नज़रिया: महबूबा की बीजेपी को चेतावनी में कितना दम

  • 16 जुलाई 2018
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जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने अपने पुराने सहयोगी दल और केंद्र में सरकार चला रही भारतीय जनता पार्टी को चेतावनी दी है कि अगर उसने पीडीपी को तोड़कर जम्मू-कश्मीर में अपनी सरकार बनाने की कोशिश की तो कश्मीर में सुरक्षा से जुड़े हालात उन दिनों जैसे हो जाएंगे जब 'यासीन मलिक और सलाहुद्दीन दुनिया के सामने आए थे'. मुफ़्ती की ये चेतावनी किसी राजनीतिक बयानबाज़ी से कहीं ज़्यादा है.

वह बीजेपी को बताना चाहती हैं कि राज्य में सरकार बनाने के उसके राजनीतिक उद्देश्य की क़ीमत जम्मू-कश्मीर में पहले से बिगड़ी सुरक्षा व्यवस्था के और बिगड़ने के रूप में सामने आएगी.

महबूबा अपनी पार्टी के असंतुष्ट लोगों को भी चेतावनी दे रही हैं कि वे भी अपनी जान दांव पर लगा रहे हैं.

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कश्मीर में उलटा चलता हुआ समय

इस साल जून का महीना जम्मू-कश्मीर के लिए वैसे भी पूर्वानुभव जैसा भाव लेकर आया है. ऐसा लगता है कि जम्मू-कश्मीर वापस 1990 के दौर में पहुंच गया है.

इसकी वजहों में एक प्रतिष्ठित पत्रकार और शांति समर्थक शुजात बुख़ारी को निशाना बनाकर मारा जाना, जम्मू-कश्मीर में बीते दो सालों में हुई हिंसा पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट का आना और उसमें सुरक्षाबलों पर अत्यधिक शक्ति का इस्तेमाल करने और गैरकानूनी हत्याएं, लोगों को जख़्मी किए जाने का आरोप लगाया जाना शामिल है.

कश्मीर में मानवाधिकार से जुड़ी आलोचनाएं साल 1990 की भीषण हिंसा के बाद बंद हो गई थीं, लेकिन कश्मीर के मुद्दे पर कठोर नीति रखने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौर में स्थिति इतनी ख़राब है कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार करने की बात कही है.

बीजेपी के पास कितनी क्षमता

महबूबा मुफ़्ती ने वर्तमान विधानसभा में ही बीजेपी द्वारा सरकार बनाने की कोशिशों से जुड़ी अफवाहों के सामने आने के बाद ये चेतावनी दी है. (राज्यपाल एनएन वोहरा ने सावधानीपूर्वक जम्मू-कश्मीर विधानसभा को भंग नहीं किया है जबकि साल 1990 में उनके पूर्ववर्ती जगमोहन ने तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉक्टर फारुक़ अब्दुल्ला के इस्तीफ़े के बाद विधानसभा को जल्द ही भंग कर दिया था.

इसके बाद अगली सरकार बनने में छह सालों का समय लगा और भारी सुरक्षा के बीच 1996 में जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराए गए.

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Image caption केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के साथ दिनेश्वर शर्मा

9 जुलाई को इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट दी थी कि बीजेपी एक वैकल्पिक सरकार बनने को तैयार थी और बस ये बाकी था कि मुख्यमंत्री पद किसके हिस्से में जाएगा.

इस रिपोर्ट के मुताबिक़, पीडीपी में असंतुष्ट विधायकों की संख्या 21 से बढ़कर 28 हो गई है जो कि दलबदल विरोधी क़ानून से बचाव के लिए काफ़ी है.

अगर बीजेपी का गणित समझें तो ये देखना होगा कि विधानसभा में अध्यक्ष एक बीजेपी नेता है जो कि अपने आप में फ़ायदेमंद है, इसके साथ ही बीजेपी को सज्जाद लोन के नेतृत्व वाली पार्टी पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के दो सदस्यों का समर्थन हासिल है.

सज्जाद लोन वही राजनेता हैं जिनके पिता अब्दुल गनी लोन ने अलगाववादी गठबंधन ऑल पार्टीज़ हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की स्थापना की थी और जिनकी राजनीतिक हत्या कर दी गई थी.

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कौन बनेगा नया मुख्यमंत्री

इस सब के आधार पर बीजेपी के पास नई सरकार बनाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद है. मगर, जहां बीजेपी अपना मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश में है वहीं सज्जाद लोन भी सीएम बनना चाहते हैं और उनकी तरह पीडीपी के दूसरे कई विधायक भी यही करना चाहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि ये उनके राजनीतिक जीवन का आखिरी दांव होगा.

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Image caption यासीन मलिक, अलगाववादी कश्मीरी नेता

इस तरह की संभावनाओं की प्रतिक्रिया में महबूबा मुफ़्ती ने शुक्रवार को इसके गंभीर परिणाम सामने आने की चेतावनी दी है.

उन्होंने कहा है, "अगर केंद्र सरकार 1987 की तरह लोगों से उनके चुनाव का अधिकार छीनती है तो स्थिति 1987 जैसी होगी जब सलाहुद्दीन और यासीन मलिक का जन्म हुआ था."

क्या है सलाहुद्दीन की कहानी

सलाहुद्दीन उन उम्मीदवारों में शामिल थे जो श्रीनगर के डाउन टाउन इलाके से पराजित हुए थे. वह मुस्लिम संयुक्त मोर्चा (एमयूएफ़) के उम्मीदवार थे और उनका असली नाम यूसुफ़ शाह था. (मुस्लिम संयुक्त मोर्चा के नेताओं ने ही साल 1993 में हुर्रियत की शुरुआत की थी).

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सलाहुद्दीन बाद में पाक समर्थित चरमपंथी संगठन हिज्बुल मुजाहिदीन में शामिल हो गए. वर्तमान में वह पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में स्थित संयुक्त जिहाद परिषद का नेतृत्व करते हैं.

यासीन मलिक इन्हीं यूसुफ़ शाह के चुनाव का काम देखने वालों में शामिल थे. उन्हें जेल भेजा गया जिसके बाद वे स्वतंत्रता जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ़्रंट में शामिल हो गए और 1989-90 के दौरान निशाना बनाकर की गई हत्याओं के लिए ज़िम्मेदार थे. साल 1994 में जेल से रिहा होने के बाद वे गांधीवादी हो गए हैं.

तब और अब में क्या समानता?

ऐसे में असली समानताएं ये हैं कि नई सरकार बनाने के लिए अगर पीडीपी में बंटवारा हुआ तो ये उस तरह होगा जैसे साल 1984 में फारुक़ अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ़्रेंस का हुआ था और रिश्ते में उनके भाई गुल शाह ने सरकार की कमान अपने हाथ में ले ली.

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Image caption नेशनल कॉन्फ़्रेंस के अध्यक्ष फारुक अब्दुल्ला

साल 1987 में जब फारुक़ अब्दुल्ला ने कांग्रेस पार्टी से हाथ मिलाकर 1987 का चुनाव लड़ा जो कि एक धांधली से भरा हुआ चुनाव था. इससे चरमपंथियों की पहली खेप तैयार हुई, लेकिन महबूबा की चेतावनी का तथ्य ये है कि इस तरह सरकार बनाए जाने का कोई भी प्रयास कश्मीर को राजनीतिक रूप से आगे ले जाने की जगह पीछे ले जाएगा.

यदि बीजेपी अभी भी एक नई सरकार बनाने को लेकर अडिग है तो ये तत्काल नहीं होगा. अमृतनाथ यात्रा 25 अगस्त को समाप्त होती है.

यह वो समय होगा जब राजनीतिक दांवपेंच तेज़ी से शक्ल लेंगे क्योंकि बीजेपी के पास मई 2019 में होने वाले संसदीय चुनाव भी हैं और उसे उन चुनावों के बारे में भी सोचना है.

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