BBC पड़ताल: बिहार बोर्ड से क्यों निकलते हैं फ़र्ज़ी टॉपर

  • 26 जून 2018
बिहार बोर्ड

बिहार की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है. जब-जब परीक्षाओं और परिणामों का समय आता है, अख़बारों की सुर्खियों में बिहार बोर्ड के कारनामे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखे जाने लगते हैं.

इस साल इंटर परीक्षा की टॉपर कल्पना कुमारी के 'फ्लाइंग स्टूडेंट' होने का मामला थमा भी नहीं था कि बिहार बोर्ड का एक और 'कारनामा' सामने आ गया. कल्पना ने खुद माना था कि उनका रजिस्ट्रेशन बिहार का था, लेकिन उन्होंने पढ़ाई दिल्ली में रहकर की है.

गोपालगंज के एक स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा की 42 हज़ार से अधिक उत्तर पुस्तिकाओं के गायब होने का पता चला है. ये मामला तब सामने आया जब बोर्ड के कर्मचारी 12 उत्तर पुस्तिकाएँ लेने स्कूल पहुंचे थे. इन उत्तर पुस्तिकाओं का री-वेरिफिकेशन होना था.

स्कूल के प्रिंसिपल प्रमोद कुमार श्रीवास्तव ने 18 जून को गोपालगंज में एफ़आईआर दर्ज करवाई थी. स्कूल के प्रिंसिपल को बिहार बोर्ड के दफ़्तर में पूछताछ के लिए पटना बुलाया गया, जब वे सवालों के 'संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाए' तो उन्हें वहीं गिरफ़्तार कर लिया गया.

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Image caption 2015 में परीक्षा में कदाचार की इस तस्वीर ने बिहार सरकार की देश-दुनिया में ख़ूब फ़जीहत करवाई थी

स्कूल के प्रिंसिपल ने स्थानीय मीडिया को बताया कि सभी उत्तर पुस्तिकाएँ जांच के बाद 213 बोरियों में रखी गईं थी, जो स्कूल से गायब हो गईं, अब पुलिस ने विशेष जाँच दल का गठन किया है.

गोपालगंज में नवादा और दूसरे ज़िलों की दसवीं के छात्रों की कॉपियां जांची गई थीं. आश्चर्य की बात ये है कि 213 बोरियों में रखी 42 हज़ार से ज्यादा आंसर शीट गायब हो गई और स्कूल प्रशासन को पता तक नहीं चला.

मीडिया में छपी रिपोर्टों के मुताबिक जहां आंसर शीट रखी गई थी, उस कमरे का न ताला टूटा मिला और न ही सेंधमारी के निशान मिले हैं.

बाद में पुलिस जांच में यह पता चला कि ये सभी कॉपियां रातों-रात एक कबाड़ी की दुकान में 8,500 रुपए में बेच दी गई थी.

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सबसे ज्यादा खर्च शिक्षा पर

शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलती यह कोई पहली घटना नहीं है. हर साल परीक्षाओं के समय बोर्ड एक नए विवाद में फंसता है.

बिहार अन्य राज्यों की तुलना में अपने कुल बजट का बड़ा हिस्सा शिक्षा पर खर्च करता है. इस साल बिहार विधानमंडल में एक लाख 76 हजार 990 करोड़ रुपए का बजट पेश किया गया, जिसमें से शिक्षा पर खर्च करने के लिए लगभग 32 हज़ार करोड़ रुपए दिए गए हैं.

यह कुल बजट का 18.15 प्रतिशत है. बिहार में शिक्षा विभाग सबसे मालदार विभाग समझा जाता है. यही कारण है कि यह विभाग सत्ताधारी पार्टी खुद अपने पास रखती है.

महागठबंधन की सरकार में जहां राजद सुप्रीमो लालू यादव के दोनों बेटों को उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री जैसे पद मिले थे, वहीं कांग्रेस को शिक्षा विभाग दिया गया था.

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Image caption पिछले 13 साल में पांचवीं बार मुख्यमंत्री बने हैं नीतीश कुमार. 2005 के बाद से बिहार में उनकी पार्टी की सरकार है

सरकार के दावे और हक़ीक़त

साल 2005 में पहली बार 'विकास पुरुष' नीतीश कुमार सूबे के मुख्यमंत्री बने थे. तब से लेकर अब तक यानी 13 सालों में वो एक के बाद एक शिक्षा में सुधार के वादे और दावे करते रहे हैं, पर व्यवस्था की पोल परीक्षा और उसके परिणामों के वक्त ही खुलती है.

इस साल हुए 12वीं की परीक्षा में करीब 12 लाख परीक्षार्थी शामिल हुए थे, जिनमें से करीब 5.6 लाख फेल हो गए.

पिछले साल 12वीं में महज 47 फीसदी बच्चे ही पास हो पाए थें. वहीं दसवीं में 50.12 फीसदी बच्चों ने परीक्षा पास की थी.

इससे पहले की बात करें तो साल 2016 का रिजल्ट भी बेहतर नहीं रहा था. 2016 में 12वीं में 68 फीसदी बच्चों ने सफलता हासिल की थी तो दसवीं में 46.66 फीसदी ही सफल रहे थे.

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क्या बिहार के बच्चे पढ़ते ही नहीं है?

अब सवाल उठता है कि क्या बिहार के बच्चे पढ़ते नहीं हैं? यह सवाल मैंने पटना की वरिष्ठ पत्रकार रिंकू झा से पूछी.

उन्होंने कहा, "यह कहना बिलकुल गलत है कि बिहार के बच्चे पढ़ते नहीं है. बिहार में एक परिवार सबसे ज्यादा खर्च अपने बच्चों की पढ़ाई पर करता है. यहां के बच्चे देश के कोने-कोने में पढ़ने जाते हैं. देश के किसी भी निजी कोचिंग या विश्वविद्यालय में चले जाएं, वहां आपको बिहार के बच्चे मिल जाएंगे."

करीब एक दशक से शिक्षा के क्षेत्र में रिपोर्टिंग कर रही रिंकू रिजल्ट में गिरावट के पीछे बिहार बोर्ड की व्यवस्था को जिम्मेदार मानती हैं.

वो कहती हैं, "बिहार बोर्ड हर साल परीक्षा से कुछ महीने पहले नई-नई व्यवस्था लागू करता है. आंसर शीट की बारकोडिंग, क्वेश्चन पेपर का पैटर्न बदलना, ओएमआर शीट पर परीक्षा लेने का निर्णय. यह सब कुछ छात्रों को परेशानी में डालता है."

"जिन सरकारी स्कूलों में एक कंप्यूटर तक नहीं है, वहां के बच्चों को ओएमआर शीट पर परीक्षा देने को कहा जाता है. बच्चों को यह तक मालूम नहीं होता है कि ओएमआर शीट पर उत्तर कैसे दिया जाता है."

रिंकू कहती हैं कि बच्चे सही जवाब को रंगने की जगह टिक लगा के चले आते हैं. अब ओएमआर शीट की जांच करने वाले कंप्यूटर इंसानी दिमाग की तरह उत्तर तो जांचते हैं नहीं, परिणाम यह होता है कि वो फेल हो जाते हैं.

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Image caption हर साल रिजल्ट के बाद बिहार बोर्ड के बाहर ऐसे दर्जनों छात्र प्रदर्शन करते दिखते हैं जो आईआईटी इंट्रेस पास कर चुके होते हैं पर इंटर में उन्हें फेल कर दिया जाता है

जिम्मेदार कौन?

बिहार विधानमंडल के विधान पार्षद केदारनाथ पांडेय भी बिहार बोर्ड पर बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाते हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "बिहार बोर्ड परीक्षा और मूल्यांकन व्यवस्था के साथ नए-नए प्रयोग कर रहा है. ये प्रयोग बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ है. बिना शिक्षाविदों, शिक्षकों और अभिभावकों से बात किए ये प्रयोग बच्चों पर थोपे जा रहे हैं."

वो कहते हैं, "इन फ़ैसलों के कारण बच्चों और अभिभावकों को भुगतना पड़ रहा है. बच्चों पर अचानक नए प्रयोग करना और उसे लागू करना, ये बड़ा घातक है. ये सब कुछ शिक्षा विभाग के आदेश पर हो रहा है."

केदारनाथ पांडेय के आरोपों पर बीबीसी ने बिहार बोर्ड से ईमेल के जरिए प्रतिक्रिया पूछी है, जिसका जवाब नहीं मिला है. हमने बोर्ड के जन संपर्क अधिकारी से भी संपर्क साधा, पर उन्होंने बात नहीं की.

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बिहार में शिक्षा की कितनी अहमियत?

युवा आबादी के लिहाज से बिहार देश का तीसरा बड़ा राज्य है. 11 करोड़ की आबादी वाले इस राज्य में 16.8 प्रतिशत युवा हैं. इस साल जारी किए गए राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण मुताबिक यहां 15 से 24 साल वालों की आबादी 1.75 करोड़ है.

सर्वेक्षण के अनुसार बिहार की प्रति व्यक्ति सालाना आय 26,693 रुपए है, जो एक लाख के करीब पहुँच रहे राष्ट्रीय औसत का लगभग एक-चौथाई है.

यहां के उद्योग-धंधों की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है. बिहार में देश के महज 1.5% ही कारखाने चलते हैं. यहां कृषि और गैर-कृषि आधारित कुल 3530 कारखाने हैं. इनमें से 2942 कारखाने ही चालू हैं, जिनमें 1.46 लाख लोग काम करते हैं, जो राज्य की कुल आबादी के डेढ़ प्रतिशत से भी कम है.

शिक्षा की अहमियत क्या है इन आंकड़ों से पता चलता है. राज्य के लोगों के लिए शिक्षा सम्पन्नता पाने का जरिया है. यही कारण है कि यहां के गरीब अभिभावक अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए अपनी जमीन और जेवर तक बेच देते हैं.

बिहार के बेगूसराय के नारायण चौधरी ऐसे अभिभावकों में से एक हैं. अनुसूचित जाति से संबंध रखने वाले नारायण कहते हैं, "मेरी सोच ये थी कि जो मैंने तकलीफ झेली है, वो मेरे बच्चे न झेले. सभी मां-बाप की इच्छा होती है कि उनका बेटा बेहतर शिक्षा हासिल करे और अच्छी नौकरी पाए."

नारायण ताड़ी बेचते हैं, उसी से घर-परिवार और बेटे-बेटियों की शिक्षा का खर्च उठाते हैं. वो कहते हैं, "ताड़ी में आमदनी ही कितनी होती है. बच्चों की बेहतर पढ़ाई के लिए कभी जेवर गिरवी रखना पड़ा तो कभी कर्ज लेना पड़ा. किसी तरह बच्चों को पढ़ा रहा हूं. बीच में नीतीश कुमार ने ताड़ी पर प्रतिबंध लगा दिया था, उस समय आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा ख़राब हो गई थी. एक ही सपना है कि मेरे बेटे-बेटियां पढ़ लिखकर बड़ा आदमी बनें."

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बिहार में शिक्षा का स्तर कैसा?

नारायण का एक बेटा केरल के निफ्ट में फैशन डिजाइन की पढाई कर रहा है, तो दूसरा बीटेक कर चुका है. उनकी एक बेटी नवोदय विद्यालय में पढ़ती हैं. राज्य में उच्च शिक्षा की ख़राब स्थिति इन्हें बाहर जाने को मजबूर करती है. सिर्फ उच्च शिक्षा ही नहीं, स्कूली शिक्षा की हालात भी यहां बहुत अच्छी नहीं है.

नीतीश कुमार हर चुनावी सभा में यह दावा करते नहीं थकते कि उनके कार्यकाल में सरकारी स्कूलों में बच्चों के नामांकन दर बढ़े हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या उन्हें वहां बेहतर शिक्षा मिलती है?

इस साल हुए मेडिकल प्रवेश परीक्षा (NEET) की ऑल इंडिया टॉपर कल्पना कुमारी ने इंटर की परीक्षा बिहार बोर्ड से दी थी, हालांकि प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए उन्हें दिल्ली के एक निजी कोचिंग संस्थान जाना पड़ा था.

एक वीडियो में उन्होंने बाहर पढ़ने की बात खुद स्वीकारी है. वो बारहवीं में शिवहर जिले के वाईजेएम कॉलेज की छात्रा थीं.

सिर्फ कल्पना ही नहीं है, बेहतर शिक्षा की चाहत रखने वाले बच्चों को दिल्ली, कोटा और अन्य राज्यों का रुख करना पड़ता है.

शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे विकास कुमार मेघल कहते हैं, "बच्चों का बाहर जाना मजबूरी है. सरकारी विद्यालय उन्हें वो माहौल नहीं दे पाते हैं, जो उन्हें प्रतियोगी परीक्षा के लिए चाहिए होती है. अच्छी शिक्षा के लिए वो बाहर में मोटी रकम खर्च करते हैं."

"इस आस में कि उनका एडमिशन भारत के बेहतरीन इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज में होगा और वो अच्छी नौकरी हासिल कर पाएंगे. मां-बाप भी हर तरह की परेशानी उठा कर बच्चों को पढ़ाते हैं ताकि उनकी अगली पीढ़ी अभावों में न जिए."

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सरकारी स्कूलों की सुविधाएं और शिक्षक कैसे हैं?

भारत सरकार के आंकड़ें बताते हैं कि बिहार में कक्षा आठवीं से बारहवीं तक के 8116 सरकारी स्कूल हैं, जहां करीब 43 लाख छात्र पढ़ते हैं.

इन्हें पढ़ाने के लिए स्कूलों में 1.08 लाख शिक्षक हैं. इनमें से कुछ ऐसे शिक्षक भी हैं, जिन्हें अंग्रेजी में दिनों और महीनों का नाम तक लिखना नहीं आता. इनकी जानकारी में बिहार की राजधानी दिल्ली है.

अब जरा सोचिए कि बेहतर शिक्षा की चाहत रखने वाले बच्चे बिहार में रहकर पढ़ाई क्यों करेंगे.

नीतीश कुमार के पहले कार्यकाल में बड़े पैमाने पर शिक्षक बहाल किए गए थे. भर्तियां डिग्री और अंक के आधार पर की गई. कई स्तर पर नियोजन इकाइयां बनाई गईं, जहां जमकर फर्जीवाड़ा हुआ. फर्जी सर्टिफिकेट के आधार पर रिश्वत लेकर कई लोगों को शिक्षक बना दिया गया.

खुलासा होने पर करीब तीन लाख शिक्षकों के सर्टिफिकेट की जांच का जिम्मा राज्य के विजलेंस ब्यूरो को दिया गया. जांच में हजारों सर्टिफ़िकेट फ़र्ज़ी पाए गए.

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Image caption 2015 में तीसरी बाद सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार उच्च शिक्षा में छात्रवृत्ति योजना खत्म कर क्रेडिट कार्ड योजना चलाई

शिक्षा में कैसे-कैसे फ़र्जीवाड़े?

शिक्षा में फ़र्जीवाड़े की यह इकलौती तस्वीर नहीं है. याद कीजिए कुछ साल पहले परीक्षा में धड़ल्ले से हो रहे कदाचार की तस्वीर ने देश-दुनिया की मीडिया में ख़ूब सुर्खियां बटोरी थी.

नीतीश कुमार के बिहार की सत्ता संभालने के एक दशक बाद इस तस्वीर ने उनकी कार्यप्रणाली और 'न्याय के साथ विकास' वाली छवि पर प्रश्न खड़ा कर दिया. सरकार की ख़ूब फजीहत हुई.

सिलसिला आगे बढ़ता ही रहा. अगले साल यानी 2016 में हुए टॉपर स्कैम ने यह साबित कर दिया कि बिहार में फ़र्जी शिक्षक ही नहीं, फर्जी टॉपर भी बनाए जा सकते हैं.

इंटर परीक्षा की आर्ट्स टॉपर रुबी राय, साइंस टॉपर सौरभ श्रेष्ठ से जब मीडिया ने उनके विषयों से जुड़े कुछ आसान सवाल पूछे तो वे उनका उत्तर नहीं दे पाए. रुबी राय ने तो अपना फेवरिट सब्जेक्ट "प्रोडिकल साइंस" (पॉलिटिकल साइंस कहना चाहती थीं) बताया था.

जब सरकार की चहुं ओर फजीहत हुई तो जांच बिठाई गई, जिसमें बिहार बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष लालकेश्वर प्रसाद से लेकर बोर्ड के क्लर्क तक को घपले में शामिल पाया गया. यहां तक कि फर्जीवाड़े के सूत्रधार बच्चा राय के संबंध बिहार के राजनीतिक दलों से भी पाए गए. ये सभी जेल भेजे गए.

2017 में भी इंटर के आर्ट्स टॉपर गणेश कुमार भी फ़र्जी पाए गए और इस साल का बोर्ड का कारनामा सबके सामने है.

हर साल फूंक-फूंक कर कदम रखने वाला बिहार बोर्ड हर बार नए विवाद में फंसता है. परीक्षा और परिणाम के बाद नए-नए घोटाले सामने आते हैं. यह दर्शाता है कि बिहार की शिक्षा व्यवस्था में पढ़ने-पढ़ाने से लेकर परीक्षा तक में अव्यवस्था और भ्रष्टाचार हर कदम पर फैला है.

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सुधार के उपाय

पटना स्थित शोध संस्थान एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक सुनील रे का मानना है कि बिहार की शिक्षा में सुधार तब तक संभव नहीं है जब तक हर स्तर पर जिम्मेदारी तय न की जाए.

वो कहते हैं, "सरकार हर शिक्षक, प्रोफेसर और रिसर्चर से पूछे कि उनका आउटपुट क्या है. क्या वो जितनी सैलरी ले रहे हैं उस हिसाब से काम कर रहे हैं. बिहार में शिक्षकों की कमी ज़रूर है, पर जितने हैं क्या वो अच्छे से पढ़ा रहे हैं? इसकी मॉनिटरिंग होनी चाहिए. शिक्षकों को भी चाहिए वो अपनी जिम्मेदारी खुद तय करें."

सुनील रे मानते हैं कि शिक्षा व्यवस्था में जब तक व्याप्त भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा तब तक शिक्षा की बेहतरी नहीं हो सकती. शिक्षा ही है जो राज्य की प्रगति के रास्ते पर ले जा सकता है.

अगर सरकार मौजूदा संसाधनों को भी व्यवस्थित तरीके से चला ले तो स्थिति में सुधार हो सकती है.

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