BBC SPECIAL: ‘चॉकलेट के डब्बे’ को उसने जैसे ही उठाया, तभी ...

  • 10 जुलाई 2018
यमन, युद्ध, घायल
Image caption 12 साल के ज़ैद ख़ालेद कक्षा तीन में पढ़ते थे, जब उनके साथ ये हादसा हुआ. उनके फिर से कई ऑपरेशन होंगे

चॉकलेट का वो डब्बा दूर से चमक रहा था, या कोई खिलौना था! 10 साल का ज़ैद उधर लपका, और, पीछे नन्हे-नन्हे पावों से दौड़ लगाता उसका छह साल का छोटा भाई सलेम, ज़ैद ने पहले पहुंचकर डब्बे को हाथों में उठा लिया. लेकिन तभी...

सैकड़ों बल्ब जैसी तेज़ रोशनी हुई, और आसपास की ज़मीन तक को हिला देने वाला धमाका...

ज़ैद के दोनों पांव चमड़े और चंद टूटी हड्डियों से लटके उसके जिस्म से झूल रहे थे, माइन से निकली किरचियां मांस में धंस गई थीं, और आसपास ख़ून ही ख़ून.

यमन में जारी जंग

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यमन के मरीज़ दिल्ली में

ज़ख़्म तो दो सालों में भर गया है, लेकिन गहरे निशान छोड़ गया.

ज़ैद का बायां पैर डाक्टरों को काटना पड़ा, दाहिना किसी तरह जिस्म से लगा है. उसकी सर्जरी के लिए वो पिछले हफ़्ते ही दिल्ली आए हैं.

ज़ैद यमन की जंग में गंभीर रूप से घायल हुए 74 दूसरे मरीज़ों के साथ इलाज के लिए दिल्ली लाये गए हैं. अरब देश यमन में लगभग चार सालों से जारी जंग में संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ कम से कम दस हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है, और पचपन हज़ार से ज़्यादा घायल हुए हैं. लाखों बेघर हैं.

ज़ैद के पिता ख़ालेद सलेम मोहम्मद कहते हैं, "हमारा शहर लहज हूथी विद्रोहियों के क़ब्ज़े में आ गया था, जब वो हारकर वहां से जाने लगे तो जगह-जगह बारूदी सुरंग लगा गए."

पेशे से टीचर ख़ालेद बताते हैं कि सलेम के शरीर के किसी हिस्से को अल्लाह के करम से कोई नुक़सान नहीं हुआ और उसका हाथ फिज़ियोथेरेपी से अब बेहतर हो रहा है.

हूथी विद्रोहियों का इंकार

हूथी विद्रोही बारूदी सुरंगें लगाने के आरोप से इंकार करते रहे हैं. उनका दावा है कि काम ख़ुद सरकारी फौज का है.

एशिया के दक्षिण में मौजूद और अफ़्रीकी महाद्वीप के मुहाने पर बसे यमन की युद्ध में एक तरफ़ शिया हूथी लड़ाके हैं जिन्हें कहा जाता है ईरान का समर्थन हासिल है. तो दूसरी तरफ़ हैं सरकारी फौजें जिनके समर्थन में मौजूद है सउदी अरब के नेतृत्व वाला नौ मुल्कों का गठबंधन.

रॉकलैंड अस्पताल के इमरजेंसी मेडिसिन्स के प्रोफेसर तमोरीश कोले कहते हैं कि 'ज़ैद के दाहिने पैर को किसी तरह शरीर से जोड़ दिया गया था जिसे रिविज़िट सर्जरी के ज़रिये ठीक करने की कोशिश की जाएगी."

Image caption पेश से मज़दूर, पर अब फौजी, मोहम्मद अली इंदिरा गांधी, धर्मेंद, अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना से परिचित हैं

तमोरीश कोले बताते हैं युद्ध जैसी स्थिति में स्वास्थ्य सेवाओं के मूलभूत ढांचे जैसे अस्पताल बमबारी का शिकार हो जाते हैं, बिल्डिंगें धवस्त हो जाती हैं, ऑपरेशन थियेटर का भी वही हाल होता है, दवाओं की सप्लाई रुक जाती है, लेकिन मरीज़ों की तादाद कई गुना बढ़ जाती है तो ज़ाहिर है उन हालात में प्राथमिकता होती है लोगों की जान बचाना.

ज़ैद को पिछले क़रीब तीन-चार घंटों से खाना नहीं मिला है और वो पिता से बार-बार उसकी मांग करता है जो उसे किसी तरह संभालते हैं. इन्हीं बातों के दौरान एक मेल नर्स व्हील चेयर के साथ ज़ैद को एक्सरे के लिए ले जाने को पहुंच जाता है.

'हिंद को जानते हैं हम'

ज़ैद के कमरे की गलियारी के दूसरे छोर पर दो बेड वाला एक कमरा है, जिसमें मौजूद प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठे 56-साल के मोहम्मद अली यूं तो पहली बार भारत आए हैं लेकिन वो "हिंद को जानते रहे हैं इंदिरा गांधी, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र से जुड़ाव" की वजह से.

"धरमिंदर बहुत अच्छा है," वो हंसते हुए हमसे कहते हैं, और फिर मरीज़ों की देखभाल के लिए लगे अधिकारी जस्सार सालेह से शिकायत करने लगते हैं कि "टीवी पर हिंदी फ़िल्मों का चैनल नहीं आता है."

Image caption नासिर क़ायद (बायें) कहते हैं बच्चे यमन में हिंदी फ़िल्म बंद ही नहीं करने देते

जस्सार कहते हैं कि अगर एक को हिंदी फ़िल्मों का चैनेल दिया तो सभी उसकी मांग करने लगेंगे और "मुश्किल ये है कि अरब और हिंदी चैनेल एक ही पैकेज में मौजूद नहीं हैं."

पहाड़ों में बसे शहर रदफ़ान निवासी नासिर क़ाइद ठहाका लगाते कहते हैं, "यमन में तो हिंदी फ़िल्मों का चैनेल लगा दें तो कोई बंद नहीं करने देगा, बच्चे तो हल्ला मचाने लगते हैं."

Image caption डॉक्टर मोहम्मद अब्दुल बेटे की तस्वीर देखते-देखते भावुक हो जाते हैं. कहते हैं एक डॉक्टर होकर भी वो शरणार्थी कैंप में रहने को मजबूर हैं

अडेन बंदरगाह पर कलर्क का काम करनेवाले नासिर दो बार रॉकेट लांचर से घायल हो चुके हैं, वो अपनी शर्ट हटाकर सीने पर बने छोटे-छोटे गहरे दाग़ दिखाते हैं, दूसरे हमले में तो उनका बांया पांव बुरी तरह ज़ख़्मी हो गया था.

मज़दूरी छोड़कर बंदूक़ उठानेवाले मोहम्मद अली को इंतज़ार है एक नये प्रौस्थेटिक लेग की जिसके बाद वो फिर से लड़ने को तैयार हैं. उन्होंने होदैदा के युद्ध में सरकार की तरफ़ से लड़ाई की थी.

'डॉक्टर हूं पर अब शरणार्थी कैंप में...'

मोहम्मद अली कहते हैं, आम नागिरक के तौर पर दो साल के लिए की गई फौज में ट्रेनिंग और फिर काम से उन्हें बहुत मदद मिली और अब तो वो विशेष क़िस्म की हेवी मशीन गन महारथ के साथ चलाते हैं.

मोहम्मद अब्दुल को महारथ थी लोगों के इलाज में लेकिन उनका पोली-क्लिनिक तबाह हो चुका है, उनके दो साथ काम करने वाले दो सर्जन उल्फ़त और मोना को जान बचाने के लिए भागना पड़ा.

पावों के अपने ज़ख़्मों को दिखाते, अंग्रेज़ी में हमसे बातें करने के बीच मोहम्मद अब्दुल का शरीर कांपता है, आवाज़ भर्रा जाती है, और कराह की सी आवाज़ में वो कहते हैं, "मैं डाक्टर हूं लेकिन मुझे रिफ्यूजी कैंप में दिन काटने पड़ रहे हैं."

वो कहते हैं, "वहां जानवरों से भी बुरा सलूक हो रहा है लोगों के साथ, हूथी आईएस और अल-क़यदा से भी ज़्यादा निर्मम हैं, बच्चों को भी नहीं छोड़ते."

हम उनसे पूछते हैं कि आम हूथी लोगों का क्या, आख़िर वो भी तो युद्ध की मार झेल रहे, उनपर भी सऊदी गठबंधन की तरफ़ से बमबारी हुई है, जवाब में वो कहते हैं कि अगर हूथी घायल भी उनके अस्पताल में आए तो उन्होंने इलाज से मना नहीं किया.

इकलौते बेटे की ज़िरोक्स की तस्वीर को देखते हुए वो एक बार हमसे कहते हैं कि हम उनकी कहानी किसी को न कहें न ही उनकी तस्वीर का इस्तेमाल करें, लेकिन कुछ ही देर में उनका मन बदल जाता है, वो कहते हैं "नहीं, आप कहें हमारी कहानी."

यमन से आए 74 मरीज़ों के दल में युद्ध में घायल हुईं औरतें भी हैं लेकिन वो हमसे बातें करने से मना करती हैं, कुछ मरीज़ भी अपने मुल्क में मौजूद हालात के डर से हमसे बातें नहीं करते.

अपने कमरे में बैठे वो साथ लाई क़ुरान शरीफ़ को पढ़ रहे हैं, या फिर यमनी करेंसी को ही देख रहे, कुछ के मोबाइल पर मौजूद हैं यमन के कई मशहूर भवनों के तस्वीर - युद्ध शुरू होने के पहले और बाद की भी.

उस यमन की जो हमेशा के लिए शायद कहीं खो गया!

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