समलैंगिक संबंध अपराध की श्रेणी से बाहर आ सकेगा?

  • 10 जुलाई 2018
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सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को समलैंगिक संबंधों को अपराध ठहराने वाली आईपीसी की धारा-377 पर पहले दिन की सुनवाई ख़त्म हो गई है. पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ आईपीसी की धारा-377 को ख़त्म करने के लिए कई याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई कर रही है.

एक याचिकाकर्ता ने बीबीसी से बातचीत में बताया कि पहले दिन की सुनवाई काफ़ी सकारात्मक रही और उन्हें पूरी उम्मीद है कि कोर्ट उनका पक्ष समझेगी. नाम न बताने की शर्त पर उन्होंने कहा, "कोर्ट का रुख़ काफ़ी अच्छा रहा. उन्होंने माना कि हमारे साथ समाज में भेदभाव होता है. कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से राइट टू च्वाइस ऑफ़ पार्टनर का हवाला भी दिया गया."

सोमवार को केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर सुनवाई स्थगित करने की मांग की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज़ कर दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2013 में दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले को पलटते हुए इसे अपराध की श्रेणी में डाल दिया था.

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट को इसके विरोध में कई याचिकाएं मिली. आईआईटी के 20 छात्रों ने नाज़ फाउंडेशन के साथ मिलकर याचिका डाली थी. इसके अलावा अलग-अलग लोगों ने भी समलैंगिक संबंधों को लेकर अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था, जिसमें ललित ग्रुप के केशव सूरी भी शामिल हैं. अब तक सुप्रीम कोर्ट को धारा-377 के ख़िलाफ़ 30 से ज़्यादा याचिकाएँ मिली हैं.

याचिका दायर करने वालों में सबसे पुराना नाम नाज़ फाउंडेशन का है जिसने 2001 में भी धारा-377 को आपराधिक श्रेणी से हटाए जाने की मांग की थी.

सोमवार को इन याचिकाओं पर सुनवाई का पहला दिन रहा. हालांकि इस मामले में रिव्यू पिटिशन पहले ही खारिज कर चुकी है और इसके बाद क्यूरेटिव पिटिशन दाख़िल की गई है.

क्या है धारा 377?

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में समलैंगिकता को अपराध माना गया है. आईपीसी की धारा 377 के मुताबिक, जो कोई भी किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ अप्राकृतिक संबंध बनाता है तो इस अपराध के लिए उसे 10 वर्ष की सज़ा या आजीवन कारावास दिया जाएगा. इसमें जुर्माने का भी प्रावधान है. यह अपराध ग़ैर ज़मानती है.

समलैंगिक संबंधों को लेकर क्या कहते हैं नियम?

भारत में समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखा गया है और इसे आपराधिक श्रेणी से हटाए जाने के लिए ही ये सुनवाई हो रही है.

हालांकि इस मामले में कई पेंच हैं. निजता के अधिकार पर एक सुनवाई करते हुए साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि "सेक्सुअल ओरिएंटेशन/ यौन व्यवहार सीधे तौर पर निजता के अधिकार से जुड़ा है. यौन व्यवहार के आधार पर भेदभाव करना व्यक्ति विशेष की गरिमा को ठेस पहुंचाना है."

साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे प्राकृतिक व्यवहार के विरूद्ध बताया और इसे अपराध ठहराया.

इस मामले पर LGBTQI के लिए काम करने वाले एक्टिविस्ट और वकील आदित्य बंदोपाध्याय ने बीबीसी को बताया, "अगर आप अपने पर्सनल स्पेस में होमोसेक्शुएलिटी फॉलो करते हैं तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन जब आप इसकी अभिव्यक्त करते हैं तो यह आपराधिक हो जाता है."

वहीं इस समुदाय के लिए काम करने वाले नक्षत्र भागवे कहते हैं कि लोगों को लगता है कि उनकी इस मांग के पीछे सेक्स है लेकिन ऐसा नहीं हैं. "हम सेक्स के लिए नहीं लड़ रहे हैं. हमारी ये लड़ाई हमारी पहचान के लिए है."

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तो क्या समलैंगिकता समाज के लिए ख़तरनाक है?

मनोचिकित्सकों की मानें तो ऐसे लोगों से डरने की कोई ज़रूरत नहीं हैं. इनके लिए भी समाज में स्वीकार्यता होनी चाहिए.

हालांकि ऐसा नहीं है कि सभी मनोचिकित्सक इससे इत्तेफ़ाक रखते हों.

क्या ये कोई बीमारी है?

'इंडियन साइकियाट्री सोसाइटी' ने एक आधिकारिक बयान में कहा था कि अब समलैंगिकता को बीमारी समझना बंद होना चाहिए.

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सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. अजित भिड़े का कहना है कि पिछले 40-50 सालों में ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है जो ये साबित कर सके कि समलैंगिकता एक बीमारी है.

डॉ. भिड़े ने ये भी कहा कि समलैंगिक होना बस अलग है, अप्राकृतिक या असामान्य नहीं. हालांकि आईपीसी की धारा-377 भी समलैंगिक संबंधों को अप्राकृतिक और दंडनीय अपराध मानती है.

दुनिया के दूसरे हिस्सों में क्या है स्थिति?

संयुक्त राष्ट्र के एक कैंपेन (मानवाधिकार के तहत आने वाले फ्री एंड इक्वल कैंपेन) के अनुसार दुनियाभर के 76 देशों में समलैंगिकता को लेकर भेदभावपूर्ण क़ानून हैं.

दुनिया के पांच देशों में इसके लिए मृत्यदंड का प्रावधान है.

हालांकि बीते कुछ सालों में समलैंगिकता को लेकर स्वीकार्यता बढ़ी है. ऑस्ट्रेलिया में हाल ही में गे शादियों को क़ानूनी मान्यता देने के लिए वोट कराए गए, बरमूडा में भी गे विवाह को प्रतिबंधित करने वाले क़ानून को बदल दिया गया.

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लेकिन इस समाज के लोगों का कहना है कि शादी को क़ानूनी मान्यता दिलाना उनका लक्ष्य नहीं है. उनकी लड़ाई पहचान के लिए है.

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