सरकार ने जियो इंस्टीट्यूट को क्यों दिया विशेष दर्जा

  • 10 जुलाई 2018
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Image caption प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुकेश अंबानी

मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर ने रविवार शाम को कुछ निजी शिक्षण संस्थानों को इंस्टीट्यूट ऑफ़ एक्सेलेंस (अग्रणी संस्था) की श्रेणी में चुने जाने पर मुबारकबाद दी थी.

केंद्रीय मंत्री जावड़ेकर ने अपने इस ट्वीट में मणिपाल यूनिवर्सिटी और बिट्सपिलानी यूनिवर्सिटी के साथ-साथ जियो इंस्टीट्यूट को भी बधाई दी.

लेकिन उनके इस ट्वीट के बाद एक नया विवाद खड़ा हो गया कि केंद्र सरकार ने किस आधार पर एक ऐसे संस्थान को इंस्टीट्यूट ऑफ़ एक्सेलेंस की सूची में शामिल किया जो अभी क़ाग़ज़ पर ही है.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने ट्वीट करके सवाल उठाया है कि अंबानी की एक यूनिवर्सिटी को इस तरह तरजीह दिया जाना चौंकाने वाला फ़ैसला है विशेषकर तब जब कई पहली श्रेणी की निजी यूनिवर्सिटीज़ को दरकिनार कर दिया गया है.

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रिलायंस इंडस्ट्रीज़ और जि़यो से जुड़े रोहित बंसल ने इस मुद्दे पर सरकार का बचाव करते हुए ट्विटर पर यूजीसी की अधिसूचना को साझा किया है.

29 अगस्त 2017 को जारी हुई इस अधिसूचना में उन नियमों का ज़िक्र किया गया है जिसके तहत एक निजी संस्थान को 'इंस्टीट्यूट ऑफ एक्सेलेंस डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी' का दर्जा दिया जा सकता है.

इस मुद्दे पर विवाद खड़ा होने के बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भी स्पष्टीकरण देते हुए इसी अधिसूचना का सहारा लिया है.

सरकार ने दी सफाई

एचआरडी मिनिस्ट्री ने अपने ट्वीट में उन नियमों का हवाला दिया है जिसके तहत किसी निजी संस्थान को ये दर्जा दिया जा सकता है.

इन नियमों में संस्था बनाने के लिए ज़मीन की उपलब्धता, शिक्षित और सक्षम टीम की मौजूदगी, संस्था को बनाने के लिए कोष और संस्था बनाने का चरणों में बंटी हुई पूरी योजना होनी चाहिए.

इस दिशानिर्देश के मुताबिक़ तैयार हो रही संस्थाओं से भी आवेदन पत्र दाख़िल करने को कहा जा सकता है.

अधिसूचना के मुताबिक़, इस दर्जे के लिए आवेदन करने वाले निजी संस्थान को साल 2016 के यूजीसी दिशानिर्देशों के आधार पर स्थापित किया जाना चाहिए.

एचआरडी मिनिस्ट्री का कहना है कि उसे इस श्रेणी में 11 आवेदन प्राप्त हुए थे, जियो ने विशेष दर्जे का संस्थान स्थापित करने के लिए सभी चार दिशानिर्देश पूरे किए हैं जिसके बाद उसे लेटर ऑफ इंटेंट यानी (सरकार की सहमति जताने वाला पत्र) जारी किया गया है.

एचआरडी मिनिस्ट्री के सचिव आर सुब्रमण्यम ने इस मुद्दे पर कहा है कि जियो इंस्टीट्यूट को अभी लेटर ऑफ इंटेंट जारी हुआ है और विशेष दर्जे वाले संस्थान का टैग नहीं दिया गया है.

उन्होंने ये भी बताया है कि जियो को तीन साल के अंदर इस तरह का संस्थान विकसित करना होगा. अगर वे ऐसा करने में सफल हो जाते हैं तो उन्हें ये टैग दे दिया जाएगा.

वो संस्थान जो रेस में पिछड़ गए

वो संस्थान जिन्हें इस श्रेणी में शामिल नहीं किया गया वो संस्थान इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन सेटलमेंट, बंगलुरु और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ, गांधीनगर हैं.

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन सेटलमेंट, बंगलुरु के संस्थापक सदस्यों में दीपक पारेख और नंदन निलेकणी जैसी हस्तियां शामिल रही हैं.

हालांकि कुछ लोग जैसे एजुकेशन और करियर पोर्टल करियर 360 के प्रमुख महेश्वर पेरी सरकार के इस निर्णय का ये कहकर समर्थन कर रहे हैं कि इससे भारत में दुनिया के नामी गिरामी विश्वविद्यालयों की शुरुआत होगी.

महेश्वर पेरी तो यहां तक कहते हैं, "रिलायंस को अग्रणी संस्था का दर्जा कैसे मिला जैसे सवाल पूछे जाने की बजाए प्रश्न ये होना चाहिए जब सरकार को अपने पास से एक पैसे भी न लगाने पड़ रहे हैं तो ऐसे और निजी संस्थानों को इस तरह का दर्जा क्यों नहीं मिलना चाहिए?"

उनके मुताबिक़ विश्व स्तर की संस्था बनाने के लिए अरबों-खरबों का ख़र्च होता है और जियो के पास उतना धन है कि वो ये काम कर सकता है.

शिक्षकों ने किया विरोध

लेकिन प्रेस को जारी किए गए एक बयान में दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) ने कहा, "एक सरकारी स्कीम को एक निजी संस्थान के प्रोत्साहन के तौर पर इस्तेमाल किया गया है."

डूटा का कहना है कि इस तरह के शर्मनाक फ़ैसले इस संशय की बुनियाद है कि ये सरकार उच्च शिक्षा को दुकानदारी में बदल देना चाहती है और निजीकरण को बढ़ावा देने के लिए किसी हद तक जा सकती है.

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पूर्व विदेश मंत्री और बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा ने सरकार के इस फ़ैसले के बारे में व्यंगात्मक लहजे में कहा है, "ये मुकेश अंबानी के नाम का जलवा है."

इसके अलावा झारखंड में विपक्ष के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने ट्वीट किया है कि जियो इंस्टीट्यूट जिसकी स्थापना अभी नहीं हुई है उसमें पहला लेक्चर अमित शाह जी देंगे और वो नैतिकता, सिद्धांतों और सहभागिता पर होगा.

हालांकि, पेरी महेश्वर का कहना है कि शिक्षा के निजीकरण की बहस ही बेमानी है क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में यह काफ़ी पहले शुरू हो चुका है.

वो उस ट्रेंड के बारे में बातें करते हुए कहते हैं जिसमें हर साल पहले से अधिक छात्र विदेशों में शिक्षा के लिए जा रहे हैं.

आज हर साल लगभग 1.5 लाख छात्र पढ़ाई के लिए बाहर जा रहे हैं, वो लाखों रुपए विदेशी संस्थानों में पढ़ाई के लिए ख़र्च करते हैं.

वो कहते हैं, 'रिलायंस जैसी यूनिवर्सिटी बनने के बाद यह ट्रेंड बदल सकता है और हो सकता है कि विदेश छात्र पढ़ने के लिए अधिक संख्या में भारत आने लगें."

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