मातृभाषा या अंग्रेज़ी, किसमें पढ़ना चाहिए बच्चों को?

  • 18 जुलाई 2018
छात्र

भारत में हमेशा यह बहस रही है कि स्कूलों में बच्चों को उनकी मातृभाषा में पढ़ाया जाए या सिर्फ़ अंग्रेज़ी में. अब यह बहस कर्नाटक में भी फिर से शुरू हो गई है क्योंकि कर्नाटक सरकार ने प्राथमिक विद्यालय स्तर पर पढ़ाई का माध्यम अंग्रेज़ी रखने का फ़ैसला किया है.

राज्य सरकार का यह फ़ैसला भारत में नौकरियों के बाज़ार में अंग्रेज़ी की ज़रूरत पर आधारित है जिस पर कुछ विशेषज्ञ आपत्ति भी करते हैं.

कुछ भाषा और शिक्षाविद् एक हालिया शोध का हवाला देते हुए मस्तिष्क की वृद्धि, भाषा की पढ़ाई आदि में मातृभाषा के महत्व पर बल देते हैं. उनका मानना है कि सरकार की चुनी गई भाषा में यह ज़रूरी नहीं है.

विशेषज्ञों की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है, जब माता-पिता अपनी वित्तीय स्थिति की परवाह किए बिना अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों में भेज रहे हैं. ये लोग अपने पैसे का बड़ा हिस्सा स्कूलों में लगा रहे हैं ताकि उनके बच्चे रोज़गार के बाज़ार में पहुंच बना सकें.

'स्कूलों में माध्यम को लेकर कोई नीति नहीं'

दिल्ली विश्वविद्यालय की फ़ैकल्टी ऑफ़ एजुकेशन की पूर्व डीन अनीता रामपाल बीबीसी हिन्दी से कहती हैं, "इसे अध्ययन का माध्यम कहना ग़लत है. यह समझने का माध्यम होना चाहिए जिसमें बच्चों को पढ़ाया जाना चाहिए लेकिन यहां समझने का माध्यम राजनीतिक लोकप्रियता का साधन बन गया है."

प्रोफ़ेसर अनीता रामपाल कहती हैं, "हमारे पास भाषा नीति तक नहीं है. तीन भाषा फॉर्मूला ज़रूर समय की अनिवार्यता है. यह नीति नहीं थी. यहां तक कि इसे पूरी तरह लागू नहीं किया गया था. यह केवल दक्षिणी राज्यों में लागू की गई थी."

कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के बजट भाषण के बाद शिक्षाविद् और जनता में इस बहस की शुरुआत हुई.

इससे कर्नाटक में बड़ी बहस शुरू हो चुकी है, क्योंकि देश के किसी अन्य राज्य के अलावा इस दक्षिणी राज्य में कई भाषाएं और बोलियां हैं.

कन्नड़ समर्थकों के विरोध के बावजूद कुमारस्वामी ने अंग्रेज़ी माध्यम की घोषणा कर दी है. सरकार 28,847 कन्नड़ प्राथमिक स्कूलों में से एक हज़ार में इसे लागू करेगी.

एक अधिकारी ने अपना नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बीबीसी से कहा कि मुख्यमंत्री की यह घोषणा का मक़सद सरकारी स्कूलों से निजी स्कूलों में बच्चों के जाने पर रोक लगाना है.

पिछले तीन से चार सालों में कन्नड़, उर्दू और अन्य मातृभाषा माध्यमों के प्रथामिक विद्यालयों के साढ़े तीन लाख बच्चे स्कूल छोड़ चुके हैं और इसके कारण निजी अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों के दाख़िले में बढ़ोतरी हुई है.

कन्नड़ विकास प्राधिकरण ने इसे सरकारी स्कूलों को बंद करने की कोशिश माना है. प्राधिकरण के चेयरमैन प्रोफ़ेसर एसजी सिद्दारमैया ने बीबीसी से कहा, "हमने अंग्रेज़ी को एक भाषा के तौर पर पढ़ाने का विरोध नहीं किया है लेकिन हम इसे अध्ययन का माध्यम नहीं चाहते."

'बड़े विद्वानों ने कन्नड़ में पढ़कर नाम कमाया'

प्रोफ़ेसर सिद्दारमैया का दृष्टिकोण केंद्रीय साहित्य अकादमी के कार्यकारी समिति के पूर्व सदस्य नराहल्ली बालासुब्रमण्य के उदाहरण से स्पष्ट होता है.

वह कहते हैं, "अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ाई करने से रचनात्मक प्रतिभा नहीं आती है. इंजीनियर डॉक्टर एम विश्वेश्वरैया, अंतरिक्ष विज्ञानी डॉक्टर यूआर राव और प्रतिष्ठित वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर सीएनआर राव ने 10वीं कक्षा तक कन्नड़ माध्यम से पढ़ाई की. अभी तक वे पूरी दुनिया में जाने जाते हैं."

प्रोफ़ेसर अनीता रामपाल कहती हैं, "अगर पढ़ाई-लिखाई उस भाषा में की जाए जो समझ में आती है तो कोई बच्चा दूसरी भाषा अधिक आसानी से सीखता है. हमारे देश में भाषा के शिक्षणशास्त्र जैसी चीज़ नहीं है. हम मातृभाषा में शिक्षा के महत्व को समझ नहीं पा रहे हैं जो बच्चों को दूसरी और तीसरी भाषा को सीखने में मदद करता है."

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ एजुकेशन में एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. गिरिधर राव इससे अलग विचार रखते हुए कहते हैं कि तेलंगाना में बोली जाने वाली तेलुगू और आंध्र प्रदेश में बोली जाने वाली तेलुगू में अंतर होता है.

वह कहते हैं, "जैसे घर पर कोई बच्चा 'पानी' कहता है लेकिन उसे कक्षा में 'जल' कहना पड़ेगा तो यह ज़रूरी है कि उसे वह भाषा सिखाई जाए, जो वह समझ सके."

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सरकारी स्कूल में निचले तबकों के बच्चे

कर्नाटक के शिक्षा विभाग के एक अधिकारी का कहना है, "दो साल पहले हुआ एक शोध बताता है कि सरकारी कन्नड़ माध्यम स्कूलों में 35 फ़ीसदी छात्र दलित समुदाय से आते हैं जबकि 60 फ़ीसदी पिछड़े और दूसरे बच्चे ग़रीब तबके से आते हैं."

हालांकि, इस बहस में अंग्रेज़ी माध्यम का समर्थन करने वाले लोग भी हैं.

मणिपाल ग्लोबल एजुकेशन के चेयरमैन मोहनदास पाई कहते हैं, "सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकतर बच्चे समाज के ग़रीब तबके से आते जिनको अच्छे अवसर नहीं मिल पाते क्योंकि उन्होंने अंग्रेज़ी पढ़ी नहीं होती. परिजन उन्हें अंग्रेज़ी सिखाने वाले ख़राब गुणवत्ता के स्कूलों में डालते हैं. वे पैसा ख़र्च करते हैं लेकिन उससे कुछ हासिल नहीं होता. सरकार अंग्रेज़ी माध्यम वाले स्कूल शुरू करने जा रही है तो इससे उस तबके को लाभ होगा."

पाई ग़लत नहीं हैं. 28 साल के हरीश के मामले को लिया जाए तो कुछ ऐसा ही लगता है. उनकी साढ़े पांच साल की बेटी बेंगलुरु में कन्नड़ माध्यम वाले सरकारी प्राथमिक विद्यालय मे पढ़ती है.

हरीश कहते हैं, "जब हम इंटरव्यू देने जाते हैं तो हमसे कन्नड़ में नहीं बल्कि अंग्रेज़ी में सवाल पूछे जाते हैं. तो मेरी तरह के लोगों को नौकरी नहीं मिलती है और वह कुरियर कंपनी के डिलिवरी बॉय बन जाते हैं. न ही मैं और न ही मेरा परिवार निजी स्कूलों में 40 से 50 हज़ार रुपए डोनेशन के रूप में दे सकते हैं. जबकि सरकारी स्कूलों में हमें फ़ीस भी देने की ज़रूरत नहीं होती है."

हरीश ख़ुश हैं कि कर्नाटक सरकार ने सरकारी स्कूलों में अंग्रेज़ी माध्यम शुरू करने का फ़ैसला लिया है. वह कहते हैं कि यह सुविधा उन्हें नहीं मिली थी.

लेकिन क्या उनकी बेटी निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों से बेहतर पढ़ाई कर पाएगी, यह अभी बड़ा सवाल है.

डॉ. राव अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन के एक शोध का ज़िक्र करते हुए बताते हैं कि पांच साल तक (2008-13) आंध्र प्रदेश में फ़ाउंडेशन ने निजी स्कूलों में पढ़ने को तैयार बच्चों की फ़ीस भरी. उनकी पढ़ाई की तुलना सरकारी स्कूलों के बच्चों की पढ़ाई से की गई, जिसमें पाया गया कि दोनों कक्षाओं के तेलुगू, गणित, पर्यावरण विज्ञान और अंग्रेज़ी के प्रदर्शन में कोई अंतर नहीं था.

प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई का माध्यम हिंदी हो, अंग्रेज़ी हो या मातृभाषा हो इसके पक्ष और विपक्ष में काफ़ी तर्क दिए जाते रहे हैं लेकिन इस क्षेत्र में बदलाव की बहुत आवश्यकता है. उसी तरह जैसे 1991 में देश की अर्थव्यवस्था में बदलाव लाए गए थे.

सवाल यह है कि शिक्षा के क्षेत्र में डॉ. मनमोहन सिंह कौन होगा और कौन ये सुधार लाएगा या फिर जैसा प्रोफ़ेसर अनीता रामपाल ने कहा था कि शिक्षा राजनीतिक तौर पर लोगों को लुभाने का विषय बना रहेगा.

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