नज़रिया: ये उन्मादी और हिंसक भीड़ किसी को यूं ही कैसे मार देती है?

  • 11 जुलाई 2018
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हिंसक भीड़ के हाथों अनजान व्यक्तियों की निर्मम हत्याओं का सिलसिला दो-ढाई सालों से जारी है, लेकिन हाल में इन घटनाओं में ख़ासा इज़ाफा हुआ है.

पहले इन घटनाओं के शिकार अक्सर मुसलमान या दलित हुआ करते थे, वहीं आज किसी भी अजनबी को (बच्चा चोरी जैसे अपराध के शक पर) भीड़ का शिकार बनाया जा सकता है.

इन घटनाओं के फैलने से कई सवाल उभरते हैं. क्या हमारी क़ानून व्यवस्था अब इतनी निकम्मी या लापरवाह हो चुकी है कि ऐसी घटनाओं को रोक नहीं पाती? साधारण-सामान्य लोग बर्बर हत्यारे बनने की हिम्मत कहाँ से जुटाते हैं?

क्या यह राजनेताओं की कोई नई चाल है? क्या हमारे सामाजिक रिश्तों का ताना-बाना ही उघड़ रहा है?

इन सवालों के सटीक जवाब पाने के लिए हमें आसान व आरामदेह जवाबों से परहेज करना होगा. अमूमन ऐसी चुनौतियों से आमने-सामने होने पर हमारा ध्यान घटना विशेष से हटकर उसके पहले या बाद के दृश्यांत पर टिक जाता है.

हम किसी ख़ास कारक (उदाहरण- व्हाट्सऐप) या किसी विशेष परिणाम (उदाहरण - अपराधी की सज़ा) के पीछे पड़ जाते हैं. यह मुद्दे प्रासंगिक और महत्वपूर्ण हैं लेकिन उनके सहारे हम घटना के मर्म तक नहीं पहुँच सकते.

इसके लिए हमें घटना की अंदरूनी संरचना को जानने-समझने की कोशिश करने के अलावा उसके व्यापक संदर्भ का आकलन भी करना होगा.

तीन बुनियादी सूत्र

पिछले दो-तीन साल से लगातार घट रही इस भीड़-केन्द्रित परिघटना का निर्माण तीन प्रक्रियाओं के मेल से संभव होता है.

पहली और शायद सबसे लंबी और महत्वपूर्ण प्रक्रिया है एक कुंठित और आक्रामक रोष से भरे विशाल जनसमूह के गठन की प्रक्रिया.

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दूसरी प्रक्रिया के तहत नए-पुराने सामाजिक भेदों और भेद-भावों पर आक्रोश की ताज़ा चादर चढ़ाकर किसी अल्पसंख्यक समुदाय-विशेष को जबरन घृणा, तिरस्कार व हीनता का पात्र बनाया जाता है.

तीसरी प्रक्रिया सबसे तात्कालिक होते हुए भी निर्णायक बन सकती है और इसके तहत सत्ताधारी दल अपने समर्थकों को इशारा करता है कि अमुक समुदाय या अमुक मुद्दे को लेकर, अपने राज में 'कुछ भी' किया जा सकता है.

एक ही देश-काल में तीनों प्रक्रियाओं के संपन्न होने पर भीड़-जनित घटनाओं के लिए उर्वर ज़मीन तैयार होती है.

संयोग का खेल

लेकिन इसके बीज किस रोज़, किस गाँव-कस्बे-शहर में, किस रूप में अंकुरित होंगे - यह संयोग का खेल है. आगे है इन प्रक्रियाओं का तफ़सीलवार ब्यौरा.

1990 के दशक से भारत में नव-उदारवादी अर्थनीति अपनाई गई जिसके तहत सरकार ने अर्थव्यवस्था को कमोबेश बाज़ार के हवाले करते हुए सामाजिक क्षेत्र (यानी ग़रीब व कमज़ोर तबकों की मदद, स्वास्थ्य, शिक्षा से संबंधित कार्यक्रम) से अपना हाथ खींचना शुरू कर दिया.

इस बाज़ार-परस्त नीति के परिणामस्वरूप आज के भारत में ग़रीबी रेखा के नीचे की आबादी का अनुपात लगभग 45 प्रतिशत से घटकर तक़रीबन 22 प्रतिशत तक आ गया है.

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लेकिन दूसरी तरफ देश में अब 100 से अधिक अरबपति हैं और अगले चार सालों में हर साल 70 नए करोड़पतियों के उभरने का अनुमान है.

आज भारत दुनिया के सबसे विषमता-ग्रस्त या ग़ैर बराबर देशों की सूची में दूसरे नंबर पर है और देश की संपत्ति का 58 प्रतिशत सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों के पास है.

एक नए किस्म की विस्फोटक कुंठा

नए दौर की आर्थिक वृद्धि को रोजगार-रहित वृद्धि (जॉब लेस ग्रोथ) कहते हैं क्योंकि यह केवल दौलतमंद लोगों के लिए है, रोज़गार-आश्रित लोगों के लिए यह कुछ नहीं करती.

इस दोहरी प्रक्रिया ने देश के बहुत बड़े तबके में एक नए किस्म की विस्फोटक कुँठा फैलाई है.

ग़ैर बराबरी देश में पहले भी थी, लेकिन आज उसकी मात्रा के साथ-साथ उसका चरित्र भी बदल गया है, क्योंकि आज सर्वव्यापी मीडिया निरंतर उपभोग के तौर-तरीकों का प्रचार करते हुए सबको इसका सुख भोगने को उकसाती है, लेकिन अर्थव्यवस्था चंद दौलतमंदों के अलावा किसी को इस सुख में शरीक होने का मौका नहीं देती.

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Image caption असम के कार्बी-आंग्लोंग ज़िले में भीड़ ने दो युवकों की कथित तौर पर पीट-पीटकर हत्या कर दी थी

नतीजन इंसान में नई ख्वाहिशें पनपती हैं, लेकिन वह उनको पूरा करने के संसाधन नहीं जुटा पाता और अरमानों एवं उपलब्धियों के बीच का फ़ासला बढ़ता जाता है. बाज़ार परस्त समाज में उपभोग ही मनुष्य की मनुष्यता का पैमाना है.

ऐसे समाज में अपेक्षित स्तर की भागीदारी नहीं निभा पाने वाला इंसान ख़ुद अपनी इंसानियत पर शक करने लगता है और कम-से-कम अवचेतन मन से ख़ुद को अधूरा या कमतर मानने लगता है.

इंडियन एक्सप्रेस अख़बार (7 जुलाई) का सर्वे बताता है कि देशभर में हत्यारी भीड़ की घटनाओं में पकड़े गए लगभग सभी लोगों की सामाजिक पृष्ठभूमि कुछ इसी तरह की है. ज़्यादातर बेरोज़गार या दिहाड़ी मज़दूर हैं.

लेकिन सबसे ग़रीब तबके के नहीं बल्कि उससे थोड़ा ऊपर के हैं. इनके ज़हन में तरक्की के सपनों के साथ-साथ उन्हें चूर-चूर करने वाली हताशा भी है.

बहरहाल भीड़ की पृष्ठभूमि मात्र से हम नहीं जान पाते कि उसे क़त्ल करने का मनोबल कहाँ से मिलता है. इसके लिए दूसरी व तीसरी प्रक्रियाओं को समझना होगा.

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सुकून की तलाश

जाति व्यवस्था भारतीय समाज की आधारशिला रही है और कमोबेश आज भी है. इस व्यवस्था का बुनियादी उसूल है पदानुक्रम (यानी ऊँच-नीच की व्यवस्था).

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प्रत्येक जाति-विशेष परस्पर हैसियत की अनंत सीढ़ी के किसी न किसी पायदान पर किसी जाति से नीचे तो किसी के ऊपर स्थित है.

जातिमय समाज में परस्पर प्रस्थिति (स्टेटस) - जिसे लोग औक़ात के नाम से पहचानते हैं - हर इंसान की सामाजिक परिभाषा है. यहाँ प्रस्थिति या औक़ात इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि यह नवउदारवादी अर्थव्यवस्था द्वारा दिए गए ज़ख्मों को (कम-से-कम फ़ौरी तौर पर) भरने का काम कर सकती है. सामाजिक जगत में अपनी औक़ात पर गर्व करते हुए दूसरों को उनकी औक़ात बताने का सुख आर्थिक जगत की कुंठा को सहनीय बनाता है.

दूसरों को नीचा दिखाना, उनका अपमान करना यह जातिमय समाज में सामान्य व्यवहार है.

किंतु केवल इतना नाकाफ़ी है क्योंकि हत्या और वह भी किसी अनजान व्यक्ति की हत्या, निश्चित तौर पर असामान्य और असाधारण है.

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साधारण भेदभाव से असाधारण हिंसा तक पहुँचने के लिए राजनीतिक पहल की आवश्यकता होती है. इसी पहल द्वारा औसत भेदभाव करने वाले इंसान को प्रेरित कर उसे एक आक्रामक योद्धा बनाकर प्रतिशोध की खोज में भेजा जाता है. अब इस योद्धा को बदला लेना है लंबे समय से झेलते आ रहे उन तमाम अपमानों का जो उसके अवचेतन मानस में संचित हैं.

मानसिक चोटों और जख़्मों के अहसास से रोष और उन्माद पैदा होते हैं जो उसे क़त्ल करने लायक बनाते हैं.

जटिल कहानी की बारीकियों को किनारे करते हुए कहा जा सकता है कि हिंदुत्व की राजनीति ने इस प्रकार के प्रतिशोधक योद्धा तैयार किए हैं और इसके देखा-देखी कई अलग किस्म के योद्धा भी मैदान में कूद पड़े हैं जिनका हिंदुत्व से रिश्ता नहीं.

सियासी पहल

दूसरी तरफ़ राजनीतिक पहल गिने-चुने समुदायों को शत्रु के रूप में प्रस्तुत कर ऐसे शिकारियों के लिए शिकार का प्रबंध भी करती है.

इस पहल का आख़िरी काम है सफल शिकारियों का खुलेआम सम्मान (जैसा कि झारखंड के हज़ारीबाग से लोकसभा सांसद जयंत सिन्हा ने किया). इतनी सारी तैयारी के बाद सिर्फ़ इंतज़ार करना होता है नित नई सुर्खियों का...

याद कीजिए कि अरसा पहले कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने एक सवाल पूछा थाः वीरों का कैसा हो बसंत? "हिंसक भीड" और कुछ नहीं तो इस नवउदारवादी-युग के कुंठित, विकृत वीरों का बसंत तो है ही.

(सतीश देशपांडे दिल्ली विश्वविद्यालय में समाज शास्त्र पढ़ाते हैं. लेख में कही बातें उनके निजी विचार हैं)

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