योगी के 'दलित आरक्षण' के निशाने पर सिर्फ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ही क्यों?

  • 26 जून 2018
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दलितों के लिए अल्पसंख्यक संस्थानों में आरक्षण की मांग की है. रविवार को कन्नौज में उन्होंने कहा कि जब बनारस हिंदू विश्वविद्यालय दलितों को आरक्षण दे सकता है तो फिर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में ऐसा क्यों नहीं हो सकता?

योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस पर हमला करते हुए कहा, "एक प्रश्‍न यह भी उनसे पूछा जाना चाहिए कि जो कह रहे हैं कि दलितों का अपमान हो रहा है कि आखिर दलित भाइयों को अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में भी आरक्षण देने का लाभ मिलना चाहिए. वे इस बात को उठाने का कार्य कब करेंगे?"

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 (5) कहता है कि राज्य को किसी भी व्यावसायिक गतिविधि को चलाने या उन्हें रोकने के लिए सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए कोई विशेष प्रावधान करने से नहीं रोका जा सकता. इसके लिए शैक्षणिक संस्थान भी खोले जा सकते हैं और उनमें किसी दूसरे जाति/धर्म/भाषा के आधार पर अन्य पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं होगा, जिसे 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया और लागू कर दिया.

संविधान के मुताबिक अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान एससी/एसटी आरक्षण के दायरे से बाहर हैं. हालांकि मौजूदा सरकार इन्हें अल्पसंख्यक संस्थान नहीं मानती और मामला सुप्रीम कोर्ट में है.

मुद्दे की बात ये है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया मिल्लिया इस्लामिया ही सिर्फ़ ऐसे अल्पसंख्यक संस्थान नहीं हैं. देश में ऐसे ही और भी कई शैक्षणिक संस्थान हैं, जिनमें दलितों और पिछड़ों को आरक्षण नहीं मिलता.

जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

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जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की स्थापना 1920 में हुई थी और 1988 में इसका नाम केंद्रीय विश्वविद्यालय में जोड़ दिया गया.

जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में 50 प्रतिशत सीटें मुस्लिमों के लिए आरक्षित है.

  • 30 प्रतिशत सीट मुस्लिम आवेदकों के लिए.
  • 10 प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं के लिए.
  • 10 प्रतिशत मुस्लिम ओबीसी (पिछड़ी जाति) और एसटी (अनुसूची जनजाति) के लिए.

बाकि की 50 प्रतिशत सीटें जनरल आवेदकों के लिए है, जिनमें पांच प्रतिशत सीट दिव्यांगों के लिए आरक्षित है.

जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की जनसंपर्क अधिकारी साएमा सईद के मुताबिक अगर इनमें कुछ सीट खाली रह जाती हैं तो इन सीटों पर जनरल कैटेगरी के विद्यार्थियों को जगह दे दी जाती है और अगर कोई होनहार विद्यार्थी अच्छे नम्बर लाता है तो उसका नाम जनरल कैटेगरी में डाल दिया जाता है.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश

साल 1877 में मुस्लिम सुधारक और राजनेता सर सैयद अहमद खान ने मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की. 1920 में इसका नाम अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी हो गया.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में फिलहाल दो तरह का आरक्षण है. एक इंटरनल (आंतरिक) और दूसरा एक्सटर्नल (बाहरी).

एएमयू के पीआरओ शाफ़े किदवई ने बताया कि इंटरनल में वे विद्यार्थी आते हैं जो पहले एएमयू से पढ़े हों और पहली बार एमयू में दाखिला लेने वाले एक्सटर्नल कहलाते हैं. और दोनों के लिए 50 प्रतिशत- 50 प्रतिशत निर्धारित है. यहां हिंदू-मुस्लिम, एससी-एसटी आदि के लिए यानी धर्म या जाति के आधार पर कोई आरक्षण नहीं है.

उन्होंने ये भी बताया कि आरक्षण के लिए हाई कोर्ट में याचिका डाली गई थी लेकिन कोर्ट का कहना था कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है इसलिए इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में है. कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद ही किसको कितना आरक्षण दिया जायेगा तभी निर्धारित हो पायेगा.

खालसा कॉलेज, दिल्ली

श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय का हिस्सा है, जिसकी स्थापना 1951 में हुई थी. दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति (डीएसजीएमसी) इसका प्रबंधन करती है.

खालसा कॉलेज के प्रिंसिपल डॉक्टर जसविंदर सिंह बताते हैं कि यहां सिख अल्पसंख्यकों के लिए 50 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं. बाकी 50 प्रतिशत सीट को जनरल कैटेगरी के लिए रखा गया है.

सेंट स्टीफेंस कॉलेज, दिल्ली

1854 से मौजूदा सेंट स्टीफेंस स्कूल का नाम फरवरी, 1881 में कैम्ब्रिज मिशन ने सेंट स्टीफेंस कॉलेज में बदल दिया. अब ये दिल्ली विश्वविद्यालय का हिस्सा है.

सेंट स्टीफेंस कॉलेज के एसोसिएट डीन का कहना है कि 50 प्रतिशत सीट ईसाई अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित हैं और 50 प्रतिशत ओपन हैं.

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वेबसाइट पर अपलोड विवरण-पुस्तिका में सीट का विवरण में बताया गया है कि 50 प्रतिशत सीट ईसाई आवेदकों के लिए आरक्षित हैं, जो इस प्रकार है-

  • 17 प्रतिशत सीट (या कुल सीट का 8.5 प्रतिशत) एसटी क्रिश्चियन आवेदकों के लिए.
  • 5 प्रतिशत (या कुल सीट का 2.5 प्रतिशत) क्रिश्चियन दिव्यांग आवेदकों के लिए.
  • 45 प्रतिशत (या कुल सीट का 22.5 प्रतिशत) उत्तर भारत के ईसाइयों के लिए
  • बाकि 33 (या कुल सीट का 16.5) सीट सभी ईसाई आवेदकों के लिए है.

अन्य 50 प्रतिशत सीट का ब्यौरा इस प्रकार है-

  • 17 प्रतिशत (या कुल सीट का 8.5 प्रतिशत) अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए.
  • 5 प्रतिशत (या कुल सीट का 2.5 प्रतिशत) दिव्यांग आवेदकों के लिए.
  • बाकि 78 प्रतिशत (या कुल सीट का 39 प्रतिशत) जनरल मेरिट कैटेगरी के लिए.

दलितों का आरक्षण किया बंद

भारत में ऐसे ही कई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान हैं जिनमें उन्हें 50 प्रतिशत आरक्षण है लेकिन बाकी के 50 प्रतिशत सीट में दलितों और पिछड़ों के लिए कोई आरक्षण नहीं है. ये संस्थान अल्पसंख्यक भाषा और धर्म के आधार पर वर्गीकृत हैं.

दिल्ली का खालसा कॉलेज भी उनमें से एक है, जहां 50 प्रतिशत सीट सिखों के लिए आरक्षित हैं, लेकिन दलितों के लिए सीट आरक्षित नहीं है.

उसी प्रकार महाराष्ट्र के हाई कोर्ट में भी 2001 में एक याचिका डाली गई जिसमें अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित सीटों के अलावा बाकी सीटों (दलितों और पिछड़ों) को ओपन कैटेगरी के लिए रखे जाने की मांग थी.

हालांकि पिछले साल तक वहां 50 प्रतिशत अल्पसंख्यकों के अलावा 13 प्रतिशत एससी, 7 प्रतिशत एसटी, 3 प्रतिशत डीटी (ए), 2.5 प्रतिशत एनटी (बी), 3.5 प्रतिशत एनटी (सी), 2 प्रतिशत एनटी (डी) और 19 प्रतिशत ओबीसी के लिए आरक्षित थी.

जो इस साल से निर्धारित अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित सीट के अलावा और किसी को आरक्षण नहीं दिया जायेगा.

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मुंबई विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार अनिल कांबले बताते हैं, ''अल्पसंख्यक महाविद्यालयों में दलितों और पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने के विरोध में साल 2001 में मुंबई के सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज ने एक याचिका दाखिल की थी. इस याचिका पर अंतिम फ़ैसला 2017 में आया, जिसमें फ़ैसला सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज के पक्ष में आया.''

इस फ़ैसले के आने के बाद इस साल से महाराष्ट्र के सभी अल्पसंख्यक महाविद्यालयों में इसे लागू किया कर दिया गया है.

इसके विरोध में कई राजनीतिक पार्टियों से जुड़े छात्र आगे आए हैं. महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) छात्रसंघ से जुड़े अमूल मटाले और उनके साथी राज्य के सोशल वेलफेयर से जुड़े राजकुमार बादोले और शिक्षा मंत्री विनोद तापडे के पास इस मांग के साथ गए थे कि दलितों और पिछड़े वर्ग का आरक्षण खत्म न करें.

उनकी मांग पर संज्ञान देते हुए मामला फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट के पास चला गया है, जिसके फ़ैसले के बाद ही महाराष्ट्र में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान में आरक्षण का मामला साफ़ होगा.

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