छत्तीसगढ़ में सिपाही 'विद्रोह' ने ली आंदोलन की शक्ल

  • 25 जून 2018
छत्तीसगढ़ पुलिस इमेज कॉपीरइट Alok Putul/BBC

छत्तीसगढ़ में 'सिपाही विद्रोह' चल रहा है. यह विद्रोह 1857 में अंग्रेजों के ख़िलाफ़ हुए सिपाही विद्रोह जैसा तो नहीं है, लेकिन छत्तीसगढ़ में वेतन-भत्ते और दूसरी सुविधाओं को लेकर जिस तरीके से सिपाही और उनके परिजन राज्य भर में प्रदर्शन कर रहे हैं, उसे सरकार इसे सिपाही विद्रोह ही मान रही है.

छत्तीसगढ़ में सिपाहियों के काम के घंटे, छुट्टियां और वेतन-भत्तों को बढ़ाए जाने की मांग को लेकर पिछले सप्ताह भर से राज्य के अलग-अलग ज़िलों में प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है.

राजधानी रायपुर में सोमवार को एक आंदोलन चलाया जा रहा है. उधर, राज्य सरकार पुलिस के हक़ में होने वाले सारे आयोजनों को कठोरता से रोकने की कोशिश में जुटी है.

राज्य के गृहमंत्री रामसेवक पैंकरा यह नहीं मानते कि सिपाहियों के वेतन, भत्ते और काम करने के घंटे को लेकर कहीं कोई कमी है. वे कहते हैं, "पुलिस के लिए हम पूरी पहल कर रहे हैं. उनके रहने के लिए 10 हज़ार आवास बनाए जा रहे हैं. उनके बच्चों के पढ़ने की व्यवस्था की जा रही है. नक्सली क्षेत्रों में उन्हें भत्ता दिया जा रहा है. कहीं कोई समस्या नहीं है."

इमेज कॉपीरइट Alok Putul/BBC

सिपाहियों के परिजनों की नाराजगी

लेकिन सिपाही और उनके परिजन सरकार के दावे को झूठा करार दे रहे हैं. पिछले कई सालों से पुलिस सुधार का आंदोलन चलाने के लिए नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिए गए राकेश यादव ने अपनी गिरफ़्तारी से पहले बीबीसी को बताया कि वेतन और भत्तों की विसंगतियों को दूर करने के अलावा काम के घंटे और साप्ताहिक अवकाश सिपाहियों की मुख्य मांगें हैं. इसके अलावा नक्सल प्रभावित इलाकों में जवानों के लिए बुलेटप्रूफ़ जैकेट और हेलमेट की व्यवस्था भी सरकार को सुनिश्चित करनी चाहिए.

सिपाहियों के परिजनों के पास उनकी परेशानियों की लंबी फ़ेहरिस्त है. सातों दिन काम और घोषित समय से कई-कई घंटे अधिक ड्यूटी के बाद इन सिपाहियों को मिलने वाला कम वेतन तो सवालों के घेरे में है ही, अंग्रेज़ों के जमाने से मिलने वाले भत्तों को लेकर भी पुलिसकर्मी और उनके परिजन नाराज़ हैं.

एक जवान की पत्नी नीलम खेस कहती हैं, "मेरे पति को किसी अपराधी को पकड़ने के लिए अगर पटना जाना हो तो सरकार यात्रा भत्ते के नाम पर 80 रुपए पकड़ा देती है. आप बताएं कि क्या 80 रुपए में कोई पटना से आना-जाना कर सकता है?"

इमेज कॉपीरइट Alok Putul/BBC

सिपाहियों की मांग

आज की तारीख़ में जबकि अपराधी हवाई जहाज़ से फ़रार हो रहे हैं, तब भी छत्तीसगढ़ में सिपाहियों को महीने का 18 रुपए साइकिल भत्ता दिया जाता है. कहीं यात्रा करनी हो तो सिपाही को 25 से 80 रुपए तक का यात्रा भत्ता मिलता है.

इसके अलावा पौष्टिक भोजन के नाम पर भी हर दिन साढ़े तीन रुपए इन सिपाहियों को दिए जाते हैं.

आंदोलन करने वालों की मांग है कि 18 रुपए के साइकल भत्ते की जगह तीन हज़ार रुपए पेट्रोल भत्ता दिया जाए. इसी तरह 80 रुपए के यात्रा भत्ते की जगह 1500 रुपए, 60 रुपए के वर्दी भत्ते की जगह 1000 रुपए, आवास भत्ता के 697 रुपए की जगह 4000 रुपए आवास भत्ता दिया जाए.

लेकिन सरकार टस से मस होने के लिए तैयार नहीं है. पैंकरा ने पहले ही दिन साफ चेतावनी दी है कि सिपाहियों या उनके परिजनों ने कोई आंदोलन किया तो उनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाएगी. ज़ाहिर है इस पूरे आंदोलन को दबाने के लिए सरकार कोई कसर नहीं छोड़ रही है.

इमेज कॉपीरइट Alok Putul/BBC

सरकार की कार्रवाई

पुलिस द्रोह अधिनियम 1922 के तहत पुलिसकर्मी किसी भी आंदोलन में भाग नहीं ले सकते, इसलिए राज्य के अधिकांश हिस्सों में इस आंदोलन में उनके परिजन ही भाग ले रहे हैं. लेकिन सरकार परिजनों के भी आंदोलन में भाग लेने को आधार बना कर आंदोलन करने वालों की गिरफ्तारी कर रही है, सिपाहियों को निलंबन की नोटिस थमा रही है और उनकी नौकरी से बर्ख़ास्तगी का काम कर रही है.

कहीं सिपाहियों का माओवाद प्रभावित इलाकों में तबादला किया जा रहा है तो कहीं उनसे शपथपत्र लिए जा रहे हैं कि वे या उनके परिजन इस तरह के किसी भी आंदोलन में भाग नहीं लेंगे.

कुछ इलाकों में तो सिपाहियों की कॉलोनियों को कांटेदार तार से घेर कर बाहर पहरा लगा दिया गया है. राजधानी रायपुर के पुलिस लाइन में मुख्यद्वार से पुलिस ने ऐसे लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी है जिन पर आंदोलन में शामिल होने का शक़ है.

राज्य के कई इलाकों में तो आटो या बस से जाती ऐसी महिलाओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया जिनका पुलिस वालों या पूरे आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं था.

इमेज कॉपीरइट Alok Putul/BBC

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और विधायक भूपेश बघेल कहते हैं, "जिस तरह से आंदोलन में भाग लेने वाले पुलिस वालों के रिश्तेदारों के साथ दमनात्मक रवैय्या अपनाया जा रहा है, वह राज्य सरकार के आतंकवाद का उदाहरण है. राज्य में चार सौ से अधिक जवानों को बर्ख़ास्त कर दिया गया है. अहंकार में डूबी हुई सरकार इन जवानों से बात भी नहीं करना चाहती, यह अलोकतांत्रिक कदम है."

दूसरी ओर सिपाहियों के पक्ष में आंदोलन करने वालों के परिजनों की गिरफ्तारी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.

हाईकोर्ट के अधिवक्ता सतीश कुमार कहते हैं, "अगर कोई शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहा है या प्रदर्शन की तैयारी कर रहा है तो यह उसका अधिकार है. पुलिस वालों के मामले में तो सरकार क़ानून का दुरुपयोग करके लोगों को गिरफ्तार कर रही है. यह ठीक नहीं है."

बहरहाल सोमवार को जो आंदोलन चल रहा है, उसका प्रभाव देखने के बाद ही शायद सिपाहियों के काम के घंटे, अवकाश और दूसरी सुविधाओं पर कोई फ़ैसला हो पाए.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे