दक्षिण भारत के लोग उत्तर भारतीयों पर क्यों करते हैं शक?

  • विग्नेश ए
  • संवाददाता, बीबीसी तमिल सेवा
उत्तर भारतीय

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जुलाई 2016 में भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु के शहर तिरुपुर में अचानक एक ख़बर फ़ैल गई थी.

पश्चिम बंगाल के निवासी मोहम्मद मोशिरुदीन को उनके गृह राज्य में एक रेलवे स्टेशन के पास पश्चिम बंगाल के एटीएस (एंटी टैररिस्ट स्क्वायड) ने गिरफ़्तार किया था. मोशिरुदीन पांच साल से भी अधिक वक्त से तिरुपुर में काम कर रहे थे.

उन पर युवाओं को बहलाकर इस्लामिक स्टेट संगठन में शामिल करने के आरोप लगे थे. तिरुपुर शहर उत्तर भारत से आए प्रवासी मज़दूरों के लिए जाना जाता है.

मोशिरुदीन ने अपने परिवार की मर्जी की ख़िलाफ़ जाकर अपनी पसंद की लड़की से शादी की थी और उसके बाद वे तिरुपुर चले गए थे. उन्हें 'किरानावाला' के नाम से जाना जाता था.

मोशिरुदीन पर अंतरराष्ट्रीय चरमपंथी संगठन के साथ कथित तौर पर संबंधों के आरोप लगने के बाद कुछ वक्त के लिए तिरुपुर इलाक़े में उत्तर भारतीय मजदूरों की नकारात्मक छवि बन गई थी, शहर के स्थानीय निवासी सभी उत्तर भारतीय कामगारों को शक़ भरी निगाहों से देखने लगे थे.

दक्षिण भारत में मौजूद उत्तर भारतीय मज़दूरों को अक्सर इस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जब कभी किसी उत्तर भारतीय मज़दूर पर किसी अपराध में शामिल होने के आरोप लगते हैं तो पूरे समुदाय पर संदेह जताया जाने लगता है.

दूसरे राज्य के अपराधी

तमिलनाडु के एक रिटायर्ड वरिष्ठ पुलिस अधिकारी रामचंद्रन ने बीबीसी तमिल से कहा, ''हर समाज में एक या दो प्रतिशत लोग आपराधिक गतिविधियों में शामिल होते ही हैं. लेकिन हमें बाक़ी के 90 प्रतिशत से अधिक लोगों पर शक़ नहीं करना चाहिए, वे अच्छे इंसान होते हैं.''

किसी अन्य राज्य के व्यक्ति को गिरफ़्तार करने में किस तरह की परेशानियां आती हैं. इस बारे में रामचंद्रन बताते हैं, ''जब किसी दूसरे राज्य का व्यक्ति कोई अपराध करता है तो उसे गिरफ़्तार करना काफ़ी मुश्किल होता है. यहां तक कि अगर सर्विलांस कैमरा में उनका चेहरा भी दिख गया हो या फिर पुलिस को उनकी तस्वीरें भी प्राप्त हो गई हों तब भी उन्हें पकड़ना आसान नहीं होता, क्योंकि स्थानीय लोग इन बाहरी लोगों के चेहरों को इतनी आसानी से पहचान नहीं पाते.''

''अगर हम तमाम मुश्किलें पार कर उनके गृह राज्य जाकर उन्हें पकड़ने की कोशिश करें तो भी उनके गिरफ़्तार होने की कोई गारंटी नहीं होती.''

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हिरासत में लेना मुश्किल

रामचंद्रन इस संबंध में अपने साथ हुई एक घटना को याद करते हैं, ''साल 2014 में राजस्थान से काम करने आए एक कामगार को कोयंबटूर ज़िले में एक सुनार ने नौकरी पर रखा, लेकिन वह आदमी उस सुनार की हत्या कर और दो किलो सोना चोरी कर भाग गया. बहुत कोशिश के बाद हमने उस आदमी को बाड़मेर ज़िले में ढूंढ निकाला.''

''जब जांच में शामिल राजस्थान पुलिस का एक अफ़सर हमारी टीम के साथ उस आदमी के घर में दाख़िल हुआ तो गांव वालों ने उस पुलिस अफ़सर पर उलटा आरोप लगा दिया कि वे अकेली महिला के घर में प्रवेश कर रहे हैं. ऐसी स्थिति में हमारे पास वहां से वापिस लौटने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. वह आदमी आज तक गिरफ़्तार नहीं हुआ है.''

रामचंद्रन एक और वाक़ये को याद करते हुए कहते हैं कि अगर किसी दूसरे राज्य का आदमी किसी अपराध में शामिल होता है तो वह अपराध करने के तुरंत बाद वापस लौट जाता है.

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रामचंद्रन कहते हैं, ''उत्तर भारत से आने वाला कोई आदमी हवाई यात्रा के ज़रिए तमिलनाडु पहुंचता है. वह किसी भी तरह से पकड़ में ना आए इसके लिए वह हवाई टिकट का पैसा कैश में ही देता है, कभी क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड या नेट बैंकिंग का इस्तेमाल नहीं करता.''

वे कहते हैं, ''एयरपोर्ट पहुंचने के बाद वह किसी ख़ास जगह के लिए कैब बुक करता है. लेकिन रास्ते में तबियत खराब होने की शिकायत कर कैब को नज़दीकी अस्पताल में ले चलने के लिए कहता है. आमतौर पर वह दोपहर का वक्त चुनता है, क्योंकि इस वक्त पर डॉक्टर मरीज़ों के पास नहीं होते.''

''बड़े अस्पतालों में वार्ड ब्वॉय या नर्स सभी डॉक्टरों को नहीं पहचानते. कैब से आया आदमी ओपीडी वार्ड में पहुंचता है और स्टेथोस्कोप पहनकर वार्ड के स्टाफ़ से कोई भी दस्तावेज़ लाने के लिए उसे वार्ड से बाहर भेज देता है. एक बार जब वार्ड का स्टाफ़ बाहर निकल गया तो वे उस महिला मरीज़ के पास जाएगा जिसने कोई गहना पहना है. फिर उसका निरीक्षण करने का झूठा अभिनय करते हुए वह उनके गहने उतार लेगा.''

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''इसके बाद वह उस मरीज से उल्टा लेटने के लिए कहेगा और फिर गहने लेकर फ़रार हो जाएगा.''

रामचंद्रन अंत में कहते हैं, ''आम तौर पर वे प्रवासी कामगार जो लंबे वक्त से दूसरे राज्यों में रह रहे होते हैं वे सिर्फ तभी कोई अपराध जब किसी आपसी लड़ाई में शामिल होते हैं. योजना बनाकर किए गए अपराध बहुत कम होते हैं. इसलिए इन अपराधों के होने पर सभी पर शक़ नहीं किया जाना चाहिए और दक्षिण भारत में रह रहे उत्तर भारतीय लोगों को एक ही नज़र से भी नहीं देखना चाहिए.''

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