फ़सलों की MSP कहीं चुनावी फ़सल काटने की मजबूरी तो नहीं

  • 5 जुलाई 2018
किसान, एमएसपी, न्यूनतम समर्थन मूल्य, स्टेट एडवाइज्ड प्राइस, एसएपी, राज्य परामर्श मूल्य, कृषि लागत और मूल्य आयो, सीएसीपी इमेज कॉपीरइट PTI

आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने बुधवार को साल 2018-19 (जुलाई-जून) की ख़रीफ़ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में उत्पादन लागत पर 50 फ़ीसदी लाभ के साथ वृद्धि की घोषणा की.

मंत्रिमंडल की बैठक में लिए गए फ़ैसले की जानकारी देते हुए केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि सरकार ने किसानों को उनकी फ़सलों की लागत का डेढ़ गुना एमएसपी देने का ऐतिहासिक फ़ैसला किया है जिससे अर्थव्यवस्था को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा.

इससे धान, ज्वार, बाजरा, मूंगफली, सोयाबीन, रागी, उड़द, तुअर, कपास, सूरजमुखी, तिल आदि फसलों के किसानों को लाभ मिलेगा. हालांकि केंद्र सरकार को एमएसपी में बढ़ोतरी से 15,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च करना होगा.

लेकिन किसानों की लागत तय करने के लिए सरकार ने क्या फ़ॉर्मूला अपनाया और इस बढ़े हुए समर्थन मूल्य का फ़ायदा किसानों तक वो कैसे पहुंचाएगी सरकार?

इसी मसले को लेकर बीबीसी संवाददाता आदर्श राठौर ने केंद्र सरकार के पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन से बात की.

पढ़ें सिराज हुसैन का नज़रिया-

पंजाब, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के किसानों के लिए यह अच्छी ख़बर है क्योंकि इनके धान सरकारी एजेंसियां ख़रीद लेती हैं.

इन राज्यों के किसानों को उनके धान की 11 से 13 फ़ीसदी अधिक क़ीमत मिलेगी, लेकिन जिन किसानों की फ़सल सरकार नहीं ख़रीदती उनको इसका इंतजार रहेगा कि सरकार उन्हें इस बढ़े हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य का फ़ायदा कैसे पहुंचाएगी. ये सरकार के सामने भी एक बहुत बड़ी चुनौती है.

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कैसे मापा जाता है एमएसपी?

कृषि पर लागत का अध्ययन कृषि मंत्रालय सभी राज्यों में करवाती है. इस अध्ययन से मालूम होता है कि किसी राज्य में किसी फ़सल को उगाने पर लागत कितनी आती है.

उसको ध्यान में रखते हुए और बाकी अन्य सेक्टर को ध्यान में रखते हुए, कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) भारत सरकार को अपनी संस्तुति देता है कि किसी फ़सल का न्यूनतम समर्थन मूल्य कितना होना चाहिए.

कोशिश ये होती है कि 70 फ़ीसदी उत्पादन को न्यूनतम समर्थन मूल्य कवर कर ले. फिर भी कुछ राज्य ऐसे रह जाएंगे कि वहां फ़सल पर लागत समर्थन से ज़्यादा होगी. राज्य की कृषि पर लागत को सीएसीपी ध्यान में रखता है.

केंद्र ने महंगाई को किया काबू

हर साल चार पांच फ़ीसदी की बढ़ोतरी हो रही थी. मोदी सरकार जब बनी थी तो खाने पीने की चीज़ों की महंगाई बहुत अधिक थी.

उस महंगाई को काबू करने के लिए बहुत अच्छा काम किया गया है. उन्होंने न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी कर चार-पांच फ़ीसदी के बीच में रखने के साथ उसे काबू में रखने की कोशिश की थी.

इसकी वजह से केंद्र सरकार महंगाई को काबू करने में सफल हो सकी.

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न्यूनतम समर्थन मूल्य इतना अधिक क्यों?

इस साल न्यूनतम समर्थन मूल्य में इतनी वृद्धि एक फ़ॉर्मूले के तहत की गई है. इस साल अंतरराष्ट्रीय स्थिति क्या है, निर्यात के क्षेत्र में होड़ क्या है, किसी कमॉडिटी की मांग क्या है, उस पर गौर नहीं किया गया.

इस बार केवल कृषि पर लागत को देखा गया और उसमें 50 फ़ीसदी वृद्धि कर दी गई. आम तौर पर महंगाई के प्रभाव को देखते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाया जाता है, लेकिन चुनावी साल की अपनी मजबूरियां होती हैं.

क्या है एसएपी?

राज्य सरकारों को यह अधिकार नहीं है कि वो अलग से न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करे. लेकिन कई राज्य अलग से आकलन करते हैं और इसके आधार पर स्टेट एडवाइज्ड प्राइस (एसएपी) या राज्य परामर्श मूल्य तय करते हैं.

उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्य मिलों के लिए अपनी ओर से गन्ने का अपना राज्य परामर्श-मूल्य (एसएपी) घोषित करते हैं जो केंद्र द्वारा तय मूल्य से अधिक होता है.

इसी तरह से मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ धान और गेहूं पर बोनस दे रहे थे. जब 2014 में मोदी सरकार आई तो उन्होंने इन दोनों राज्यों से कहा कि बोनस नहीं दें. अगर देंगे तो पीडीएस की ज़रूरत से ज़्यादा आपका धान और चावल नहीं लिया जाएगा. उन दोनों राज्यों से बोनस बंद कराया गया.

अब एक बार फिर चुनाव का साल आ गया है. अगले साल लोकसभा के चुनाव होने हैं. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव उससे पहले होना है. तो राजनीतिक मजबूरियों के कारण वहां एक बार फिर बोनस की घोषणा कर दी गई है.

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