क्या लंबी मैटरनिटी लीव महिलाओं के लिए आफ़त बन गई है?

  • 14 जुलाई 2018
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टेनिस खिलाड़ी सेरेना विलियम्स, प्रेग्नेंसी की वजह से 13 महीने बाद जब वापस मैदान पर उतरीं तो उन्हें कोई वरीयता हासिल नहीं थी.

ऐसा इसलिए क्योंकि पिछले एक साल से प्रेग्नेंसी की वजह से वो मैदान से बाहर थीं.

23 ग्रैंड स्लैम जीतने के बाद जब सेरेना के साथ ऐसा हुआ तो कई जगह इसकी आलोचना भी हुई. लेकिन टेनिस के खेल का नियम ही कुछ ऐसा है.

लेकिन प्रेग्नेंसी के बाद काम पर वापस लौटने पर जो दिक्क़त सेरेना के सामने आई वो दिक्क़त अकेली सेरेना की नहीं है.

रश्मि वर्मा दिल्ली के एक अस्पताल में कॉन्ट्रेक्ट पर रेडियोलॉजी विभाग में काम कर रही थीं. पिछले साल दिसंबर में उनको बेटा हुआ, छह महीने की छुट्टी के बाद जब वो काम पर लौटीं तो उन्हें उनकी पुरानी जगह पर नौकरी तो मिल गई, पर सालाना मिलने वाला इंक्रीमेंट उन्हें नहीं मिला.

बीबीसी से बातचीत में रश्मि कहती हैं, "एक तरह से देखा जाए तो सरकार ने मुझे छह महीने की सैलरी दी है. कंपनी ने क्या दिया? मुझे जो मिलना चाहिए वो भी काट लिया."

ये सवाल पूछने पर कि क्या ये बातें उन्होंने अपने मैनेजमेंट के सामने रखीं? रश्मि कहती हैं, "खुल कर तो नहीं कहा लेकिन दूसरे कर्मचारियों से ये बातें मुझ तक पहुंचाई गई कि छह महीने तक सैलरी सरकार ने नहीं कंपनी ने उन्हें दी है."

मैटरनिटी क़ानून के प्रावधान

2017 से पहले भारत में कामकाजी महिलाओं को 12 हफ्तों की मैटरनिटी लीव मिलती थी.

लेकिन अकसर महिलाओं के लिए तीन महीने की छुट्टी के बाद वापस काम पर लौटना मुश्किल होता था और वो अपनी छुट्टी बढ़ा लेती थीं.

केन्द्र सरकार ने महिलाओं के इस दर्द को समझते हुए 26 हफ़्ते की मैटरनीटी लीव का क़ानून 2017 में पास किया.

लेकिन जिस क़ानून के लिए देश की महिलाओं ने इतनी बेसब्री से इंतज़ार किया, अब पता चल रहा है कि वो क़नून उन्हीं के लिए उलटा पड़ रहा है.

कर्मचारियों को मिलने वाली सहूलियतों पर काम करने वाली संस्था टीमलीज़ ने हाल ही में एक सर्वे किया है.

इस सर्वें में कंपनी और उनमें काम करने वाली महिलाओं से पूछा गया कि नए मैटरनिटी लीव के प्रावधान के बाद, कामकाजी महिलाओं पर इसका कितना सकारात्मक या नकारात्मक असर पड़ा है?

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सर्वे का सच

भारत में चल रही 300 कंपनियों पर ये सर्वे किया गया.

इसमें सबसे चौंकाने वाली बात ये सामने आई है कि साल 2018-19 में 1.6 फीसदी से 2.6 फ़ीसदी महिलाओं की नौकरी जा सकती है.

यानी साल 2018-19 में 11लाख से 18 लाख महिलाओं की नौकरी से छुट्टी हो सकती है.

भारत के मैटरनिटी क़ानून में बदलाव के बाद इस तरह की पहली रिपोर्ट है.

टीमलीज़ की तरफ से रिपोर्ट तैयार करने वाली ऋतुपर्णा चक्रवर्ती के मुताबिक, "हमने एक साल तक इस सर्वे पर काम किया है. इस नतीजे पर पहुंचना बहुत आसान नहीं था. लेकिन हर जगह दबी ज़बान में ये देखने को मिला कि काम पर रखने के पहले महिलाओं से उनकी शादी और बच्चे के प्लान के बारे में पूछा जाने लगा है."

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एक महिला ने अपना अनुभव बीबीसी के साथ साझा किया.

ऋतुपर्णा ने बाताया कि प्राइवेट कॉलेज में प्रोफ़ेसर के पद पर नियुक्ति के लिए साक्षात्कार के दौरान एक महिला से पूछा गया कि क्या आप विवाहित हैं, तो फैमिली कब शुरू करने वाली हैं?

ऋतुपर्णा बताती हैं, "अब इस तरह के सवाल इंटरव्यू में पूछे जाने लगे हैं. लिखित में कोई कंपनी ये क़ानून नहीं बनाती है कि गर्भवती महिलाओं को नौकरी पर नहीं रखना है या फिर शादी के तुरंत बाद महिलाओं को बच्चा पैदा करने की इजाज़त नहीं होगी, लेकिन बिना कहे इस तरह के नियम बन गए हैं और इनका पालन भी किया जा रहा है."

लेकिन क्या हर तरह की नौकरी में महिलाओं के लिए दरवाज़े बंद हो रहे हैं?

इस पर ऋतुपर्णा कहती हैं, "लघु एवं मध्यम उद्योग (SMES), शिक्षा और स्टार्ट-अप में ये दिक्क़तें महिलाओं के लिए ज़्यादा आ रही हैं. लेकिन दूसरे क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएं इससे पूरी तरह से अछूती नहीं हैं."

कामकाजी महिलाओं की स्थिति

2017 में जारी वर्ल्ड बैंक कि एक रिपोर्ट के मुताबिक़, कामकाजी महिलाओं की संख्या के हिसाब से भारत 131 देशों में से 120 वें पायदान पर है. यहां केवल 27 फ़ीसदी महिलाएं कामकाजी हैं, जबकि देश की आधी आबादी महिलाओं की है.

ऐसे में अर्थव्यवस्था में महिलाओं की ज़्यादा भागीदारी कैसे सुनिश्चित की जाए?

दिल्ली के अशोका यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर वूमेन लीडरशिप की डायरेक्टर हरप्रीत कौर कहती हैं, "मैटरनिटी बेनिफिट क़ानून में संशोधन कर सरकार ने बहुत सकारात्मक कदम उठाया है. क़ानून के पीछे की सोच अच्छी है. आने वाले दिनों में हो सकता है इसके अच्छे परिणाम देखने को मिलें. लेकिन ये बात भी सही है कि काम पर रखने वाले संस्थानों के लिए खर्चा बढ़ गया है."

वो आगे कहती हैं, "क्रेच बनाना, छह महीने तक सैलरी देना - दोनों का बोझ केवल काम पर रखने वाले संस्थान पर डाल दिया गया है. कहीं न कहीं इससे कंपनी के प्रॉफ़िट पर असर पड़ता है."

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आख़िर उपाक्या है?

इसके जवाब में हरप्रीत कौर कहतीं हैं, "दुनिया में कई देशों में मेटरनिटी लीव की जगह पेरेंटल लीव का प्रावधान है. यानी मातृत्व अवकाश सिर्फ़ मांओं की ज़िम्मेदारी नहीं, माता-पिता में से कोई भी बच्चा होने पर उनको पालने के लिए अवकाश ले सकता है. भारत में ऐसा हो तो कुछ हद तक इस समस्या का समाधान हो सकता है."

उनके मुताबिक़,"स्टार्ट-अप और लघु एवं मध्यम उद्योग (SMES) जो गर्भवती महिलाओं को काम पर रखते हैं उनकी मदद सरकार भी पैसों से करे. ये लंबे समय तक न हो पाए तो शुरुआती सालों में जरूर करें."

ऋतुपर्णा भी मनप्रीत की बात से सहमत नज़र आती हैं. उनके मुताबिक़ अगर सरकार कोई सहायता राशि नहीं दे सकती तो कम से कम ऐसी कंपनियों को टैक्स में रियायत दे कर भी काम बन सकता है.

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