नारायण दत्त तिवारी अगर 1991 में चुनाव जीतते तो शायद भारत के प्रधानमंत्री होते

  • 18 अक्तूबर 2018
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उत्तरप्रदेश और उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी का गुरुवार को निधन हो गया. वो 93 वर्ष के थे.

एनडी तिवारी कई दिनों से बीमार थे और दिल्ली के एक अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था.

ये एक संयोग ही है कि 18 अक्तूबर 1925 को जन्मे एनडी तिवारी का देहांत भी उनके जन्मदिवस पर हुआ.

एनडी तिवारी का राजनीतिक कार्यकाल क़रीब पाँच दशक लंबा रहा. तिवारी के नाम एक ऐसी उपलब्धि है जिसकी मिसाल भारतीय राजनीति में शायद ही मिले.

वो दो अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्री रहे. तिवारी 1976-77, 1984-84 और 1988-89 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और साल 2002 से 2007 तक उत्तराखण्ड के तीसरे मुख्यमंत्री रहे.

साल 1986-87 में एनडी तिवारी राजीव गांधी की सरकार में विदेश मंत्री रहे. इसके अलावा उन्होंने केंद्र में कई और मंत्रालय भी संभाले.

साल 2007-09 के दौरान वो आंध्र प्रदेश के गवर्नर भी रहे.

तिवारी ने अपना राजनीतिक सफ़र प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से शुरू किया था, पर बाद में वो कांग्रेस से जुड़ गए. जनवरी 2017 में उन्होंने अपने बेटे रोहित शेखर के साथ भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया था.

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'ओल्ड स्कूल' के राजनेता

भारतीय राजनीति में बहुत कम लोग होंगे जिन्हें उनकी पार्टी के लोग 'नथिंग डुइंग तिवारी' कह कर पुकारे और विरोधी 'ये न हैं नर, ना हैं नारी, ये हैं नारायण दत्त तिवारी' कह कर उनका उपहास करें. लेकिन उनके चेहरे पर कोई शिकन न आए.

नारायण दत्त तिवारी शायद भारत के अकेले राजनेता थे जिन्हें दो राज्यों (उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड) का मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.

तिवारी को नज़दीक से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार दिलीप अवस्थी कहते हैं कि "तिवारी राजनीति के उस 'ओल्ड स्कूल' का हिस्सा थे जो उनके बाद अब शायद ही कभी दिखाई देगा. बचपन से जो हम सुनते आये हैं कि राजनेता तिकड़मी होते हैं, बहुत चालाक होते हैं, बहुत सोचते हैं."

"ये सारी चीज़े नारायण दत्त तिवारी पर बिल्कुल भी लागू नहीं होती थीं. वो हर मुश्किल परिस्थिति को बहुत कोमलता के साथ 'हैंडल' करते थे. वो चाहे अयोध्या जैसा मामला हो या उत्तर प्रदेश के दंगे हों या कितना भी कठिन मामला हो, पहले तो वो मुस्कराएंगे."

"आप से कहेंगे, बैठिए, चाय पीजिए और थोड़ी देर में आपकी उत्तेजना की 'स्टीम' निकल जाएगी. उनकी 'विनिंग' मुस्कराहट ही सभी को शांत कर दिया करती थी."

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Image caption उत्तर प्रदेश में कमलापति त्रिपाठी की सरकार में मंत्री पद की शपथ लेते नारायण दत्त तिवारी

किसी को कभी ना नहीं कहा

स्वाधीन भारत में उत्तर प्रदेश की पहली विधानसभा में नारायण दत्त तिवारी सबसे युवा विधायक थे.

जिस समय 1952 में वो नैनीताल विधानसभा क्षेत्र से जीत कर उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुंचे थे, उस समय उनकी आयु मात्र 26 वर्ष थी.

जब उन्होंने सदन में अपना पहला भाषण दिया तो विपक्ष क्या, सत्ता पक्ष के लोग भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके थे.

नारायण दत्त तिवारी की ख़ास बात थी कि वो कभी किसी को ना नहीं कह सकते थे.

एक ज़माने में उनके सचिव रहे और बाद में रक्षा सचिव के पद से रिटायर हुए योगेंद्र नारायण बताते हैं कि "जो भी व्यक्ति उनसे मिलने आता था, वो उससे मिलते ज़रूर थे. एक बार मैंने अपनी आँखों से देखा कि वो एक शख़्स से हॉल में मिले, फिर दूसरे शख़्स से अकेले में मिलने लॉबी में बढ़ गए."

"फिर उस को भी छोड़कर तीसरे शख़्स से टॉयलेट के पास मिले और उससे मिलने के बाद दोबारा हॉल में वापस आ गए."

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Image caption स्वीडन के पूर्व प्रधानमंत्री ओलोफ़ पाम से नारायण दत्त तिवारी की गहरी दोस्ती थी

ओलोफ़ पाम के दोस्त

बहुत कम लोगों को पता है कि जब तिवारी उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य थे तो वो 1959 में स्वीडन में जाकर 6 महीनों के लिए वहाँ रुके थे और उन्होंने स्वीडिश भाषा पर महारत हासिल कर ली थी.

उनकी जीवनी लिखने वाले दुर्गा प्रसाद नौटियाल लिखते हैं, "साल 1983 में जब वो उद्योग मंत्री बने तो दोबारा स्वीडन गए. उन्होंने उस समय स्वीडन के प्रधानमंत्री ओलोफ़ पाम के निवास पर जाकर उनसे मुलाक़ात की. जब तिवारी 1959 में स्वीडन गए थे तो ओलोफ़ पाम सोशल डेमोक्रेटिक कांग्रेस के अध्यक्ष थे."

"पाम ने बहुत गर्मजोशी से उनका स्वागत किया. उनके हाथ में सीप की बनी एक चिड़िया थी, जिसका एक हिस्सा टूट गया था, लेकिन पाम उससे खेल रहे थे. अचानक उन्होंने तिवारी से पूछा, क्या तुम्हें याद है कि 25 साल पहले तुमने ये चिड़िया मुझे भेंट दी थी."

"मैंने इसे बहुत संभाल कर रखा लेकिन पिछले दिनों घर बदलते समय इसका एक हिस्सा चटक गया. इस बैठक के दौरान तिवारी पाम को 'योर एक्सीलेंसी' कहकर संबोधित कहते रहे. पाम ने इसका विरोध किया और कहा कि वो उन्हें 'योर एक्सीलेंसी' के बजाए भाई कहकर संबोधित करें."

"तिवारी ने हंसते हुए जवाब दिया अगर मैं ऐसा करता हूँ तो मेरी बगल में बैठे हुए हमारे राजदूत कूटनीतिक शिष्टाचार तोड़ने के लिए मेरी शिक़ायत हमारे प्रधानमंत्री से कर देंगे."

उसी यात्रा के दौरान एक भोज में जाने-माने अर्थशास्त्री गुन्नार मिर्डल मुख्य अतिथि थे और वहाँ नारायण दत्त तिवारी ने अपना भाषण स्वीडिश में दिया था.

नारायण दत्त तिवारी
Image caption बीबीसी के स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ पूर्व रक्षा सचिव योगेंद्र नारायण

हर नाम उनको रहता था याद

नारायण दत्त तिवारी की एक और ख़ूबी थी. वो शायद उन्होंने हेमवती नंदन बहुगुणा से सीखी थी. लोगों के नाम को कभी नहीं भूलना.

वो चाहे क्लर्क हो या चपरासी, तिवारी उसे हमेशा उसके नाम से ही पुकारते थे.

दिलीप अवस्थी बताते हैं कि "भीड़ में भी तिवारी लोगों को नाम से बुलाकर अपनी तरफ़ आकृष्ट कर लेते थे. न सिर्फ़ नाम बल्कि उसकी पूरी पृष्ठभूमि के बारे में तिवारी बाक़ायदा शोध करते थे. मसलन वो कहाँ का रहने वाला है? उसके कितने बच्चे हैं? उसकी पत्नी क्या करती है या उसके पिता क्या करते हैं?"

"ये सभी बातें तिवारी के दिमाग रूपी कंप्यूटर में क़ैद रहती थीं. उनको ये पता होता था कि लोगों का दिल किस तरह से जीता जाए."

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Image caption इंदिरा गांधी के साथ नारायण दत्त तिवारी

अठारह घंटे काम

मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री रहते हुए नारायण दत्त तिवारी के बारे में ये मशहूर था कि वो रोज़ 18 घंटे काम करते थे.

चाहे वो रात को 2 बजे सोने गए हों या सुबह 4 बजे, रोज़ 6 बजे उनकी आँख खुल जाया करती थी.

वो अपने लॉन में कुछ देर टहलने के बाद लोगों से मिलने के लिए तैयार हो जाते थे.

उनके प्रधान सचिव रहे योगेंद्र नारायण बताते हैं, "वो बहुत थोड़े से नोटिस पर अक्सर दिल्ली चले जाया करते थे. एक बार मैं सचिवालय के पास मे फ़ेयर सिनेमा हॉल में अपनी पत्नी के साथ एक फ़िल्म देख रहा था."

"अचानक मुख्यमंत्री ने मुझे बुलावा भेजा. मैंने अपनी पत्नी से कहा कि मैं थोड़ी देर में वापस आ जाऊंगा, इसलिए तुम फ़िल्म देखना जारी रखो. मैं थियेटर नहीं लौट सका क्योंकि तिवारी ने मुझसे उसी समय स्टेट प्लेन से दिल्ली चलने के लिए कह दिया. ज़ाहिर है मेरी पत्नी बहुत नाराज़ होकर अकेली घर लौटीं."

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अफ़सरों पर पूरी पकड़

दिलीप अवस्थी बताते हैं, "यूँ तो नारायण दत्त तिवारी को बहुत कम गुस्सा आता था लेकिन वो किसी से नाराज़ हैं, इस बात की पहचान इस बात से होती थी कि वो उसे महाराज और भाई साहब या भगवन कहकर संबोधित करने लगते थे."

"वो उन चंद चीफ़ मिनिस्टर्स में से थे जो फ़ाइल का एक-एक लफ़्ज़ पढ़ते थे. उसको अंडरलाइन करते थे. फ़ाइल पर लाल निशान सेक्शन अफ़सर के नहीं होते थे. वो ख़ुद फ़ाइल पर लाल निशान लगाया करते थे. इसलिए अफ़सरों के बीच में उनकी काफ़ी हड़क और डर था."

"ये माना जाता था कि नारायण दत्त तिवारी को बेवकूफ़ बनाना आसान नहीं है."

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Image caption तत्कालीन सोवियत संघ के प्रमुख गोर्बोचेफ़ और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ समझौते पर दस्तखत करते नारायण दत्त तिवारी (वे उस समय भारत के विदेश मंत्री थे)

जब तिवारी प्रधानमंत्री बनते बनते रह गए

सितंबर 1987 में एक बार ऐसा मौक़ा भी आया था जब नारायण दत्त तिवारी भारत के प्रधानमंत्री बनते बनते रह गए.

डीपी नौटियाल उनकी जीवनी 'नारायण दत्त तिवारी - ए लाइफ़ स्टोरी' में लिखते हैं, "जब राजीव गांधी बोफ़ोर्स मामले में फंसते हुए दिखाई दिए और विश्वनाथ प्रताप सिंह ने रक्षामंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया तो कांग्रेस पार्टी में ये सोच बनी कि राजीव गांधी अपने पद से दो तीन महीने के लिए इस्तीफ़ा दे दें और जब हालात बेहतर हो जाएं तो फिर उस पद पर दोबारा आसीन हो जाएं."

"उन दो तीन महीनों के लिए प्रधानमंत्री पद के लिए जिन दो नामों पर विचार हुआ था उनमें नरसिम्हा राव के साथ-साथ नारायण दत्त तिवारी भी थे. शुरू में राजीव गांधी नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री बनाने पर सहमत हो गए थे."

"लेकिन जब उन्हें समझाया गया कि इसका उत्तर भारत के वोटरों पर उल्टा असर पड़ सकता है तो नारायण दत्त तिवारी के नाम पर सहमति बनी. लेकिन जब ये प्रस्ताव तिवारी के सामने रखा गया तो उन्होंने उसे सिरे से ख़ारिज कर दिया."

"उनका तर्क था कि अगर वो इस पेशकश को मान लेते हैं तो आम आदमियों के बीच एक ग़लत संदेश जाएगा और वो समझेंगे कि राजीव गांधी संकट से भागने की कोशिश कर रहे हैं."

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Image caption नरसिम्हा राव और दूसरे नेताओं के साथ नारायण दत्त तिवारी

वीरबहादुर सिंह की काट

साल 1988 में नारायण दत्त तिवारी को वीर बहादुर सिंह के स्थान पर तीसरी बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना कर भेजा गया.

दिलीप अवस्थी बताते हैं कि "वीरबहादुर सिंह का ज़बरदस्त नेटवर्क था. वो ठाकुर एंगल पर भी काफ़ी काम करते थे. केंद्र में अरुण नेहरू सर्वेसर्वा हुआ करते थे. उनका इनपर वरद-हस्त था. कहा जा रहा था कि उनकी जगह आने वाले नारायण दत्त तिवारी के लिए रास्ता इतना आसान नहीं होगा."

"लेकिन तिवारी ठंडे दिमाग से ऑपरेट करने वाले नेता थे और उन पर ब्राह्मण नेता होने का कोई टैग नहीं लगा हुआ था. हांलाकि वो पहाड़ी थे, लेकिन वो किसी जाति से बंधे हुए नहीं थे. उनके क़रीबी लोगों में हर जाति और धर्म के लोग होते थे... मुस्लिम होते थे, ठाकुर होते थे."

"धीरे-धीरे उन्होंने अपना नेटवर्क बनाया और अपनी प्रशासनिक क्षमता से लोगों के बीच पैठ बनाने में सफल रहे. वीरबहादुर सिंह के साथ दिक्कत ये थी कि उनमें प्रशासनिक क्षमता बिल्कुल भी नहीं थी."

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Image caption नारायण दत्त तिवारी अपने बेटे रोहित शेखर और पत्नी उज्ज्वला तिवारी के साथ

सेक्स स्केंडल में फंसे

लेकिन महिलाओं के साथ उनके संबंधों को लेकर तिवारी की काफ़ी किरकिरी हुई. हद तो तब हो गई जब वो आंध्र प्रदेश के राज्यपाल थे.

उस दौरान एक तेलुगू चैनल ने राजभवन के बिस्तर पर तीन महिलाओं के साथ उनका वीडियो दिखाया. इसकी वजह से तिवारी को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.

दिलीप अवस्थी बताते हैं, "इंसान में कुछ कमज़ोरियां भी होती हैं. औरतों को लेकर इनकी कमज़ोरी आज की नहीं, बहुत पहले की थी. इनके बारे में बहुत सारे किस्से सत्ता के गलियारों में मशहूर रहे. कहा जाता है कि सुंदर महिलाओं के लिए उनके दिल में हमेशा एक सॉफ़्ट-कॉर्नर रहा."

साल 2008 में रोहित शेखर ने एक अदालत में ये दावा करते हुए पैटरनिटी सूट दायर किया कि नारायण दत्त तिवारी उनके पिता है.

डीएनए जाँच के बाद अदालत ने पाया कि नारायण दत्त तिवारी रोहित शेखर के बॉयलॉजिकल पिता हैं.

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89 की उम्र में शादी

वर्ष 2014 में नारायण दत्त तिवारी ने रोहित शेखर की माँ उज्जवला तिवारी से शादी कर ली. उस समय तिवारी की आयु 89 वर्ष थी.

तिवारी के प्रधान सचिव रहे योगेंद्र नारायण बताते हैं, "एक बार जब हम दिल्ली में उत्तर प्रदेश भवन में ठहरे हुए थे, देर रात एक महिला वहाँ आई और तिवारी जी से मिलने की इच्छा प्रकट की."

"तिवारी जी सोने जा चुके थे, इसलिए उस महिला से अगले दिन आने के लिए कहा गया. उस महिला ने जाने से इंकार कर दिया और मुख्यमंत्री के निजी सचिव से कहा कि वो उनको जाकर सूचित करें कि वो उनके पुत्र के साथ वहाँ आई हैं."

"जैसे ही उनके निजी सचिव ने तिवारी को ये बात बताई, वो तुरंत बाहर आ गए. उन्होंने हम सब से बाहर जाने के लिए कहा. बाद में हमें पता चला कि इन महिला और उनके पुत्र ने अदालत का सहारा लिया और तिवारी को उन्हें अपनी पत्नी मानने के लिए बाध्य होना पड़ा."

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Image caption इंदिरा गांधी के साथ नारायण दत्त तिवारी

चुनावी हार ने किया प्रधानमंत्री पद की होड़ से बाहर

कहा जाता है कि अगर नारायण दत्त तिवारी ने 1991 में संसदीय चुनाव जीत लिया होता तो राजीव गांधी की हत्या के बाद नरसिम्हा राव की जगह वो भारत के प्रधानमंत्री होते. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

वो सिर्फ़ 5000 वोटों से चुनाव हार गए. नरसिम्हा राव ने चुनाव तक नहीं लड़ा, तब भी वो भारत के प्रधानमंत्री बन गए.

दिलीप अवस्थी कहते हैं कि "ये कहना मुश्किल है कि क्या होता या क्या नहीं होता. लेकिन ये बात ज़रूर है कि इस राजनेता में बहुत दम था. वो एक विजन वाले शख़्स थे. आज के युग में इस तरह के नेता बहुत मुश्किल से मिलते हैं."

"अगर वो प्रधानमंत्री होते तो कोई बड़ी बात नहीं होती. इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि वो इस पद की शोभा ही बढ़ाते, उसको नीचे नहीं लाते."

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