केरल: क्या सीपीएम हिंदुओं की ओर झुक रही है?

  • 16 जुलाई 2018
रामलीला
Image caption प्रतीकात्मक तस्वीर

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने केरल में 17 जुलाई से रामायण माह का आयोजन किए जाने से जुड़ी ख़बरों का आधिकारिक रूप से खंडन किया है. इस समय सिर्फ केरल ऐसा प्रदेश है जहां मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार है.

लेकिन विश्लेषकों की मानें तो सीपीएम उसी 'नरम हिंदुत्व' की ओर बढ़ रही है जिस तरह पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपनी सरकार के दौरान अल्पसंख्यकों को खुश करने के बाद हिंदू समाज को रिझाने की कोशिश की थी.

केरल में मीडिया के कुछ हिस्सों में मंगलवार को शुरू हो रहे पवित्र महीने कर्रकादाकम के दौरान रामायण से जुड़े कार्यक्रमों को आयोजित किए जाने से जुड़ी ख़बरें सामने आईं तो केरल में पार्टी के प्रदेश सचिव कोडियेरी बालाकृष्णा ने इन ख़बरों को पूरी तरह तथ्यहीन बता दिया.

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Image caption बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह

पार्टी ने बताया अफ़वाह

सीपीएम की केरल इकाई ने इस मुद्दे पर किए ट्वीट में लिखा है, "सीपीएम के प्रदेश सचिव कोडियेरी बालाकृष्णन बता चुके हैं कि सीपीएम की ओर से कर्रकादाकम महीने के दौरान "रामायनम ऑब्जर्वेंस" नाम के कार्यक्रम के आयोजन से जुड़ी ख़बरें आधारहीन अफ़वाहें हैं. इसके बावजूद मीडिया का एक हिस्सा सीपीएम के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार में शामिल हो रहा है."

पार्टी की केरल इकाई ने अपने एक अन्य ट्वीट में लिखा है, "राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ रामायण से जुड़े आयोजनों का इस्तेमाल अपना सांप्रदायिक एजेंडा बढ़ाने में करती आई है. संस्कृत विद्वानों और शिक्षकों की संस्था संस्कृत संघम कुछ कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है जिसके ज़रिए सांप्रदायिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पुराणों की ग़लत व्याख्या को सामने लाया जाएगा."

क्या कहते हैं सीपीएम के सांसद?

सीपीएम सांसद एम बी राजेश ने बीबीसी हिंदी को बताया, "संस्कृत संघम संस्कृत के विद्वानों की एक प्रगतिशील संस्था है जो कि आरएसएस के दुष्प्रचार और सांप्रदायिकता का सामना करने की कोशिश कर रही है. ये पहली बार नहीं है कि जब ये सब हो रहा है. बीते साल मेरी ही लोकसभा सीट पालक्कड़ में ऐसे ही 25 सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया था."

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"इन कार्यक्रमों को आयोजित करने के पीछे उद्देश्य ये है कि इन ग्रंथों के बहुसंख्यकवाद को कायम रखा जा सके. आरएसएस इस पवित्र महीने में इस महान ग्रंथ को आगे बढ़ाकर अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति करती रही है. केरल में इस तरह के हस्तक्षेप होते रहे हैं और इसमें कुछ भी नया नहीं है. इस प्रयास का सीपीएम से कोई लेना देना नहीं है लेकिन हम हर तरह के बौद्धिक दखल का समर्थन करते हैं."

संस्कृत संघम से जुड़े टी. थिलाराज ने भी बीबीसी से इस मुद्दे पर बात की है.

वह बताते हैं, "रामायण कोई धार्मिक किताब नहीं है. इस किताब में धर्मनिरपेक्षता का तत्व भी है. हम ज़िला मुख्यालय में 15 अगस्त तक चलने वाले सम्मेलनों में यही बात रखेंगे."

उधर, कांग्रेस पार्टी के विचार विभाग ने भी रामायण आयोजन का फ़ैसला किया था लेकिन केरल के वरिष्ठ नेताओं के दबाव में आकर ये आयोजन न करने का फ़ैसला किया है.

कांग्रेस नेता रमेश चन्निताला ने कहा, "हमारी राजनीतिक पार्टी है. हमें धार्मिक आयोजन करने की जरूरत नहीं है. "

वहीं, सीपीएम और कांग्रेस की धुर विरोधी बीजेपी इस घटनाक्रम से खुश नज़र आ रही है.

बीजेपी ख़ुश क्यों है?

बीजेपी सांसद वी मुरलीधरन कहते हैं, "बीजेपी और आरएसएस की राष्ट्रवादी नीतियों को सीपीएम ने स्वीकार कर लिया है. असली समस्या ये है कि केरल के हिंदू समाज में बीजेपी और आरएसएस का प्रभाव बढ़ रहा है. सीपीएम अपने मतदाताओं को साथ रखना चाहती है क्योंकि हिंदू समाज, जिनमें ओबीसी और दलित शामिल हैं, बीजेपी की ओर जा रहा है. वे लोग इसे ध्यान में रखते हुए ही रामायण महीने का आयोजन कर रहे हैं."

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक बी. आर. पी. भाष्कर मुरलीधर की व्याख्या के एक हिस्से से सहमत हैं.

लगभग दो दशक पहले आरएसएस और बीजेपी कृष्ण जयंती के दौरान छोटे-छोटे बच्चों को कृष्ण और गोपिकाएं बनाकर लाई थी. इसके बाद बीते कुछ वर्षों में कृष्ण जयंती सीपीएम और बीजेपी के बीच प्रतिस्पर्धा का मुद्दा बन चुकी है. अब ये ध्यान भगवान राम की ओर चला गया है.

मतदाताओं को रिझाने की कोशिश

भाष्कर के मुताबिक़, सीपीएम की सदस्यता सूची देखें तो आप पाएंगे कि इसके समर्पित समर्थकों में से 80 प्रतिशत हिंदू समाज से आते हैं जबकि अल्पसंख्यक मूलत: गैर-कम्यूनिस्ट हैं. केरल की आबादी का 46 फ़ीसदी ईसाई और मुसलमान हैं. इससे निपटने के लिए वे अल्पसंख्यकों को रिझाने की कोशिश कर रहे हैं और बीजेपी का ध्यान हिंदू समाज की ओर है.

भाष्कर बताते हैं, "सीपीएम के सामने ये एक दुविधा की तरह है और सीपीएम इसका वो समाधान निकालने की कोशिश कर रही है जो कांग्रेस पहले भी कर चुकी है. ये कोशिश नरम हिंदुत्व की ओर जाने की है और ये नीति सिर्फ हिंदुत्व के सामने पूरी तरह हार लेकर आती है. लोगों को नरम हिंदुत्व की ओर क्यों जाना चाहिए जब कट्टर हिंदुत्व उपलब्ध है."

भाष्कर राजीव गांधी का उदाहरण देते हैं जब उन्होंने शाहबानो मामले में मुस्लिम समाज को रिझाने की कोशिश की. इसके बाद उन्होंने हिंदू समाज को रिझाने के लिए अयोध्या मंदिर का ताला खोल दिया जिसके बाद राजनीतिक ज़मीन उनके हाथ से निकल गई.

वह कहते हैं, "केरल में यही हो रहा है. टेक्टिकल लाइन पर चलने के नाम पर सीपीएम ने ईसाई और मुस्लिम समुदाय में से कुछ लोगों को नामांकित किया है जो कि अपेक्षित नहीं थे. ये एक तरह से दोहरा नुकसान था. इसकी भरपाई करने के लिए सीपीएम वो सारी चीजें कर रही है जो कि कांग्रेस ने पार्टी और समाज पर उसके प्रभाव को समझे बिना किया था."

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