जगन्नाथ मंदिर में राष्ट्रपति कोविंद के साथ दुर्व्यवहार का सच क्या

  • 28 जून 2018
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Image caption राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद अपनी पत्नी सविता कोविंद के साथ

राष्ट्रपति भवन ने पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और उनकी पत्नी सविता कोविंद के साथ सेवायतों (पंडाओं) द्वारा दुर्व्यय्व्हार किए जाने पर गहरा असंतोष व्यक्त किया है.

यह घटना 18 मार्च को राष्ट्रपति कोविंद और उनकी पत्नी के प्रभु जगन्नाथ के दर्शन के समय हुई लेकिन इस बात का पता मंगलवार को चला जब 20 मार्च को हुई मंदिर प्रबंधन कमिटी की बैठक का ब्योरा मीडिया के सामने आया.

मीडिया में लीक हुई बैठक की 'मिनट्स' में कहा गया है, "महामहिम राष्ट्रपति जब रत्न सिंहासन (जिस पर प्रभु जगन्नाथ विराजमान होते हैं) पर माथा टेकने गए तो वहाँ उपस्थित खुंटिया मेकाप सेवकों ने उनके लिए रास्ता नहीं छोड़ा. कुछ सेवक महामहिम राष्ट्रपति के शरीर से चिपक रहे थे यहाँ तक कि महामहिम राष्ट्रपति की पत्नी, जो भारतवर्ष की 'फर्स्ट लेडी' हैं, उनके सामने भी आ गए थे. इस बात को लेकर राष्ट्रपति भवन की ओर से असंतोष व्यक्त किया गया है."

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Image caption राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 18 मार्च को मंदिर के दर्शन के लिए गए थे

दक्षिणा को लेकर सेवायत की शिकायत

सूत्रों के मुताबिक़, राष्ट्रपति ने पुरी छोड़ने से पहले ही ज़िलाधीश अरविंद अग्रवाल से अपना असंतोष ज़ाहिर कर दिया था. उनके जाने के कुछ ही देर बाद एक सेवायत दामोदर महासुआर ने मीडिया के सामने इस बात को लेकर शिकायत दर्ज कराई कि राष्ट्रपति की ओर से उन्हें 'एक रुपया' भी दक्षिणा नहीं मिली.

इस प्रकरण पर बैठक के विवरण में कहा गया है, "ज़िलाधीश ने कहा कि कौलिक पण्डे के खाते में महामहिम राष्ट्रपति दस्तख़त नहीं करेंगे. इस बारे में राष्ट्रपति भवन की ओर से उन्हें आख़िरी वक़्त पर अवगत करा दिया गया था. उनके कौलिक पण्डे को तत्काल इस बारे में सूचित भी किया गया था पर महामहिम राष्ट्रपति के लौटने के बाद एक सेवायत ने मीडिया के सामने जिस प्रकार का बयान दिया, उसे लेकर भी राष्ट्रपति भवन ने असंतोष व्यक्त किया है."

राष्ट्रपति और उनकी पत्नी के साथ बुरा बर्ताव जितना आश्चर्यजनक है, उससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि राष्ट्रपति द्वारा असंतोष व्यक्त किए जाने और मंदिर प्रबंधन कमिटी की बैठक में उस पर चर्चा होने के तीन महीने बाद भी मंदिर प्रशासन ने अभी तक इस संवेदनशील मामले में किसी के ख़िलाफ़ कोई कारवाई नहीं की है.

इन तीन महीनों में मंदिर प्रशासन ने अगर कुछ किया है तो वह यह कि इस पूरे क़िस्से पर पर्दा डालने की कोशिश की गई. हमने इस सन्दर्भ में ज़िला प्रशासन और मंदिर प्रशासन से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन इस प्रकरण पर बोलने के लिए कोई भी अधिकारी तैयार नहीं हुआ.

इस बात के सामने के आने के बाद ज़िला और मंदिर प्रशासन इस घटना की जांच कर रहे हैं.

सेवायतों को नाराज़ नहीं करना चाहती सरकार?

माना जा रहा है की 14 जुलाई को होने वाली रथ यात्रा के मद्देनज़र मंदिर प्रशासन और राज्य सरकार सेवायतों को नाराज़ नहीं करना चाहती क्योंकि उनकी नाराज़गी रथ यात्रा की रीति-नीतियों में बाधा डाल सकती है.

हालांकि, दैतापति नियोग के संयुक्त सचिव विनायक दासमहापात्र इस घटना के लिए ज़िला और मंदिर प्रशासन को पूरी तरह से ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

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उनका कहना है, "अगर किसी सेवयात ने राष्ट्रपति से दुर्व्यवहार किया था तो तत्काल वहीं इनके ख़िलाफ़ कारवाई क्यों नहीं की गई? कम से कम मंदिर प्रबंधन कमिटी के बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा के बाद क्यों कारवाई नहीं की गई? तीन महीने से मंदिर प्रशासन क्या कर रहा था?"

जगन्नाथ संस्कृति के जानकार प्रफुल्ल रथ पुरी मंदिर में बीच-बीच में हो रही इस तरह की घटनाओं के लिए सेवायतों की दक्षिणा लेने की प्रथा को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

उन्होंने कहा, "जब तक मंदिर में दान, दक्षिणा जैसे गुप्त आय की व्यवस्था चलती रहेगी तब तक इस तरह के वाक़ये होते रहेंगे. सेवायतों को उनकी जायज़ दक्षिणा मिले लेकिन जो राशि प्रभु जगन्नाथ को दान में दी जाती है, वह जगन्नाथ के पास ही जाए."

रत्नभंडार की चाबी गुम हो जाने के मामले में पहले ही मंदिर प्रशासन और नवीन पटनायक सरकार दोनों असमंजस की स्थिति में हैं. अब राष्ट्रपति को लेकर उठे इस नए विवाद ने दोनों के सिरदर्द को और बढ़ा दिया है.

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