बिहार पुलिस में ज़्यादा लड़कियां चुनी गईं, लड़कों का 'आक्रोश मार्च'

  • 30 जून 2018
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बिहार में सिपाही पद के लिए हुई बहाली में महिलाओं ने ज़बरदस्त क़ामयाबी हासिल की है.

ऐसा पहली बार है जब बिहार पुलिस की बहाली में दो-तिहाई से अधिक पदों पर महिलाएं चुनकर आई हैं.

11 जून को 9,900 सिपाहियों की बहाली के नतीजे आये थे. इन पदों के लिए 6,643 महिलाओं और 3,196 पुरुषों का चयन हुआ है. यानी 67.52 फ़ीसदी पदों पर महिलाएं चुनी गई हैं. जबकि पुरुष महज 32.48 फ़ीसद पदों पर ही चयनित हुए.

जनवरी 2016 में बिहार सरकार ने महिलाओं को हर प्रकार की सरकारी नौकरियों में 35 फ़ीसदी आरक्षण देने का फ़ैसला किया था. पुलिस की बहालियों में तो ये आरक्षण इस फ़ैसले के पहले से ही लागू था.

लेकिन बिहार के पुलिस महानिदेशक के.एस. द्विवेदी के मुताबिक़, इस बार की परीक्षा में महिलाओं का दो-तिहाई पदों पर चुन कर आना आरक्षण नहीं, बल्कि उनकी योग्यता के दम पर संभव हुआ है.

उन्होंने बीबीसी को बताया, ''अनुसूचित जाति वर्ग की महिलाओं को छोड़कर अन्य किसी वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षण के उपभोग की आवश्यकता ही नहीं पड़ी. मतलब ये कि हर वर्ग में जितनी रिक्तियां थीं, उसपर महिलाएं अपनी मेरिट की बदौलत चयनित हुई हैं.''

द्विवेदी कहते हैं, ''ऐसा नहीं है कि इस बार महिलाओं के लिए योग्यता के मापदंड़ों में पहले के मुक़ाबले कोई ढील दी गई हो. चयन प्रक्रिया दोनों के लिए एक ही है. लेकिन शारीरिक दक्षता की जो परीक्षा होती है, उसके मापदंड थोड़े अलग होते हैं. और ऐसा पहले से ही है.''

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कामयाब महिलाएं और उनका मक़सद

बेगूसराय ज़िले के बीहट से वास्ता रखने वाली अंशु कुमारी भी सिपाही चुनी गई हैं.

अंशु कबड्डी की नेशनल लेवल की खिलाड़ी रहीं हैं. उन्होंने बताया, ''यहाँ तक आने के लिए मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ी है. स्पोर्ट्स से ताल्लुक होने के कारण शारीरिक परीक्षा की तैयारी मेरे लिए आसान रही. लेकिन लिखित परीक्षा के लिए मुझे मेहनत करनी पड़ी.''

अंशु कहती हैं, ''मैं अपने अगल-बगल देखती हूं तो महिलाओं को बहुत असुरक्षित पाती हूं. मैं चाहूंगी कि मेरी कोशिशों से वे आगे ऐसा महसूस न करें.''

भोजपुर की आफ़रीन गज़ाला और कटिहार की शहज़ादी नाज़ भी उन हज़ारों लड़कियों में शामिल हैं जो इस बार सिपाही बनने में कामयाब रहीं.

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Image caption आफ़रीन गज़ाला और शहज़ादी नाज़ (दायें)

पटना कॉलेज के गेट पर उन दोनों से मुलाक़ात हुई. दोनों के चेहरे पर खुशी थी. साथ ही उनका आत्म-विश्वास उनकी सफलता की कहानी को साफ बयां कर रहा था.

आफ़रीन ने कहा, ''अभी हमारे समाज में बहुत बुराई है. आम लोगों को जो सुविधाएं मिलनी चाहिए वो नहीं मिलती हैं तो हमने ये सोचा कि हम पुलिस डिपार्टमेंट में जाकर आम लोगों की सहायता कर सकते हैं.''

आफ़रीन और शहज़ादी नाज़ को लगता है कि वो पुलिस में शामिल होने के बाद ग़रीब और कमज़ोर लोगों की मदद कर सकेंगी.

दोनों की ही राय है कि बेटियों को कमज़ोर न समझा जाये. उन्हें समाज की कुरीतियों में उलझाकर न रखा जाये.

शहज़ादी ने कहा कि लड़कियों को अगर पढ़ने का मौक़ा मिलेगा तो वो जरूर कुछ करके दिखायेंगी.

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मुस्लिम महिलाओं की मौजूदगी

आफ़रीन और शहज़ादी जैसी दर्जनों अन्य मुस्लिम महिलाएं भी इस बार सिपाही पद की भर्ती में चुनी गई हैं.

पुलिस बल में मुस्लिम महिलाओं का चुना जाना इसलिए भी ख़ास है क्यूंकि पहले पुलिस में इक्का-दुक्का मुस्लिम महिलाएं ही नज़र आती थीं.

पुलिस बल में बेपर्दा रहने, वर्दी, रात-दिन की ड्यूटी जैसी वजहों से बहुत सारे मुस्लिम परिवारों की महिलाएं अनुकंपा की नौकरी भी जॉइन करने से कतराती थीं.

लेकिन मुस्लिम युवतियों का धीरे-धीरे सीधे पुलिस बल में बहाल होना, इन युवतियों के जज़्बे, मुस्लिम समाज के बदलते नज़रिये के साथ-साथ बिहार सरकार की मदद से मुमकिन हो पाया है.

बिहार सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की एक योजना है राज्य अल्पसंख्यक कोचिंग योजना. इस योजना के तहत बिहार राज्य हज समिति के द्वारा पटना स्थित हज भवन में पुलिस बहाली के साथ-साथ अन्य परीक्षाओं के लिए भी कोचिंग मुहैया कराई जाती है.

हज भवन ने इस बार उनासी लड़कियों को शारीरिक परीक्षा के लिए कोचिंग मुहैया कराई थी. इनमें से 56 लड़कियाँ कामयाब रहीं.

बिहार राज्य हज समिति के सीईओ मोहम्मद राशिद हुसैन बताते हैं, ''अब तक का हमारा प्रयास काफी सफल रहा है. पहले भी यहाँ की कोचिंग से जेल पुलिस, अग्नि पुलिस, बिहार पुलिस में ड्राइवर जैसे पदों पर मुस्लिम महिलाओं को सफलता मिली है. हम लोग इच्छुक हैं कि इस प्रयास को विस्तार दिया जाए. अभी हम शारीरिक परीक्षा की तैयारी कराते हैं. आने वाले दिनों में हम लिखित परीक्षा की तैयारी भी कराना शुरू करेंगे.''

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Image caption बिहार राज्य हज समिति के सीईओ मोहम्मद राशिद हुसैन

विरोध-प्रदर्शन

हालांकि महिलाओं की ये कामयाबी क़रीब तीन हफ़्ते बाद एक दूसरी वजह से भी चर्चा में है. इन चैंकाने वाले नतीजों को रद्द करने की मांग करते हुए लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं.

बिहार पुलिस असफल प्रत्याशी संघ नाम के बैनर तले अब तक क़रीब एक दर्जन से ज़्यादा विरोध-प्रदर्शन हो चुके हैं.

बुधवार को असफल कैंडीडेट्स ने जहाँ पटना के सबसे व्यस्त चौक (डाक बंगला चैराहे) पर ज़बरदस्त प्रदर्शन किया तो अभी गर्दनीबाग में उनका धरना चल ही रहा है.

इन विरोध-प्रदर्शनों की अगुवाई करने वालों में से एक पुनपुन यादव पुलिस विभाग पर धांधलेबाज़ी का आरोप लगाते हैं.

वो कहते हैं, ''बिहार पुलिस की बहाली के विज्ञापन के नियमों के अनुसार रिजल्ट निकाला जाना चाहिए था, लेकिन बिहार सरकार ने लड़कियों के पक्ष में एकतरफा रिजल्ट जारी किया है. लड़कों ने कट-ऑफ़ हासिल किया लेकिन उनका चयन मेरिट लिस्ट में नहीं हुआ. मेरिट लिस्ट में धांधली हुई है. ये जाँच का विषय है.''

असफल कैंडीडेट्स ने इस नतीजे को हाई कोर्ट में भी चुनौती दी है.

पुनपुन यादव के मुताबिक़ अदालत ने ये याचिका स्वीकार कर ली है.

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ज़्यादा लड़कियों के आने से कोई फ़र्क नहीं

हालांकि बिहार के पुलिस महानिदेशक के.एस. द्विवेदी इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज करते हैं.

वो कहते हैं, ''असफलता ही उनके विरोध का कारण है. नीति, नियम, प्रक्रिया वकेंसी के विज्ञापन के समय का ही है. उस समय किसी ने विरोध नहीं किया था. लड़कियाँ मेहनत कर के आई हैं. उनका स्वागत होना चाहिए. महिलाओं की सफलता की वजह ये है कि उनके बीच जागरूकता बढ़ी है. इस बार उन्होंने अधिक संख्या में परीक्षा में भाग भी लिया. अंतिम चयन अब शारीरिक दक्षता परीक्षा पर होता है. इसमें महिलाओं ने अधिक अंक प्राप्त किये. इसलिए उनका अधिक सेलेक्शन हुआ.''

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Image caption बिहार के पुलिस महानिदेशक के.एस. द्विवेदी

दूसरी ओर पुलिस महकमे में दबी जुबां में एक चर्चा ये भी है कि ज़्यादा महिलाओं के आने से पुलिस के काम-काज पर असर पड़ेगा.

कहा जा रहा है कि रात वाली ड्यूटी, छापेमारी जैसे काम को ज़्यादा महिलाओं के भरोसे कैसे छोड़ा जा सकता है.

केएस द्विवेदी कहते हैं, ''इससे मैं सहमत नहीं हूं. ये पुरुष प्रधान मानसिकता का प्रतीक है. हमने इतनी बड़ी तादाद में पहले महिलाओं को देखा नहीं है. लेकिन इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा.''

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