बंगाल में बिछने लगी चुनावी शतरंज की बिसात

  • 9 जुलाई 2018
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Image caption भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह

पश्चिम बंगाल में भाजपा के बढ़ते 'ख़तरे' से निपटने के लिए सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दलों ने राजनीतिक शतरंज की बिसात पर गोटियां बिछाने की कवायद तेज़ कर दी है.

तृणमूल कांग्रेस ने इसके लिए संगठन और मंत्रिमंडल में फेरबदल किया है. दूसरी ओर, कांग्रेस में चुनावी तालमेल के सवाल पर दो गुट आमने-सामने हैं. इनमें से एक गुट सीपीएम की अगुवाई वाले वाममोर्चा के साथ तालमेल जारी रखने की वकालत कर रहा है तो दूसरा गुट तृणमूल कांग्रेस के साथ एक बार फिर हाथ मिलाने के पक्ष में है.

इस मुद्दे पर बीते हफ़्ते प्रदेश के नेताओं के साथ दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी की बैठक में भी कोई हल नहीं निकल सका. हालात यह है कि तालमेल के सवाल पर पार्टी दो-फाड़ होने की कगार पर है. पार्टी का प्रदेश नेतृत्व विधायकों और दूसरे नेताओं के पलायन से भी परेशान है.

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सीपीएम का प्रदेश नेतृत्व फ़िलहाल इस मुद्दे पर चुप्पी साधे बैठा है. पार्टी की केंद्रीय समिति भाजपा से मुकाबले के लिए कांग्रेस का हाथ थामने के प्रस्ताव को पहले ही लाल झंडी दिखा चुकी है. बावजूद इसके स्थानीय स्तर पर दोनों दलों के बीच तालमेल होता रहा है.

दूसरी ओर, भाजपा अपने पैरों तले की ज़मीन मज़बूत करने और जवाबी रणनीति बनाने में जुटी है. बीते महीने के आखिर में राज्य के दो-दिवसीय दौरे पर आए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने प्रदेश नेताओं को लोकसभा की 42 में से कम से कम 22 सीटें जीतने का लक्ष्य दिया है. वैसे प्रदेश भाजपा ने जो चुनावी ब्लूप्रिंट तैयार किया है उसमें कहा गया है कि पार्टी राज्य में कम से कम 26 सीटें जीत सकती है.

हाल के पंचायत चुनावों में, ख़ासकर आदिवासी इलाकों में, पार्टी का प्रदर्शन काफ़ी बेहतर रहा है, इससे उसके हौसले बुलंद हैं. वैसे भी बीते दो-तीन वर्षों के दौरान होने वाले तमाम उपचुनावों और शहरी निकायों के लिए हुए चुनावों में कांग्रेस और सीपीएम को पीछे धकेलते हुए भाजपा दूसरे स्थान पर रही है.

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Image caption तृणमूल कांग्रेस के महासचिव पार्थ चटर्जी

पहले तृणमूल कांग्रेस और उसके बाद सीपीएम के साथ हाथ मिलाने वाली कांग्रेस एक बार फिर दोराहे पर खड़ी नज़र आ रही है. वह यह तय नहीं कर पा रही है कि अगले साल लोकसभा चुनावों में उसे माकपा के साथ हाथ मिलाना चाहिए या कांग्रेस से. पार्टी का एक गुट माकपा से हाथ मिलाने के पक्ष में है तो दूसरा तृणमूल कांग्रेस से.

प्रदेश कांग्रेस के महासचिव ओम प्रकाश मिश्र ने हाल में केंद्रीय नेतृत्व को जो रिपोर्ट भेजी है उसमें माकपा से हाथ मिलाने की सिफ़ारिश की गई है. लेकिन पार्टी के सांसदों और विधायकों के एक गुट का मानना है कि कांग्रेस को अगर लोकसभा की सीटें बढ़ानी हैं तो इसके लिए तृणमूल कांग्रेस से हाथ मिलाना बेहतर होगा.

'हाथ मिलाना ही होगा'

पूर्व केंद्रीय मंत्री एबीए ग़नी ख़ान चौधरी के भाई और मालदा के कांग्रेस सांसद अबू हाशिम ख़ान चौधरी ने बीती 28 जुलाई को यहां तृणमूल कांग्रेस के महासचिव पार्थ चटर्जी से उनके आवास पर मुलाकात की थी.

उक्त मुलाकात के बाद अबू हाशिम ने पत्रकारों को बताया था कि दूसरे मुद्दों के अलावा भाजपा के ख़िलाफ़ एक महागठजोड़ बनाने के मुद्दे पर भी चर्चा हुई.

हाशिम कहते हैं, ''यहां कांग्रेस को अगर सीटों की तादाद बढ़ानी है तो उसे तृणमूल से हाथ मिलाना ही होगा.''

लेकिन प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी दलील देते हैं कि यहां तृणमूल कांग्रेस से हाथ मिलाना कांग्रेस के लिए आत्महत्या करने जैसा होगा.

अधीर रंजन चौधरी कहते हैं, ''कांग्रेस ने पहले भी तृणमूल से हाथ मिलाया था और उसका नतीजा सबके सामने है. अब उस ग़लती को दोहराने का कोई मतलब नहीं है.''

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Image caption कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी

'भाजपा को दिया पांव जमाने का मौका'

तृणमूल कांग्रेस के कट्टर आलोचक रहे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी आरोप लगाते हैं, ''तृणमूल की वजह से ही भाजपा को बंगाल में पांव जमाने का मौका मिला है. उसी की वजह से यहां कांग्रेस लगातार कमज़ोर हुई है.''

कांग्रेस ने वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों में वाममोर्चा के साथ हाथ मिलाया था. तब पार्टी को 44 सीटें मिली थीं. लेकिन बीते दो वर्षों के दौरान उसके एक दर्जन विधायक तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. पलायन का यह सिलसिला अब भी जारी है. 21 जुलाई को तृणमूल कांग्रेस की ओर से होने वाली शहीद रैली के दौरान कुछ और विधायकों के पाला बदलने की संभावना है.

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को 34 सीटें मिली थीं. कांग्रेस ने चार सीटों पर जीत हासिल की थी जबकि सीपीएम और भाजपा को दो-दो सीटें मिली थीं.

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Image caption ममता बनर्जी

तृणमूल की कवायद

हाल के पंचायत चुनावों में ख़ासकर राज्य के आदिवासी इलाकों में भाजपा के बेहतर प्रदर्शन के बाद सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने आदिवासी नेताओं के साथ संबंधों को मज़बूत करने की कवायद शुरू की है.

इसी कवायद के तहत मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक आदिवासी कल्याण समिति का गठन कर माकपा के निष्कासित सांसद ऋतब्रत बनर्जी को इसका संयोजक बनाया है.

इस समिति में हर ज़िले से आदिवासियों के दो प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा और ये लोग व्हाट्सऐप ग्रुप के ज़रिए आपस में संपर्क रखेंगे.

पंचायत चुनावों के नतीजे सामने आने के बाद ममता ने आदिवासी तबके के दो मंत्रियों को मंत्रिमंडल से हटा दिया था. उनकी जगह दो वरिष्ठ मंत्रियों पार्थ चटर्जी और ज्योतिप्रिय मल्लिक को आदिवासी-बहुल जंगलमहल इलाके में लोगों में फैले असंतोष को दूर करने का ज़िम्मा सौंपा गया है.

तृणमूल कांग्रेस ने तालमेल के सवाल पर कांग्रेस में होने वाले मंथन को उसका अंदरूनी मामला बताते हुए इस पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है.

वैसे ममता बनर्जी ने एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में कहा है कि भाजपा से निपटने के लिए उन्हें कांग्रेस के साथ मिलकर काम करने पर कोई आपत्ति नहीं है.

ममता ने ही भाजपा के ख़िलाफ़ हर सीट पर विपक्ष के साझा उम्मीदवार का प्रस्ताव रखा था.

पार्टी महासचिव पार्थ चटर्जी कहते हैं, ''फ़िलहाल किसी के साथ तालमेल के मुद्दे पर कोई फ़ैसला नहीं किया गया है.''

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भाजपा की रणनीति

आम चुनावों को ध्यान में रखते हुए भाजपा अपनी रणनीति को ठोस स्वरूप देने में जुट गई है. मिशन बंगाल के तहत पार्टी अध्यक्ष अमित शाह बीते महीने के आखिर में दो दिनों के बंगाल दौरे पर आए थे.

उन्होंने कोलकाता के अलावा बीरभूम और पुरुलिया में पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ बैठक में चुनावी रणनीति पर विचार-विमर्श किया.

शाह ने पुरुलिया में अपनी रैली में ममता बनर्जी सरकार पर हिंसा फ़ैलाने का आरोप लगाते हुए उसे सत्ता से हटाने की अपील की थी. उनका कहना था कि सरकार बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ रोकने और राज्य में सक्रिय माफ़ियाओं पर अंकुश लगाने में नाकाम रही है.

ध्यान रहे कि पुरुलिया में पंचायत चुनावों के बाद भाजपा के दो कार्यकर्ताओं की हत्या हो गई थी.

अमित शाह ने प्रदेश भाजपा को कम से कम 22 लोकसभा सीटें जीतने का लक्ष्य दिया है, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, 'मुक्त और निष्पक्ष चुनावों की स्थिति में पार्टी यहां कम से कम 26 सीटें जीत सकती है.'

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'एक ओर कुआं और दूसरी ओर खाई'

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि चुनावी तालमेल के लिए सहयोगी दल का चयन कांग्रेस के लिए बेहद अहम है. उसके लिए फ़िलहाल सबसे प्रमुख मुद्दा भाजपा से निपटना नहीं बल्कि अपना वजूद बचाना है.

एक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चौधरी कहते हैं, ''कांग्रेस नेतृत्व के समक्ष फ़िलहाल एक ओर कुआं और दूसरी ओर खाई वाली स्थिति है. तृणमूल से तालमेल नहीं होने की हालत में पार्टी में चुनावों से पहले भगदड़ मचने का अंदेशा है. दूसरी ओर, तालमेल के बावजूद उसे क्या और कितना लाभ होगा, इसका अनुमान लगाना फ़िलहाल मुश्किल है.''

शायद इसी वजह से तालमेल पर फ़ैसले का जिम्मा पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर डाल दिया गया है.

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