नज़रिया: गांधी समाधि पर ताला और विश्व हिंदू परिषद की बैठक के मायने

  • 28 जून 2018
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पिछले दिनों एक अभूतपूर्व घटना हुई जब महात्मा गांधी की समाधि राजघाट पर 24 जून को ताला लगा दिया गया जो 25 जून को दिन के ग्यारह बजे खुला.

महात्मा गांधी की समाधि बनने के बाद से यह पहली बार ही हुआ है कि बगैर किसी औचित्य और समुचित सूचना दिए राजघाट को आम लोगों के लिए इस तरह बंद कर दिया गया.

देश की राजधानी दिल्ली के राजघाट पर महात्मा गांधी की इस समाधि पर देश-दुनिया के हज़ारों लोग हर दिन प्रणाम करने और प्रेरणा लेने आते हैं.

यह बापू को किसी सरकार का दिया पद्म-पुरस्कार नहीं है, लोकमानस में प्रतिष्ठित उनकी वह पवित्र प्रतिमा है जिसकी न चमक धुंधली पड़ती है, न जिसके प्रति आस्था ख़त्म होती है.

रविवार 24 जून 2018 को काग़ज़ पर लिखी एक सूचना राजघाट के प्रवेश-द्वारों पर चिपकी पाई गई जो बता रही थी कि राजघाट उन सबके लिए बंद है जो बापू की स्मृति में सिर झुकाने वहां आए हैं.

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यह फ़ैसला किसने किया, क्यों किया और जो आज तक कभी नहीं हुआ था, वैसे फ़ैसले के पीछे कारण क्या रहा, इसकी कोई जानकारी नागरिकों को दी नहीं गई.

पता नहीं कब से यह शर्मनाक कुप्रथा चलने लगी कि जब भी कोई देशी-विदेशी कुर्सीधारी औपचारिकताएं पूरी करने राजघाट आता है तो वक्ती तौर पर राजघाट सामान्य जनता के लिए बंद कर दिया जाता है.

सिर्फ़ वीआईपी गेट खुला होता है जिससे तथाकथित वीआईपी भीतर आते हैं, सोचता हूँ कि यदि गांधी होते तो इसे क़तई बर्दाश्त न करते.

विश्व हिंदू परिषद की बैठक

सच यह है कि 24-25 जून 2018 को राजघाट के ठीक सामने स्थित गांधी स्मृति व दर्शन समिति के परिसर में विश्व हिंदू परिषद की बैठक चल रही थी जिसकी सुरक्षा के नाम पर राजघाट पर ही ताला जड़ दिया गया.

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यह भी पता नहीं है कि गांधी स्मृति व दर्शन समिति, जो गांधीजी की स्मृतियों और विचार को जीवंत रखने के उद्देश्य से बनाई गई थी, उसे किसी निजी संस्था की बैठक के लिए किस आधार पर दिया गया और वह भी विश्व हिंदू परिषद जैसी संस्था को जिसका एकमात्र उद्देश्य गांधी की स्मृति और दर्शन से देश को दूर ले जाना है.

महात्मा गांधी के आदर्शों और विचारों से विश्व हिंदू परिषद का हमेशा छत्तीस का नाता ही रहा है.

विश्व हिंदू परिषद हो कि दूसरी कोई भी संस्था, लोकतंत्र में सबको हक़ है ही कि वे अपनी बैठकें अपनी सुविधा की जगहों पर करें, लेकिन किसी को भी यह हक़ नहीं है कि वह किसी सार्वजनिक जगह का मनमाना इस्तेमाल करे.

बापू-समाधि जैसी पवित्र जगह तो किसी सार्वजनिक स्थल की श्रेणी में भी नहीं आता जिसका सरकार या सरकार समर्थित संस्था अपने हित के लिए मनमाना इस्तेमाल करे, जब चाहे उस पर ताला मार दे.

जिस हिंदू महासभा ने हमेशा माना कि गांधी की हत्या नहीं हुई, उनका वध किया गया. जो उनके मुताबिक़, देशहित में किया गया एक अनिवार्य और सराहनीय कार्य था, यह वही संस्था है जिसके लोग गोडसे की मूर्तियाँ लगा रहे हैं, जो गांधी पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने हिंदुओं को 'कायर' बना दिया. विश्व हिंदू परिषद उसी विचारधारा की नई पीढ़ी है.

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'हिंदुत्व को हमेशा मानवता के ऊपर रखा'

सत्ता के संरक्षण से हिंदुत्ववादी संगठनों को कथित तौर पर नया उत्साह और कुछ भी करने का लाइसेंस मिल गया है. यह जन्म से ही जातीय श्रेष्ठता के दर्शन में विश्वास करने वाली संस्था है जिसने हिंदुत्व को हमेशा मानवता के ऊपर रखा है जो गांधी के दर्शन के ठीक विपरीत है.

सरकार, आरएसएस और मोदी जो बहुसंख्यक हिंदुओं को धर्म के आधार पर अपनी स्थायी राजनीतिक पूंजी बनाने के अभियान में जुटे हैं उनका ज़मीनी काम विश्व हिंदू परिषद कर रही है.

ऐसे मंसूबे तभी कारगर होते हैं जब परदे के पीछे उनकी तैयारी की जाए. सांप्रदायिक ताकतों ने गांधी से सारी लड़ाई परदे के पीछे से लड़ी और उनकी हत्या भी तो परदे की आड़ में ही की गई. बाहर-बाहर गांधी का आदर भी होता रहा और अंदर ही अंदर उन्हें ख़त्म करने पर काम भी चलता रहा.

गांधी दर्शन व स्मृति समिति और राजघाट पर पर्दा तानकर विश्व हिंदू परिषद की बैठक हुई जिसमें राम मंदिर बनाने की योजना बनाई गई और घोषणा भी की गई कि अदालत के फ़ैसले की परवाह किए बिना 2019 में चुनाव से पहले अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कार्य शुरू कर दिया जाएगा.

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शुचिता के वैश्विक अग्रदूत रहे गांधी

एक संत नामधारी व्यक्ति ने कहा कि जब हमने मस्जिद का ढांचा अदालत के आदेश से नहीं तोड़ा था तब उसे बनाने में अदालत की अनुमति क्यों लें? मतलब सीधा है- सरकार ऐसी बातें कहने की छूट देती है जिससे तनाव और हिंसा का वातावरण बनता है, बड़े नेता 'समरसता' की बात करते रहते हैं जबकि विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता उग्र नारों के साथ त्रिशूल लहराते हैं.

ये वे ही लोग हैं जो ढलती शाम में गांधी को गोली मारते हैं और फिर उन्हें प्रात: स्मरणीय लोगों में शामिल कर लेते हैं.

छद्म और असत्य को लक्ष्य प्राप्ति का साधन मान लिया जाए तो बिना ग्लानि के कुछ भी किया जा सकता है. गांधी साधन की शुचिता के वैश्विक अग्रदूत रहे हैं, उनकी समाधि जिन लोगों की सुरक्षा के नाम पर आम जनता के लिए बंद की गई उनके मूल्य और सिद्धांतों का परिचय हम 30 जनवरी 1948 और 6 दिसंबर 1992 को पा चुके हैं.

राजघाट की तालाबंदी निरंकुश मानसिकता की उपज है जो राष्ट्र-भावना का अपमान भी करती है और उसे खुली चुनौती भी देती है. गांधी ग़ायब कर दिए गए हैं, सिर्फ़ उनका चश्मा रह गया है, लेकिन याद रखिए कि गांधी ने क्या कहा था. उन्होंने कहा था कि "चाहे मुझे कितने गहरे क़ब्र में दफ़न कर दो मैं वहीं से आवाज़ लगाता रहूँगा!" सुनिए, वे आवाज़ लगा रहे हैं. आप सुन पा रहे हैं क्या?

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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