिय था.

आपातकाल की घोषणा के बाद हम मऊ जनपद (उस समय के आजमगढ़) में स्थित अपने गांव कठघराशंकर-मधुबन चले गए थे लेकिन पुलिस ने वहां भी पीछा नहीं छोड़ा. जार्ज फर्नांडिस के 'प्रतिपक्ष' अख़बार के साथ जुलाई के पहले सप्ताह में हमें गिरफ़्तार कर लिया गया.

हम पर पुलिस का इल्ज़ाम था कि हम प्रतिबंधित 'प्रतिपक्ष' अख़बार बेच रहे थे, आपातकाल के विरुद्ध नारे लगा रहे थे और मधुबन थाने के बगल में स्थित यूनियन बैंक में डकैती की योजना बना रहे थे. यह सारे काम हम एक साथ कर रहे थे.

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Image caption जार्ज फर्नांडिस

डीआईआर और 120 बी के तहत हमें आजमगढ़ जनपद कारागार के सुपुर्द कर दिया गया. सवा महीने बाद 15 अगस्त 1975 को मेरे पिता जी, स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी विष्णुदेव भी अपने समर्थकों के साथ आपातकाल के विरुद्ध प्रदर्शन करते हुए गिरफ़्तार होकर आजमगढ़ जेल में आ गए.

हम पिता-पुत्र आजमगढ़ जेल की एक ही बैरक में महीनों आमने-सामने सीमेंट के स्लीपर्स पर सोते थे.

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जया जेटली के साथ कई विशेषण जोड़े जा सकते हैं.

भूमिगत जीवन और मधु लिमये से संपर्क

कई महीने जेल में बिताने के बाद परीक्षा के नाम पर हमें पेरोल-ज़मानत मिल गई लेकिन हम एक बार जो जेल से निकले तो दोबारा वापस नहीं गए. आपातकाल के विरुद्ध भूमिगत आंदोलन में सक्रिय हो गए.

उस क्रम में इलाहाबाद, वाराणसी और दिल्ली सहित देश के विभिन्न हिस्सों में आना-जाना, संघर्ष के साथियों से समन्वय और सहयोग के साथ ही आपातकाल के विरोध में जगह-जगह से निकलने वाले समाचारपत्रों के प्रकाशन और वितरण में योगदान मुख्य काम बन गया था.

भोपाल जेल में बंद समाजवादी नेता मधु लिमये से पत्र संपर्क हुआ. वह हमें पुत्रवत स्नेह देते थे. उनसे हमने देश भर में तमाम समाजवादी नेताओं-कार्यकर्ताओं के पते लिए. मधु जी के साथ हमारा पत्राचार 'कोड वर्ड्स' में होता था. मसलन, हमारे एक पत्र के जवाब में मधु जी ने लिखा, "पोपट के पिता को तुम्हारा पत्र मिला." पत्र में अन्य ब्यौरे के साथ अंत में उन्होंने लिखा, "तुम्हारा बांके बिहारी."

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Image caption मधु लिमये

यह बात समाजवादी आंदोलन में मधु जी के करीबी लोगों को ही पता थी कि उनके पुत्र अनिरुद्ध लिमये का घर का नाम पोपट था और मधु जी बिहार में बांका से सांसद थे. एक और पत्र में उन्होंने बताया कि "शरदचंद इंदौर गए". यानी उनके साथ बंद रहे "शरद यादव का तबादला इंदौर जेल में हो गया."

जब इंदिरा गांधी ने संविधान में 42वां संशोधन किया तो उसकी आलोचनात्मक व्याख्या करते हुए मधु जी ने उसके खिलाफ एक लंबी पुस्तिका लिखी और उसकी हस्तलिखित प्रति हमारे पास भिजवा दी ताकि उसका प्रकाशन-प्रसारण हो सके. इसके साथ उन्होंने पत्र लिखा कि अगर हस्तलिपि मिल जाये तो लिखना कि "दमा की दवा मिल गई है."

उस समय हमारे सामने आर्थिक संसाधनों की कमी भी थी. मधु जी ने कई लोगों को पत्र लिखा कि

'विष्णु पुत्र' (यानी मैं) जान जोखिम में डालकर काम कर रहा है. इसकी हर संभव मदद करें', जिन लोगों को ये पत्र लिखा गया उनमें वकील शांतिभूषण और इस्तीफ़ा देने वाले उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री हेमवतीनंदन बहुगुणा भी थे.

इनमें से समाजवादी पृष्ठभूमि के नेता-अधिवक्ता तो वैसे भी निरंतर हमारी मदद कर रहे थे. उनके घरों में छिप कर रहना, खाना और मौके-बेमौके भाभियों से भी कुछ आर्थिक मदद आम बात थी.

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मधु लिमये ने सांसद होने का कर्तव्य बड़ी शान से निभाया.

मधु जी के पत्र के साथ मैं और समाजवादी नेता विनय कुमार सिन्हा लखनऊ में चौधरी चरण सिंह और चंद्रभानु गुप्त से भी मिले थे. हम लोग चौधरी साहब के एक राजनीतिक फैसले से सख़्त नाराज थे.

उन्होंने आपातकाल में विधान परिषद के चुनाव में भाग लेने की घोषणा की थी, जबकि हमारा मानना था कि विधान परिषद का चुनाव करवाकर इंदिरा गांधी आपातकाल में भी लोकतंत्र के जीवित रहने का दिखावा करना चाहती थीं लिहाजा विपक्ष को उसका बहिष्कार करना चाहिए था.

हमने और विनय जी ने इस आशय का एक पत्र भी चौधरी चरण सिंह को लिखा था. जवाब में चौधरी साहब का पत्र आया कि चुनाव में शामिल होने वाले नहीं बल्कि विधान परिषद के चुनाव का बहिष्कार करने वाले लोकतंत्र के दुश्मन हैं.

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चौधरी चरण सिंह की 114वीं वर्षगाँठ पर उनके जीवन पर रेहान फ़ज़ल की विवेचना

आपातकाल की समाप्ति के बाद मधु जी ने बताया था कि किस तरह वे हमारे पत्र जेल में बिना सेंसर के हासिल करते (खरीदते) थे. वे अपने पत्रों को भी कुछ इसी तरह स्मगल कर बाहर भिजवाते थे, कई बार अपनी पत्नी चम्पा जी के हाथों भी.

आपातकाल के सबक!

दरअसल, आपातकाल एक ख़ास तरह की राजनीतिक संस्कृति और प्रवृत्ति का परिचायक था जिसे लागू तो इंदिरा गांधी ने किया था, लेकिन बाद के दिनों-वर्षों में एकाधिकारवादी प्रवृत्ति कमोबेश सभी राजनीतिक दलों और नेताओं में देखने को मिलती रही है.

भाजपा के बुजुर्ग नेता लालकृष्ण आडवाणी ने तीन साल पहले इन प्रवृत्तियों के मौजूद रहने और आपातकाल के भविष्य में भी लागू किए जाने की आशंकाओं की बात अकारण नहीं कही थी, उस इमरजेंसी के कामकाज के तौर-तरीक़े पूरी तरह से कभी ख़त्म नहीं हुए और हाल के वर्षों में उसका उभार ही देखने को मिला है.

Image caption लालकृष्ण आडवाणी

इमरजेंसी के खिलाफ़ संघर्ष से पैदा हुई जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद हमारे 'लोकतंत्र प्रेमियों' ने सम्भवतः पहला अलोकतांत्रिक काम ये किया कि नौ राज्यों में कांग्रेस की चुनी हुई राज्य सरकारों को बर्ख़ास्त कर दिया.

मीसा के विरोध करते हुए सत्तारूढ़ हुए लोगों को देश में मिनी मीसा लगाने का प्रस्ताव रखने में जरा भी संकोच नहीं हुआ. यह बताने में कोई हर्ज नहीं कि मेरी अंतिम गिरफ़्तारी जनता पार्टी के शासन में ही हुई थी और उसी के साथ सक्रिय राजनीति से एक तरह का मोहभंग भी.

बाद के दिनों में भी इस तरह के कई प्रसंग आये जब आपातकाल के गर्भ से निकले हमारे 'लोकतंत्र प्रेमियों' ने अपनी सत्ता को मिलने वाली चुनौतियों से निबटने के लिए और ज़्यादा घातक और खूंखार कानूनों की खुलेआम वकालत की और उन पर अमल भी किया.

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यही वजह है कि आपातकाल की बरसी मनाते समय आम जन को न सिर्फ आपातकाल बल्कि उन ख़तरनाक राजनीतिक प्रवृत्तियों के बारे में भी आगाह करना चाहिए जो लोकतांत्रिक तरीक़े से सत्ता में आए लोगों को तानाशाह बनने की ओर ले जाती है.

ये प्रवृत्तियां कभी अमीर बनाम गरीब की लड़ाई का झांसा देकर, तो कभी धार्मिक कट्टरपंथ पर आधारित अंध राष्ट्रवाद को सामने रखकर अपने विरोधियों और असहमति के स्वरों को दबाने के रास्ते पर चल रही हैं.

चाहे वे किसी पार्टी के हों या किसी राज्य में हों, सत्ता में बैठे लोगों और इन प्रवृत्तियों से न सिर्फ सावधान रहने की बल्कि उनका मुक़ाबला करने के लिए आम जनता को जागरूक और तैयार करने की ज़रूरत है.

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