जस्टिस गोगोई के लिए CJI की राह कितनी मुश्किल

  • 15 जुलाई 2018
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इस साल अक्तूबर की शुरुआत में चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया दीपक मिश्रा रिटायर हो रहे हैं.

उनके सेवानिवृत्त होने के बाद क्या सुप्रीम कोर्ट के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश रंजन गोगोई को भारत का अगला चीफ़ जस्टिस बनाया जाएगा?

लेकिन क्या कार्यपालिका किसी मुखर छवि वाले न्यायाधीश को चीफ़ जस्टिस बनते देखना चाहेगी?

साल 2014 में नरेंद्र मोदी एक बड़ी जीत के बाद सत्ता में आये थे. तब से लेकर अब तक ऐसे पर्याप्त उदाहरण हैं जिनमें न्यायिक मामलों में हस्तक्षेप की बात सामने आई.

राजनीतिक और क़ानूनी हलकों में उठने बैठने वाले लोग कहते हैं कि अगर जस्टिस गोगोई को पीछे छोड़ दिया जाता है तो वो इससे बिल्कुल भी आश्चर्यचकित नहीं होंगे और ऐसा महसूस करने के लिए उनके पास पर्याप्त कारण भी हैं.

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सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जजों में जस्टिस गोगोई को सबसे मुखर जज कहा जाता है.

हाल ही में पूर्व जस्टिस जे चेलमेश्वर, मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ़ के साथ भारतीय न्यायपालिका के भीतर फैली अव्यवस्था के बारे में एक अभूतपूर्व प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके जस्टिस गोगोई ने विवाद खड़ा कर दिया था.

इन जजों का आरोप था कि संवेदनशील मामलों को चुनिंदा जजों के पास भेजा जा रहा है और ये लोकतंत्र के लिए एक बड़ा ख़तरा है.

हालांकि किसी भी जज ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस में 'बेंच फ़िक्सिंग' शब्द का उपयोग नहीं किया था. लेकिन उनकी बात का सार यही निकाला गया.

एक केस जिसे लेकर इन जजों ने चिंता ज़ाहिर की थी वो एक जज का ही केस है जिन्हें संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाया गया था.

इस केस के बारे में व्यापक रूप से ये अफ़वाह रही है कि जज की हत्या की गई थी. क्योंकि वो एक ऐसे केस की सुनवाई कर रहे थे जिसमें सत्ताधारी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का नाम था और कोर्ट का फ़ैसला उनके करियर को प्रभावित कर सकता था.

न्यायिक सरंचना

फिलहाल जो व्यवस्था है, उसके मुताबिक़ चीफ़ जस्टिस ही इसका फ़ैसला करते हैं कि किसी केस की सुनवाई किन जजों की बेंच करेगी.

वरिष्ठ न्यायाधीशों के इस तरह के विद्रोह ने मीडिया में एक बहस का मुद्दा छेड़ दिया है और ये भी पता चल गया कि कैसे खाली सीटों को कोर्ट तब तक नहीं भरता जब तक सरकार की तरफ़ से किसी जज की सिफ़ारिश नहीं आ जाती.

भारतीय अदालत में लाखों मामले लंबित हैं और न्यायिक सरंचना के कारण बहुत से केस नतीजे तक नहीं पहुँच पाते.

इस कारण से कोर्ट का प्रशासन सवालों के घेरे में खड़ा हो गया है. लंबित मामलों का आंकड़ा बड़ा है जिनकी सुनवाई सालों से चल रही है.

न्याय में देरी होना, न्याय नहीं मिलना कहा गया है. और यही सच्चाई है उन लाखों लोगों की जो कोर्ट में चल रहे अपने मामलों के लिए जूझ रहे हैं और फ़ैसले के इंतज़ार में जेलों में क़ैद हैं.

एक हक़ीक़त ये भी सामने आई है कि लोकतंत्र के चार खंभों में से एक न्यायपालिका में दरार पड़ गई है जिस पर एक आम इंसान विश्वास करता है.

बाक़ी के तीन- कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया अपनी विश्वसनीयता पहले ही खो चुके हैं. एक न्यायपालिका ही है जो लोगों की आख़िरी उम्मीद थी.

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न्यायपालिका की रक्षा पंक्ति

दिल्ली में तीसरे रामनाथ गोयनका स्मृति व्याख्यान के दौरान गोगोई ने एक बार फिर अजीब सा बयान दिया और कहा कि न्यायपालिका को पवित्र, स्वतंत्र और क्रांतिकारी होना चाहिए.

हालांकि न्यायपालिका के लोगों ने उनके और उनके तीन सहयोगियों की तब आलोचना की जब उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस किया था, तब कहा गया था कि ऐसा पहले किसी न्यायाधीश ने नहीं किया था.

अपने व्याख्यान में गोगोई ने कहा, ''हो-हल्ला मचाने वाले जज न्यायपालिका की पहली रक्षा पंक्ति थी.'' उन्होंने इशारा किया कि उन्हें याद नहीं कि पिछली बार कब ज्यूडिशियल विंग की कोई बड़ी ख़बर आई हो.

उन्होंने न्यायपालिका को उम्मीद का आख़िरी गढ़ बताकर एकदम सही उल्लेख किया और कहा कि उसे अपने नैतिक और संस्थागत फ़ायदों को संरक्षित रखना चाहिए और हर समय पवित्र, स्वतंत्र और क्रांतिकारी होना चाहिए.

ये सच है कि चीफ़ जस्टिस से मिलने की उनकी कई कोशिशें असफल रहीं और इसलिए उनके समस्याओं का समाधान नहीं निकल पाया. बाद में वो अपनी सभी शिक़ायतों के साथ सबके सामने आ गए. उन्होंने कोर्ट के प्रशासन पर भी सवाल उठाए.

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निजता के अधिकार पर सवाल

ये स्पष्ट है कि अगर वे अगले मुख्य न्यायाधीश बने तो वो पूरे साहस के साथ कई ज़रूरी मुद्दों को सामने लाएंगे. जैसे रिक्तियों को भरना और सरकार के साथ मिलकर न्यायिक ढांचे को दुरुस्त करना.

भारत ने पिछले चार सालों में बहुत सी उथल-पुथल और राजनीतिक हिंसाएं देखी हैं. इनमें गौ-हत्याएं या गौ तस्करी के शक़ में सरेआम कई लोगों को मारा जाना शामिल है.

समाज का बँटवारा करने के लिए कई सांप्रदायिक घटनाएं हुई हैं. दंगों को भड़काने में कई सत्तारूढ राजनीतिक पार्टी और राजनेताओं का नाम सामने आया है.

आधिकारिक एजेंसियों का हस्तक्षेप बढ़ने के कारण निजता के अधिकार पर सवाल उठाए गए हैं. डाटा लीक होने के कारण एक नया डर बन गया है.

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Image caption जे चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन बी लोकुर, कुरियन जोसफ़

लोकतंत्र का वास्तविक परीक्षण

चुनाव जीतने के लक्ष्य के कारण देश की राजनीतिक संस्कृति के हालात पहले से और बुरे हो गए हैं.

चुनाव के समय कई वायदे किये जाते हैं और सरकार में आने के बाद सब भूल जाते हैं. गोगोई ने उन सभी ज़रूरी मामलों पर संक्षिप्त व्याख्यान में विवरण दिया है.

उन्होंने ये भी ध्यान दिलाया है कि बोलने की आज़ादी देने वाले कोर्ट के पिछले एक फ़ैसले में सूचना प्रौद्योगिक अधिनियम की धारा 66-ए पर हमला किया जिसकी वजह से ऑनलाइन पर ख़ुलकर बोलने पर भी प्रतिबंध लगा.

अनुसूचित जाति के लोगों और अल्पसंख्यकों पर बढ़ती हिंसा के कारण उनमें भय का माहौल है. इस पर गोगोई कहते हैं कि भारत में अल्पसंख्यकों की मौजूदगी को दिखाना ही लोकतंत्र का वास्तविक परीक्षण है.

गोगोई उस तथ्य को भी नहीं भूले जिसमें उन्होंने कहा कि न्याय कोई ख़ुद को साबित करने वाला नियम नहीं है, बल्कि समाजवाद, लोकतंत्र, समानता, बंधुता जैसे कुछ आदर्शों का मिश्रण है.

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न्यायप्रणाली में सुधार

अदालत में मुक़दमे लड़ रहे लोगों के लिए न्याय अब भी दूर की कौड़ी है. वह सही कहते हैं कि अगर अदालत से मिला न्याय हक़ीकत में तब्दील नहीं होता और ज़मीनी स्तर पर लागू नहीं होता, तो उसके कोई मायने नहीं हैं.

उन्होंने कहा कि न्याय ऐसा हो जिसे लागू किया जा सके. साथ ही ये साफ़ है कि न्यायप्रणाली में सुधार उस तरह नहीं हुए जैसे होने चाहिए थे.

कुछ आशावादी लोग मानते हैं कि जस्टिस गोगोई ही अगले मुख्य न्यायाधीश होंगे. वो इसके कई कारण बताते हैं. मसलन, जब चीफ़ जस्टिस के नाम का फ़ैसला होने का वक़्त आएगा, तब भाजपा सरकार 2019 के आम चुनाव की तैयारी कर रही होगी. चुनाव कुछ ही महीने दूर होंगे.

ऐसे समय में सरकार जस्टिस गोगोई का रास्ता रोककर अपने ख़िलाफ़ कोई नकारात्मक प्रचार नहीं होने देना चाहेगी. वो भी तब जब सरकार पहले से ही कई विवादों से जूझ रही है.

आने वाले वक़्त में हालात कैसे होंगे और चीज़ें किस तरह से शक़्ल लेंगी ये अगले कुछ ही हफ़्तों में तय होना है.

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