शाहूजी महाराज: जिन्होंने 1902 में आरक्षण लागू किया

  • 26 जून 2018
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कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति शाहूजी ने अपने दलित सेवक गंगाराम कांबले की चाय की दुकान खुलने पर वहाँ चाय पीने जाने का फ़ैसला किया, पिछली सदी के शुरुआती वर्षों में यह कोई मामूली बात नहीं थी.

उन्होंने कांबले से पूछा, "तुमने अपनी दुकान के बोर्ड पर अपना नाम क्यों नहीं लिखा है?" इस पर कांबले ने कहा कि "दुकान के बाहर दुकानदार का नाम और जाति लिखना कोई ज़रूरी तो नहीं."

महाराजा शाहूजी ने चुटकी ली, "ऐसा लगता है कि तुमने पूरे शहर का धर्म भ्रष्ट कर दिया है."

26 जून 1874 को पैदा हुए शाहूजी कोई मामूली राजा नहीं थे बल्कि महाप्रतापी छत्रपति शिवाजी महाराज के वशंज थे.

कांबले की दुकान पर महाराजा के चाय पीने की ख़बर कोल्हापुर शहर में जंगल की आग की तरह फैल गई. इस अदभुत घटना को अपनी आँखों से देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटे.

महाराजा ने भारी भीड़ की मौजूदगी में कांबले की चाय का आनंद लिया, उनमें से कई लोगों को शायद मालूम नहीं था कि चाय की दुकान खोलने के लिए कांबले को शाहूजी ने ही पैसे दिए थे.

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चाय पीने के बाद महाराजा ने गंगाराम कांबले से कहा कि "सिर्फ़ चाय ही नहीं, बल्कि सोडा बनाने की मशीन भी खरीद लो". राजर्षि महाराज के नाम से मशहूर शाहू जी ने कांबले को सोडा मशीन के लिए भी पैसे दिए.

गंगाराम की दुकान कोल्हापुर के भाऊसिंहजी रोड पर अब से 100 साल से भी पहले शुरू हुई थी, ये कोई मामूली शुरूआत नहीं थी.

भाषण नहीं, ठोस काम

जातिवादी भेदभाव देश के अन्य हिस्सों की तरह महाराष्ट्र के कोल्हापुर में भी अपने चरम पर था, शाहूजी महाराज ने इससे सामाजिक बुराई से निबटने के लिए बहुत रचनात्मक रास्ते अपनाए, भाषण देने की जगह वे काम से मिसाल कायम करना चाहते थे.

वे आंबेडकर के भी संपर्क में रहे और जाति के आधार पर भेदभाव को दूर करने की दिशा में काम करने की सोच रखते थे.

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1902 में उन्होंने अपने राज्य में आरक्षण लागू कर दिया जो एक क्रांतिकारी क़दम था, उन्होंने सरकारी नौकरियों में पिछड़ी जाति के पचास प्रतिशत लोगों को आरक्षण देने का फ़ैसला किया.

यह एक ऐसा फ़ैसला था जिसने आगे चलकर आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था करने की राह दिखाई. उन्होंने अपने शासन क्षेत्र में सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी तरह के छूआछूत पर क़ानूनन रोक लगा दी थी.

उनका अंदाज़ बहुत अलग था, कई बार वे जातिवाद पर सीधे वार करते, कभी प्यार से समझाने की कोशिश करते तो कई बार मज़ाक-मज़ाक में अपनी बात कह जाते थे.

उस दौर में ज़्यादातर लोग गंभीरता से मानते थे कि किसी दलित के छू जाने से उनका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा, दलितों को मंदिरों और कई सार्वजनिक स्थानों पर जाने से रोका जाता था.

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अपनी मृत्यु से दो साल पहले 1920 में शाहू जी महाराज ने नागपुर में 'अखिल भारतीय बहिष्कृत परिषद' की बैठक में न सिर्फ़ हिस्सा लिया उन्होंने एक दलित चाय बनवाकर पी, ऐसा उन्होंने कई मौक़ों पर किया.

जिस समाज में छूआछूत को धर्म और परंपरा माना जाता था उस समाज में छत्रपति शिवाजी के वशंज का ऐसा करना नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता था, उस पर बहुत चर्चा होती थी, यही शाहू जी महाराज भी चाहते थे कि चर्चा के बाद ही जागरुकता आएगी.

1920 में ही उन्होंने दलित छात्रों के लिए एक हॉस्टल के निर्माण का शिलान्यास किया.

पिटाई और चाय की दुकान की कहानी

गंगाराम शाहूजी के महाराज के कर्मचारियों के लिए बने क्वार्टर में रहते थे. एक बार राजमहल के भीतर बने तालाब के पास एक मराठा सैनिक संताराम और ऊंची जाति के कुछ लोगों ने गंगाराम कांबले को बुरी तरह पीटा, उनका कहना था कि दलित गंगाराम ने तालाब का पानी छूकर उसे अपवित्र कर दिया था.

उस वक़्त शाहूजी महाराज कोल्हापुर में नहीं थे, जब वे लौटकर आए तो गंगाराम ने रोते-रोते अपनी पूरी बात उन्हें बताई. इस पर शाहूजी बहुत नाराज़ हुए और उन्होंने संताराम को घोड़े के चाबुक से पीटा और नौकरी से निकाल दिया.

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इसके बाद उन्होंने गंगाराम से कहा कि मुझे दुख है कि मेरे राजमहल के भीतर ऐसी घटना हुई. उन्होंने गंगाराम कांबले से कहा कि तुम्हें अपना काम शुरू करना चाहिए. इसके बाद शाहूजी महाराज ने उन्हें पैसे दिए जिससे चाय की दुकान की शुरूआत हुई. ये कोई मामूली बात नहीं थी.

गंगाराम कांबले ने अपनी दुकान का नाम 'सत्यसुधारक' रखा, उनके दुकान की सफ़ाई और चाय का स्वाद बेहतरीन था लेकिन उच्च जाति के लोगों ने उनका बहिष्कार किया, वे बहुत नाराज़ थे कि एक दलित चाय पिला रहा है.

जब ये बात शाहूजी महाराज को पता चली तो उन्होंने चाय पीकर इस धारणा को चुनौती देने का फ़ैसला किया. शाहूजी अच्छी तरह समझते थे कि समाज आदेशों से नहीं बल्कि संदेशों और ठोस पहल से बदलता है.

शाहूजी महाराज न सिर्फ़ खुद चाय पीते, उच्च जाति के अपने कर्मचारियों को भी वहीं चाय पिलवाते, अब किसकी मजाल की राजा को ना कहे.

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