क्या शरिया अदालत पर झूठ फैलाया जा रहा है

  • 17 जुलाई 2018
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'ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भारत के सभी ज़िलों में शरिया अदालत क़ायम करेगी.' पिछले हफ़्ते भारतीय मीडिया में ये ख़बर छाई रही. घंटों तक चैनलों पर ये बहस हुई कि क्या मुसलमानों को भारत की अदालत पर विश्वास नहीं है कि वो अलग से शरिया अदालत बनाना चाहते हैं.

कुछ ख़बरों में यहां तक कहा गया कि मुसलमान इस तरह की मांग करके देश का विभाजन करना चाहते हैं. ऐसे में ये जानना बहुत ज़रूरी है कि शरिया अदालत के नाम पर इस समय भारत में की जा रही बहस दरअसल है क्या.

सबसे पहला सवाल ये है कि इसकी शुरुआत कैसे हुई

आठ जुलाई के दैनिक जागरण अख़बार में पहले पन्ने पर एक ख़बर छपी जिसका शीर्षक था, ''हर ज़िले में खुलेगी शरिया अदालत.''

इस रिपोर्ट में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की दारुल-क़ज़ा कमेटी के आयोजक क़ाज़ी तबरेज़ आलम का हवाला दिया गया है.

विवाद तब शुरू हुआ जब क़ाज़ी तबरेज़ आलम दारुल-क़ज़ा के कामकाज की समीक्षा करने के लिए रामपुर गए थे. दारुल-क़ज़ा सुन्नी मुसलमानों की वो संस्था है, जो मुसलमानों के पारिवारिक मामलों को आपसी रज़ामंदी से सुलह कराने की कोशिश करती है.

बीबीसी से बातचीत में क़ाज़ी तबरेज़ आलम ने कहा, ''रामपुर में कुछ स्थानीय लोग भी मौजूद थे और साथ ही दो-तीन पत्रकार भी थे. दैनिक जागरण के पत्रकार ने मुझसे पूछा कि यूपी में सिर्फ़ 17 दारुल-क़ज़ा क्यों हैं और क्या ये सभी जगह नहीं खुलना चाहिए? इस पर मेरा जवाब था कि अगर लोग चाहेंगे तो ज़रूर खुल सकता है.''

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उनके अनुसार इसी बात को दैनिक जागरण ने इस तरह से पेश किया जिसके बाद दिल्ली की मीडिया ने इसे उठा लिया और फिर हर जगह इस पर बहस छिड़ गई.

क़ाज़ी तबरेज़ के मुताबिक़ बोर्ड ने ये कभी नहीं कहा कि वो हर ज़िले में दारुल-क़ज़ा क़ायम करेगी और न ही 15 जुलाई को होने वाली बैठक में इस पर कोई ख़ास फ़ैसला लेना था. उनकी इस बात की पुष्टि बोर्ड की 15 जुलाई की दिल्ली में हुई बैठक में लिए गए फ़ैसले से होती है.

बैठक के बाद बीबीसी से बातचीत करते हुए बोर्ड के सचिव ज़फ़रयाब जिलानी ने कहा, ''जिस तरह बोर्ड की अलग-अलग कमेटियां अपने काम-काज का लेखा जोखा पेश करती हैं उसी तरह दारुल-क़ज़ा कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट रखी. बोर्ड के सामने दस जगहों से दारुल-क़ज़ा खोलने की पेशकश हुई है और बोर्ड ने पांच जगहों पर दारुल-क़ज़ा खोलने का फ़ैसला किया है. हर ज़िले में दारुल-क़ज़ा खोलने की कोई बात न पहले थी और न ही बैठक में इस तरह की कोई बात हुई.''

बोर्ड ने जिस शरिया अदालत की बात की है, क्या वो वाक़ई में पैरलल कोर्ट या समानांतर अदालत है

बोर्ड ने कभी भी इसे शरिया अदालत नहीं कहा है. बोर्ड इसे दारुल-क़ज़ा कहता है. बोर्ड के कई लोग ख़ुद कह चुके हैं कि इसे शरिया अदालत कहना बिल्कुल सही नहीं है क्योंकि ये अदालत है ही नहीं.

15 जुलाई को दिल्ली में बोर्ड की बैठक के बाद जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि दारुल-क़ज़ा पैरलेल कोर्ट नहीं हैं. ये मध्यस्थता या आर्बिट्रेशन और मशविरा देने वाले केंद्र हैं.

दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष और जाने माने इस्लामिक स्कॉलर डॉक्टर ज़फ़रुल इस्लाम ख़ान के अनुसार इसे शरिया पंचायत कहना ज़्यादा सही है, क्योंकि ये सिर्फ़ सलाह-मशविरा देने वाली एक संस्था है जो इस्लामी क़ानून की रोशनी में किसी विवाद पर दोनों पक्षों को सलाह देती है.

उनके अनुसार, ''कुछ मौलवी हज़रात समझते नहीं हैं, बेवक़ूफ़ी में उन्होंने शरिया कोर्ट कह दिया जबकि हक़ीक़त में ये सिर्फ़ दो पक्षों के बीच सुलह कराने की कमेटी है.''

हैदराबाद स्थित नैलसर लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा के मुताबिक़ शरिया लफ़्ज़ आते ही हमें लगता है कि ये कोई बहुत ही रुढ़िवादी और दकियानूसी चीज़ होगी, जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है.

प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने अपने लीगल अवेयरनेस वेब सिरीज़ में इस बार इस मुद्दे पर विस्तार से बातचीत की है. उनके अनुसार सात जुलाई 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने विष्णु लोचन मदन केस में ये बिल्कुल स्पष्ट कर दिया था कि दारुल क़ज़ा अदालत नहीं हैं और भारतीय न्याय प्रणाली इसे नहीं मानता है.

दारुल क़ज़ा दरअसल क्या है और वो कैसे काम करता है

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प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा के मुताबिक़ ये लोगों के बीच समझौता कराता है, अगर कोई इनकी बात नहीं मानता है तो वो अदालत जा सकता है.

इनमें सिर्फ़ सिविल मामले यानी शादी-ब्याह, तलाक़, संपत्ति से जुड़े पारिवारिक मामले लाए जाते हैं. फ़ौजदारी यानी आपराधिक मामले इन केंद्रों में नहीं लाए जा सकते हैं.

भारतीय दंड संहिता हर भारतीय पर अनिवार्य रूप से लागू होती है. इससे किसी को कोई छूट नहीं हैं. हत्या, रेप, चोरी या किसी भी आपराधिक मामले में पार्टी अदालत जाना चाहे या नहीं, सरकार ख़ुद उस मामले को अदालत ले जाएगी, उसमें व्यक्ति की इच्छा कोई मायने नहीं रखती.

कोई भी मामला आने से पहले दोनों पक्षों से पहले पूछा जाता है कि आप दारुल-क़ज़ा के फ़ैसले को मानेंगे या नहीं. अगर किसी भी पक्ष ने ये कह दिया कि वो दारुल-क़ज़ा को नहीं मानते तो उस मामले पर दारुल क़ज़ा कोई कार्रवाई नहीं कर सकता.

लेकिन अगर दोनों पक्ष अपने विवाद को दारुल क़ज़ा लाते हैं और बाद में कोई एक पक्ष ये समझता है कि उसके साथ न्याय नहीं हुआ है तो वो इसको ख़ारिज कर अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकता है.

दारुल-क़ज़ा खोलने की बात कोई नई चीज़ है या भारत में ये पहले से काम कर रही है

मीडिया में इस ख़बर को इस तरह से पेश किया गया कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भारत में इस्लामिक क़ानून लागू करना चाहती है और इसीलिए वो पूरे भारत में शरिया कोर्ट स्थापित करना चाहती है.

लेकिन सच्चाई ये है कि दारुल-क़ज़ा या शरिया पंचायत का इतिहास बहुत पुराना है. पटना के फुलवारी शरीफ़ में स्थित इमारत-ए-शरिया के अंतर्गत 1920 से इस तरह की 'अदालतें' चल रही हैं.

बिहार, झारखंड और ओडिशा के लाखों लोग इमारत-ए-शरिया आकर अपने पारिवारिक मसले को सुलझाते हैं. इसके अलावा बिहार में इदारा-ए-शरिया भी इस तरह के केंद्र चलाता है. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी 1993 से दारुल-क़ज़ा चला रहा है. इस व़क़्त पूरे भारत में बोर्ड की तरफ़ से लगभग 70 दारुल क़ज़ा चलाए जा रहे हैं.

दारुल क़ज़ा क्या महिला विरोधी है

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आईआईटी कानपुर में समाजशास्त्र पढ़ाने वाली प्रोफ़ेसर अनंदिता चक्रवर्ती ने लखनऊ और कानपुर में दारुल-क़ज़ा के काम-काज का अध्ययन किया है. अपनी रिसर्च में उन्होंने पाया कि दारुल-क़ज़ा में जाने वाले लोगों में 95 फ़ीसदी महिलाएं हैं.

ज़ाहिर है इतनी बड़ी संख्या में लोगों को ज़बरदस्ती नहीं भेजा जा सकता है और अगर उन्हें लगता है कि उन्हें यहां से इंसाफ़ नहीं मिला है तो वो सिविल कोर्ट चली जाती हैं. इसका मतलब साफ़ है कि मुस्लिम औरतों को दारुल-क़ज़ा में ज़बरदस्ती नहीं भेजा जाता है.

शिकागो यूनिवर्सिटी में एंथ्रोपोलॉजी पढ़ाने वाली प्रोफ़ेसर सिल्विया वाटुक ने हैदराबाद और चेन्नई में मुस्लिम परिवार के सिविल मुद्दों का एक दशक तक अध्ययन किया है.

अपने रिसर्च पर लिखी किताब 'मैरेज एंड इट्स डिसकॉन्टेंट' में पाया है कि ज़्यादातर ग़रीब मुस्लिम औरतें दारुल-क़ज़ा जाती हैं. उनमें से ज़्यादातर औरतें ख़ुला (जब मुस्लिम महिला अपने पति से अलग होना चाहती है तो उस प्रक्रिया को ख़ुला कहते हैं) लेने जाती हैं, या अपनी शादी को ख़त्म कराने (फ़स्क) जाती हैं क्योंकि भारतीय अदालतों से तलाक़ लेने में वर्षों लग जाते हैं.

उसी रिसर्च में ये भी पाया गया है कि जो मर्द दारुल-क़ज़ा जाते हैं उनमें से ज़्यादातर मामले 'रिस्टिट्यूशन ऑफ़ कंज्यूगल राइट्स' के थे. यानी वो मर्द अपनी बीवी से अलग नहीं होना चाहते थे, बल्कि वो अपने वैवाहिक जीवन को बचाने के लिए जाते थे.

उसी तरह बिहार के इमारत-ए-शरिया के तहत चल रहे 'शरिया अदालत' पर अध्ययन करने वालों ने पाया है कि वो अब तक 50,000 पारिवारिक मामले सुलझा चुका है और बहुत ही कम मामले में लोगों ने उसके ख़िलाफ़ अदालत का दरवाज़ा खटखटाया है. इसके अलावा एक साल से कम समय में इसके फ़ैसले हो जाते हैं.

ये भी सच है कि महिलाएं भी दारुल-क़ज़ा चलाती हैं. तीन तलाक़ की प्रथा को ख़त्म कराने के लिए अभियान चलाने वाली और भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता ज़किया सोमन भी इस तरह की संस्था चलाती हैं. लेकिन इसके बावजूद दारुल-क़ज़ा संस्था पूरी तरह से पुरुष प्रधान है.

दिल्ली स्थित सामाजिक कार्यकर्ता शीबा असलम फ़हमी दारुल-क़ज़ा का समर्थन करती हैं, लेकिन इसे और महिला फ़्रेंडली बनाने के लिए वो हर दारुल-क़ज़ा में कम से कम दो महिला को शामिल किए जाने की मांग करती हैं. प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा भी ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से मांग करते हैं कि हर दारुल-क़ज़ा में कम से कम एक महिला का होना अनिवार्य कर देना चाहिए.

दारुल-क़ज़ा की स्थापना क्या न्यायसंगत और तर्कसंगत है

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प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा के मुताबिक़ दारुल-क़ज़ा दरअसल ऑल्टरनेटिव डिस्प्यूट रेज़्योलूशन यानी वैकल्पिक विवाद समाधान का ही एक हिस्सा है.

वो इसे 'प्राइवेटाइज़ेशन ऑफ़ जस्टिस' यानी न्याय के निजीकरण के रूप में देखते हैं. उनके अनुसार भारत में सिविल प्रोसीजर कोड (सीपीसी) अपने सेक्शन 89 में आर्बिट्रेशन और मेडिएशन की बात करता है.

भारत में इस समय चार करोड़ केस लंबित हैं और अगर कोई नया केस न आए तब भी इसे हल करने में 366 साल लगेंगे.

प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा के अनुसार भारत में इस समय कुल 15 हज़ार जज हैं और हर एक लाख भारतीय पर केवल एक जज है. वो कहते हैं कि अगर भारतीय न्याय व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लाना है तो एक लाख पर कम से कम 10 जज होने चाहिएं यानी भारत में अभी एक लाख तीस हज़ार जजों की ज़रूरत है.

लेकिन ये मामला सिर्फ़ भारत का नहीं है. इस समय पूरी दुनिया में निजी कोर्ट या आर्बिट्रेशन का चलन बढ़ रहा है.

प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा के अनुसार अमरीका की 1000 बड़ी कंपनियों के सर्वे में पाया गया कि 80 फ़ीसदी मामले में कंपनियों ने आर्बिट्रेशन के ज़रिए अपने केस को हल करवाया, वो अमरीकी अदालत में नहीं गईं.

दारुल-क़ज़ा के समर्थन में इंग्लैंड का हवाला देते हुए प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं कि इंग्लैंड में अब क़ानून बना दिया गया है कि पारिवारिक मामले पारंपरिक अदालत में नहीं जाएंगे बल्कि मिडिएशन में जाएंगे. इंग्लैंड में आज की तारीख़ में छह 'शरिया कोर्ट' काम कर रहे हैं.

उनके अनुसार ईसाइयों में भी आपसी विवाद को सुलझाने के लिए पादरियों की मदद लेने का चलन है. उसी तरह दारुल-क़ज़ा मुसलमानों के पारिवारिक मामले सुलझाने का एक ज़रिया है.

तो फिर इतना विवाद क्यों

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प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा के अनुसार इस पूरे मामले में टीवी एंकरों का रोल बहुत ख़राब रहा है, लेकिन उनके लिए उत्प्रेरक का काम किया ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने. उन्होंने बोर्ड से अपील की है कि भारत में इस समय जिस तरह का माहौल है उनमें इस तरह की कोई बात नहीं करनी चाहिए.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर मोहम्मद सज्जाद के मुताबिक़, ''हर ज़िले में 'शरिया कोर्ट' बनाने के बारे में कुछ ख़ास तरह के टीवी चैनलों पर सबसे पहले और पूरे ज़ोर-शोर से दिखाया गया जिन चैनलों को वर्तमान सरकार का क़रीबी माना जाता है.

उनके अनुसार एक ऐसे समय पर इस तरह के एजेंडे को आगे बढ़ाना, जब लोकसभा चुनाव महज़ कुछ महीने दूर हो, इससे झलक मिलती है कि बोर्ड के सदस्य भाजपा के साथ मिलकर कुछ खेल रचने की कोशिश कर रहे हैं. इसलिए ऐसे मुद्दों को प्राथमिकता दी जा रही है जिससे भाजपा को फ़ायदा मिल सके और समाज में साप्रंदायिक ध्रुवीकरण संभव हो.

हालांकि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव ज़फ़रयाब जिलानी इन आरोपों को पूरी तरह ख़ारिज करते हैं.

बीबीसी से बातचीत के दौरान जिलानी ने कहा कि प्रोफ़ेसर फ़ैजान मुस्तफ़ा क़ानून के एक माहिर ज़रूर हैं, लेकिन उन्हें मुस्लिम राजनीति की ज़मीनी हालत की जानकारी नहीं है. उनका कहना था, ''ये हमारी रूटीन मीटिंग का एजेंडा है जो कि हर तीन महीने पर होती है. हम अपने तमाम कामों को ठप नहीं कर देंगें इस डर में कि मीडिया हमको मिसकोट कर देगा.''

चुनाव के क़रीब इस तरह के एजेंडे को आगे बढ़ाने के आरोप को ख़ारिज करते हुए ज़फ़रयाब जिलानी ने कहा कि ''जिस चीज़ को पिछले 10-12 साल में हर मीटिंग में हम लाते रहे हैं और कोई इश्यू नहीं बना वो आज क्यों बन गया. हम अपनी ज़िदंगी को पूरी तरह से मफ़लूज (लकवा ग्रस्त) नहीं कर देंगे, सिर्फ़ इस डर से कि 2019 का चुनाव आ रहा है.''

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