'हिंदुत्ववादी' बयान क्यों देते हैं बीजेपी के शिया नेता?

  • समीरात्मज मिश्र
  • लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
भाजपा नेता मोहसिन रज़ा

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भाजपा नेता मोहसिन रज़ा

2014 के लोकसभा और 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने भले ही एक भी मुसलमान को टिकट ना दिया हो लेकिन ऐसा नहीं है कि उसके संगठन में मुस्लिम समुदाय के लोग नहीं हैं.

हिंदुत्ववादी कही जाने वाली एक पार्टी में अपनी आस्था के प्रदर्शन के लिए कई बार मुस्लिम भाजपाई नेता इतने उत्साहित हो जाते हैं कि पार्टी ख़ुद संकट में घिर जाती है.

हालिया उदाहरण अल्पसंख्यक कल्याण राज्य मंत्री मोहसिन रज़ा का है जिन्होंने एक दिन ऐलान कर दिया कि अब मदरसों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं के लिए 'ड्रेस कोड' लागू होगा.

यानी यहां पढ़ने वाले बच्चे जल्द ही कुर्ते-पायजामे और टोपी की बजाय अन्य सरकारी और निजी स्कूलों के बच्चों की तरह शर्ट और पैंट में नज़र आएंगे.

मोहसिन रज़ा के इस बयान पर ज़बरदस्त प्रतिक्रिया हुई. कई मदरसों के संचालकों, मौलवियों और धार्मिक शिक्षकों ने तो आपत्ति जताई ही, उनके विभाग के कैबिनेट मंत्री लक्ष्मीनारायण चौधरी ने भी इसे ख़ारिज कर दिया और रज़ा को नसीहत दी कि बिना उनकी जानकारी के ऐसे बयान न दें.

गेरुआ रंग है ऊर्जा का प्रतीक

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मोहसिन रज़ा इससे पहले भी ऐसे कई बयान दे चुके हैं जो आमतौर पर बीजेपी में 'कट्टर' समझे जाने वाले नेता ही देते हैं. हज हाउस की दीवार को हरे की बजाय गेरुए रंग से रँगवाने की प्रशंसा ये कहते हुए उन्होंने की थी कि गेरुआ रंग शक्ति यानी ऊर्जा का प्रतीक होता है. मोहसिन रज़ा ने ही प्रधानमंत्री के मुस्लिम प्रतीक के रूप में उनकी दाढ़ी रखने का उदाहरण दे डाला था.

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हालांकि इस दृष्टि से मोहसिन रज़ा अकेले नहीं हैं बल्कि कई अन्य नेता भी लाइन में हैं. समाजवादी पार्टी से एमएलसी रह चुके और इस समय बीजेपी से एमएलसी बुक्कल नवाब भी आए दिन हिन्दू हित में बयान देते और काम करते नज़र आते हैं. कभी अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए चंदे के रूप में मोटी रक़म का एलान करते हैं तो कभी ख़ुद मंदिर पहुंच कर घंटा बजाते हुए फ़ोटो खिंचवाते हैं.

इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश शिया वक़्फ़ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिज़वी हैं. उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनने से पहले रिज़वी समाजवादी पार्टी के नेताओं के बेहद क़रीबी बताए जाते थे और उसी की वजह से उन्हें चेयरमैन का पद हासिल हुआ था. वसीम रिज़वी कभी अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए मुसलमानों के दावा छोड़ देने की बात करते हैं तो कभी ख़ुद को पार्टी मानकर उसे हिन्दुओं को सौंप देने की बात करते हैं.

बयानों की इसी कड़ी में एक बार तो वह यहां तक कह गए कि मदरसों में चरमपंथी पैदा होते हैं जो देश-विरोधी हरकतों में शामिल रहते हैं.

ये सूची लंबी है और ये संयोग ही है कि इनमें से ज़्यादातर लोग मुसलमानों के शिया समुदाय से आते हैं. जानकारों का कहना है कि मुस्लिम समुदाय में अपनी पैठ बनाने के लिए बीजेपी और आरएसएस को ऐसे लोगों की ज़रूरत है और इस तरफ़ वो काम भी कर रहे हैं लेकिन जो नेता आए दिन ऐसे बयान देते रहते हैं उससे कई बार पार्टी ही असहज हो जाती है.

आरएसएस ने तो अपने संगठन से मुसलमानों को जोड़ने के लिए बाक़ायदा मुस्लिम राष्ट्रीय मंच तक बना रखा है.

इन बयानों की वजह?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाइक और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ मोहसिन रज़ा (सबसे बाएं)

लेकिन अहम सवाल ये उठता है कि इन बयानों के पीछे मक़सद क्या है? क्या ये अति उत्साह में दिए जाते हैं, निजी फ़ायदे के लिए दिए जाते हैं, आलाकमान से इसके कोई दिशा-निर्देश मिलते हैं या फिर कुछ और वजह है ? सवाल ये भी उठता है कि ये अपने समाज की ओर से जो तमाम बातें करते हैं तो मुस्लिम समाज में इनकी बातों से इत्तेफ़ाक रखने वाले कितने लोग हैं?

इतिहासकार और समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर अली ख़ान महमूदाबाद कहते हैं, "इन तीनों ही नेताओं को बीजेपी ने चुना है, जनता ने नहीं. ऐसे में इनके बयान इनकी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं और अपने हितों को बचाने की कोशिश ही ज़्यादा लगता हैं."

क्या शिया समुदाय में बीजपी के लिए समर्थन बढ़ रहा है? प्रोफ़ेसर महमूदाबाद कहते हैं, "चुनावों का डाटा बताता है कि ऐसा नहीं है. असल में इस विचार को फैलाने की कोशिश मुस्लिम समुदाय को और विभाजित करने की कोशिशों का ही प्रतिनिधित्व करती हैं."

वरिष्ठ पत्रकार सुभाष मिश्र कहते हैं, "ये जो भी नेता हैं इनमें से कोई भी जनता से जुड़ा नहीं है. इसलिए ये कहना तो क़तई तार्किक नहीं लगता कि इनकी बातों से मुस्लिम समाज के लोग सहमत होंगे. ये सभी निजी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए, चर्चा में आने के लिए और हार्डकोर हिन्दुत्व की बात करने वालों को ख़ुश करने के लिए ही बयानबाज़ी करते हैं. जहां तक मुस्लिम समाज में इनकी स्वीकार्यता की बात है तो साफ़ पता चलता है कि वहां से ये लोग लगभग निष्कासित हैं."

वसीम रिज़वी ऐसे बयान अक़्सर शिया वक़्फ़ बोर्ड के नाम पर देते हैं लेकिन कई बार वक़्फ़ बोर्ड के दूसरे पदाधिकारी और उससे जुड़े लोग इसे ख़ारिज कर चुके हैं और रिज़वी का निजी बयान बता चुके हैं. यानी ये साफ़ है कि वो जो भी बोलते हैं, उससे शिया मुसलमानों की भी सहमति नहीं रहती है.

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वसीम रिज़वी

तीनों को पार्टी से मिला क्या है?

यदि ख़ासकर इन तीन नेताओं की बात की जाए तो इनमें एक तरह से ऐसे बयानों को लेकर आपस में ही होड़ मची रहती है.

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, "पहले मोहसिन रज़ा अकेले मुसलमान थे बीजेपी में इसलिए प्रवक्ता भी रहे. सरकार बनने पर मंत्री बन गए लेकिन बुक्कल नवाब के पार्टी में आ जाने से वो इनके प्रतिद्वंद्वी बन गए हैं.

वसीम रिज़वी तो ख़ैर अभी बीजेपी के बड़े नेताओं को ख़ुश करने की ही क़तार में हैं. पार्टी ने न तो उन्हें अभी लिया है और न ही कुछ दिया है. हां, उनकी चेयरमैन की कुर्सी ज़रूर बरक़रार है."

हालांकि फ़ायदे की बात की जाए तो अभी तक मोहसिन रज़ा को छोड़कर बीजेपी ने इन नेताओं को इनकी 'वफ़ादारी' का कोई ऐसा इनाम नहीं दिया है जो कि दिखता हो. बुक्कल नवाब पहले सपा से एमएलसी थे, बीजेपी के मंत्रियों के लिए उन्होंने इसे छोड़ा और फिर बीजेपी ने उन्हें यही सीट बाद में वापस कर दी. वसीम रिज़वी भी अपने उसी पद पर हैं जो उन्हें समाजवादी पार्टी की सरकार के समय में मिली थी.

लेकिन बिना किसी फ़ायदे के ये लोग ऐसा कर रहे हों, ये भी नहीं है. सुभाष मिश्र कहते हैं, "बुक्क्ल नवाब पर अरबों रुपये के ज़मीन घोटाले का आरोप है. वसीम रिज़वी पर भी वक़्फ़ बोर्ड की संपत्ति के दुरुपयोग और अवैध तरीक़े से ख़रीद-फ़रोख़्त के आरोप हैं.

ऐसे में इन्हें सरकार से संरक्षण मिलता रहे और यथास्थिति बनी रहे, यही बड़ी उपलब्धि है. सपा सरकार जाने के बाद, तमाम आरोपों और मोहसिन रज़ा की आपत्ति और विरोध के बावजूद वसीम रिज़वी शिया वक़्फ़ बोर्ड के चेयरमैन बने हुए हैं. तो ये तो नहीं कहा जा सकता कि इन्हें वफ़ादारी निभाने का फ़ायदा नहीं मिल रहा है.

छत्तीस का आंकड़ा

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प्रतीकात्मक तस्वीर

दिलचस्प बात ये भी है कि मंत्री मोहसिन रज़ा का बुक्कल नवाब से छत्तीस का आंकड़ा रहता है.

बुक्कल नवाब तो चूंकि पहले समाजवादी पार्टी में थे और लखनऊ में उसी इलाक़े के हैं जहां के बुक्कल नवाब हैं, जबकि वसीम रिज़वी और मोहसिन रज़ा एक-दूसरे पर खुले तौर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते रहते हैं.

जानकारों का कहना है कि बीजेपी आलाकमान जानबूझकर इसमें दख़लंदाज़ी नहीं करता ताकि इनमें से कोई एक ख़ुद को बीजेपी में मुसलमानों के नेता के तौर पर न पेश करने लगे. लेकिन विवादास्पद बयानबाज़ियों के मामले में सुभाष मिश्र कहते हैं कि आलाकमान इन्हें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करता होगा, ऐसा लगता नहीं है.

वहीं लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान कहते हैं, "कुछ लोग सत्ता के साथ निष्ठा बदलते हैं. वसीम रिज़वी और बुक्कल नवाब उन्हीं लोगों में से हैं. मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के कार्यक्रमों में तो आपको कई ऐसे वरिष्ठ पत्रकार भी दिख जाएंगे जो कल तक समाजवादी पार्टी कार्यालय में अपनी वफ़ादारी साबित करने के लिए सुबह-शाम हाज़िरी लगाया करते थे. तो इनके कुछ कहने से या फिर करने से पूरा मुस्लिम समुदाय या शिया समुदाय बीजेपी के पीछे आ जाएगा, ये संभव नहीं है और बीजेपी ने ऐसी कोई ग़लतफ़हमी पाल भी नहीं रखी है."

जहां तक बीजेपी का सवाल है तो पार्टी आधिकारिक रूप से ख़ुद को ऐसे बयानों से अलग रखती है लेकिन जो बयान उसे 'सूट' करते हैं, उन्हें वो 'मुस्लिम समुदाय की बीजेपी के प्रति बदलते रुख़' के तौर पर पेश करती है.

जानकारों का कहना है कि इसका सियासी फ़ायदा उसे हो या न हो लेकिन फ़ायदे का माहौल बनाने में तो मदद मिलती ही है.

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