बरेली की निदा को इस्लाम से निकाला क्यों गया?

  • 17 जुलाई 2018
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"अगर तुम तौबा कर लेती हो तो ठीक वरना तमाम मुसलमानों को ये हुक़्म है कि वो तुम्हारा बायकॉट कर दें. तुम्हारे साथ खाना-पीना बंद कर दें. तुम बीमार पड़ो तो कोई तुम्हे देखने न जाए, तुम मर जाओ तो तुम्हारे जनाज़े में शरीक़ न हों और न कोई नमाज़ ए जनाज़ा पढ़ें और न ही क़ब्रिस्तान में दफ़्न होने दें."

इस सज़ा का ज़िक्र भारत के किसी क़ानून में नहीं है और न ही ये किसी कबायली-आदिवासी इलाके का क़ानून है. बरेली में जामा मस्जिद के इमाम अल-मुस्तफ़ी मोहम्मद ख़ुर्शीद आलम रज़वी ने निदा ख़ान के ख़िलाफ़ ये फ़तवा जारी किया है.

क़ुरान और शरियत कानून को नज़रअंदाज़ करने के लिए निदा ख़ान के ख़िलाफ़ ये फ़तवा जारी किया गया है. निदा खुद तीन तलाक़ पीड़िता हैं और अब इससे चलन के चलते मुश्किलों में जीवन यापन करने वाली महिलाओं के लिए काम करती हैं.

14 जुलाई को यही बात बयान के तौर पर कही गई और 16 जुलाई को इसे फ़तवे के रूप में जारी कर दिया गया. निदा की मानें तो ये फ़तवा सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्हें कमज़ोर करने के लिए जारी किया गया है.

इस्लाम से बेदख़ल करने का हक़ कैसे मिला?

मोहम्मद ख़ुर्शीद आलम इस फ़तवे को शरियत क़ानून के लिहाज से बिल्कुल जायज़ ठहराते हैं.

वो कहते हैं, "ये फ़तवा कुरान-ए-हदीस के क़ानून को न मानने वाले के लिए शरियत की रौशनी में जो हुक्म है, उसे देखते हुए सुनाया गया है. "

उनके अनुसार, शरियत के क़ानून की जिस तरह मुख़ालफ़त हो रही है, उसे बदलने की बात की जा रही है उसे देखते हुए ये फ़तवा जारी किया गया है.

निदा के मामले पर बोलते हुए वो कहते हैं, "जब तक वो अपने बयानों और कही गई बातों से तौबा नहीं कर लेती हैं, उन्हें इस्लाम से ख़ारिज कर दिया गया है. और अगर वो तौबा कर लेती हैं तो जिस तरह कल वो हमारी इस्लामी बहन थीं, दोबारा इस्लामी बहन बन जाएंगी."

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खुर्शीद मानते हैं कि इस तरह का फ़ैसला सुनाना किसी मौलाना या इमाम के हक़ की बात नहीं है लेकिन ये उनकी ज़िम्मेदारी है कि वो शरियत के क़ानून का पालन करवाएं. जो भी कुरान-ए-हदीस के ख़िलाफ़ जाएगा वो इस्लाम से ख़ारिज हो जाएगा.

"जो भी शरियत के क़ानून को नहीं मानेगा, ग़लत बयानबाज़ी करेगा वो इस्लाम से ख़ारिज हो जाता है और मौलवी-इमाम सिर्फ़ इस क़ानून को मनवाने का काम करते हैं. ये किसी इंसान का कहा क़ानून नहीं है ये कुरान में है. इसे कोई नहीं बदल सकता."

लेकिन निदा के ख़िलाफ़ ये मामला क्यों?

फ़तवा सोमवार को जारी हुआ लेकिन ये लड़ाई लंबे समय से चल रही थी. निदा बताती है कि ये सारा किस्सा उनकी शादी के बाद से ही शुरू हो गया.

"मेरी शादी 18 फरवरी 2015 में आला हज़रत के ख़ानदान में हुई थी. पांच महीने बाद मेरे साथ मारपीट शुरू हो गई. इसके बाद मैंने मई 2016 में बारादरी पुलिस स्टेशन जाकर ससुरालवालों के ख़िलाफ़ केस दर्ज कराने की कोशिश की लेकिन मेरा मामला तक दर्ज़ नहीं किया गया."

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निदा कहती हैं कि क्योंकि उनका ससुराल पक्ष काफ़ी मज़बूत है और धार्मिक कार्यों में आगे रहता है इसलिए उन्हें शिकायत दर्ज कराने के लिए भी एड़ियां घिसनी पड़ी.

"बारादरी में मामला नहीं लिखा गया तो मैं बड़े अधिकारियों के पास गई. वहां मेरी बात तो सुनी गई लेकिन मामला वहां भी नहीं लिखा गया. इसके बाद मैंने कोर्ट का रुख किया और इन लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज कराया. वहां से एफ़आईआर का ऑर्डर हुआ. लेकिन पुलिस ने सिर्फ़ 13 दिन में फ़ाइनल रिपोर्ट जमा कर दी."

"जिसके बाद मैंने प्रोटेस्ट डाला और कोर्ट ने माना कि रिपोर्ट बनावटी है, क्योंकि उसमें कहीं भी मेरा बयान नहीं था. जिस वक़्त मामला कोर्ट में था मेरे शौहर ने मुझे तीन तलाक़ दे दिया और झूठा तलाक़नामा लेकर आए. लेकिन कोर्ट ने उसे माना नहीं."

लेकिन कोर्ट ने इस मामले में दोबारा से जांच के आदेश दे दिए. निदा कहती हैं कि उन्हें कोर्ट परिसर में ही एसिड अटैक की धमकी दी गई. मेरे पापा और भाई को जान से मारने की धमकी दी गई.

इसी मामले में क़रीब 15 महीने बाद कोर्ट का फ़ैसला आया है. 25 जून 2018 को कोर्ट का फ़ैसला आया और चार्जशीट दाख़िल की गई है, जो निदा के पक्ष में है.

निदा के पति पर जबरन गर्भपात कराने का मामला दर्ज़ है. इसके तहत अधिकतम आजीवन कारावास का प्रावधान है. वहीं निदा के सास-ससुर पर दहेज उत्पीड़न का चार्ज है.

निदा कहती हैं कि ये फ़तवा कहीं न कहीं इसी का परिणाम है. निदा के आरोपों को खारिज करते हुए उनके ससुर अंजुम मियां ने बीबीसी से कहा, "मामला अदालत में है, फ़ैसला आने तक हम इस पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे."

अंजुम मियां कहते हैं कि जो फ़तवा जारी हुआ है उसका परिवार पर लगाए गए आरोपों से कोई संबंध नहीं हैं.

"मेरे पति को नोटिस जारी हो गया है और इसीलिए मुझे फ़तवा जारी करके परेशान किया जा रहा है. लेकिन ये पहला मौक़ा नहीं है जब उन्होंने शरियत के क़ानून को अपने लिए इस्तेमाल किया है. 2016 में जब मैं कोर्ट पहुंची तो मेरे पति ने मुझे तीन तलाक़ दे दिया और कहा कि ये मेरी पत्नी है ही नहीं."

निदा साल 2016 से ही अपने मायके में रह रही हैं और पिछले दो साल से पति से कोई सम्पर्क नहीं है.

निदा के अनुसार, फ़तवा जारी करने वाले उनके शौहर के चाचा हैं और अब जब क़ानून उनके साथ खड़ा हो गया है तो धर्म को आधार बना कर उन्हें परेशान किया जा रहा है.

लेकिन इमाम खुर्शीद आलम निदा के आरोपों से इंकार करते हैं.

"निदा का मामला लंबे समय से चल रहा है. उन्होंने एफ़आईआर दर्ज़ कराई, कोर्ट गईं लेकिन हमनें कभी कुछ नहीं कहा क्योंकि ये उनका अपना मसला था लेकिन जब वो शरियत के क़ानून के ख़िलाफ़ बोलीं तो हमें अपनी भी ज़िम्मेदारी तो निभानी है. हमें भी तो अल्लाह-ताला को अपना मुंह दिखाना है."

खुर्शीद कहते हैं कि लोग तलाक़ और हलाला को समझते ही नहीं हैं. ये शरीयत का क़ानून है और इसका हर हाल में पालन होना चाहिए.

पर क्या ये इंसानियत है कि किसी मर रहे शख़्स को दो गज़ ज़मीन भी न दें?

खुर्शीद आलम कहते हैं कि इंसानियत अलग मुद्दा है लेकिन शरियत के क़ानून का क्या? हर कोई तरह-तरह की बात कर रहा है लेकिन क्या ये हम पर ज़ुल्म नहीं है कि हमारे पाक़ क़ानून को बदलने की कोशिश की जा रही है.

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"क्या ये ज़ुल्म नहीं है कि मुसलमान होते हुए भी आप शरियत के क़ानून को न मानें. मुसलमान होकर जो कुरान के नियमों को न मानें, वो कैसा मुसलमान?"

अगर तीन तलाक़ पर क़ानून बन गया तो?

इस पर खुर्शीद आलम कहते हैं कि कुरान का क़ानून किसी इंसान ने नहीं लिखा है. उस अल्लाह ने लिखा है और हम इसमें कोई तब्दीली नहीं चाहते.

"हिंदुस्तान में सैकड़ों क़ानून हैं. न तो हमें किसी क़ानून से इक़रार है औऱ न इनकार है. कानून बनते रहते हैं लेकिन हम किसी सूरत में शरीयत को नहीं छोड़ सकते. रही बात भारतीय संविधान की तो जब क़ानून बन जाएगा तो हम देखेंगे."

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