जब लहरों ने लील लिया था भारत के उस 'टाइटैनिक' को

  • 19 जुलाई 2018
टाइटैनिक, जहाज, समुद्री यात्रा, समु्द्री हादसे इमेज कॉपीरइट Getty Images

टाइटैनिक जहाज़ के बारे में तो कई लोग जानते हैं, लेकिन भारत में भी टाइटैनिक जैसा ही एक हादसा हुआ था जिसमें 690 लोग समुद्र की गोद में समा गए थे. इस जहाज़ से जुड़ी कई बातें हादसे के 71 साल बाद फिर सामने आई हैं.

मुझे याद है कि रामदास जहाज़ और उससे जुड़े हादसे के बारे में मुझे सबसे पहले मेरे पिता ने बताया था. मेरे पिता एक मिल में काम करते थे. हमारी आर्थिक स्थिति सामान्य थी. हमारे पास एक रेडियो था, लेकिन टेलीविज़न होना एक बड़ी बात थी.

लेकिन, मेरे पिता कहानियां बहुत अच्छी तरह सुनाया करते थे. हर रात वो मुझे एक नई कहानी सुनाते थे.

इसी तरह एक रात को उन्होंने मुझे रामदास जहाज़ और उस हादसे के बारे में बताया.

इस जहाज से जुड़े हादसे पर फ़िल्म बनाने का ख़्याल मुझे साल 2006 में आया था. तब मैंने रामदास जहाज़ के बारे में जानकारी जुटानी शुरू कर दी.

दस सालों के दौरान मैं उस हादसे में बचे कई लोगों से मिला, कई अख़बार पढ़े और अपनी रिसर्च की. इस काम में वैज्ञानिक खाजगीवाले ने मेरी काफ़ी मदद की.

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Image caption बारकू शेठ मुकादम

जो जान बचाकर निकले

इस सफ़र की शुरुआत अलीबाग में बारकू शेठ मुकादम (हादसे में बचने वाले) से मिलने के साथ हुई और इसका अंत दक्षिण अफ़्रीका में ​अब्दुल कैस से मिलकर हुआ. अब्दुल भी उस हादसे से बचकर निकले थे.

रामदास जहाज़ स्वान और हंटर कंपनी ने बनाया था. ये वही कंपनी थी जिसने क्वीन एलिज़ाबेथ का जहाज़ बनाया था.

रामदास 179 फ़ीट लंबा और 29 फ़ीट चौड़ा था. इसमें 1000 यात्रियों को ले जाने की क्षमता थी. इसे वर्ष 1936 में बनाया गया था. कुछ सालों बाद इसे इंडियन कोऑपरेटिव स्टीम नेविगेशन कंपनी ने ख़रीद लिया था.

उन दिनों भारत में स्वतंत्रता संग्राम अपने उफ़ान पर था. समान विचार वाले कई राष्ट्रवादी एकजुट हुए और उन्होंने इस कॉपरेटिव नेविगेशन कंपनी की स्थापना की. यह कंपनी कोंकण तट पर 'सुखकर बोट सेवा' के तौर पर शुरू हुई.

इसकी स्थापना ब्रिटिश कंपनियों को सीधे तौर पर चुनौती देना था. लोग इसे 'माझी आगबोट कंपनी' कहकर पुकारते थे. इसके प्रति लोगों के लगाव को देखते हुए कंपनी ने अपने जहाज़ों के नाम साधु-संतों और भगवानों के नाम पर रखे.

जैसे कुछ जहाज़ों के नाम जयंती, तुकाराम, रामदास, संत एंथनी, संत फ़्रांसिस, संत ज़ेवियर्स आदि रखे गए थे.

रामदास ​जहाज़ पर शोध करने के दौरान मुझे ये भी पता ​चला कि उसी रास्ते पर दो और जहाज़ दुर्घटनाग्रस्त हुए थे. बहुत कम लोग इन दो दुर्घटनाओं के बारे में जानते हैं.

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Image caption रामदास के डूबने की ख़बर अख़बारों में प्रकाशित हुई.

डूबने वाले दो और जहाज़

रामदास से पहले 11 नवंबर 1927 को एस.एस. जयंती और एस.एस. तुकाराम उसी रास्ते पर, उसी दिन और लगभग उसी समय पर डूब गए थे.

जयंती जहाज़ में खलासी और यात्री सहित 96 लोगों की मौत हो गई थी और तुकाराम जहाज़ से 146 में से 96 लोग किसी तरह जान बचाकर किनारे पर पहुंच पाए थे.

लगभग 20 साल बाद, उसी रास्ते पर एस.एस. रामदास जहाज़ भी डूब गया था. इसमें 48 खलासी, चार अधिकारी, 18 होटल स्टाफ़ और 673 वैध यात्री थे. यह भी कहा जाता है कि जहाज़ पर 35 बिना टिकट वाले यात्री भी मौजूद थे. इसके हिसाब से जहाज़ में 778 लोग सवार थे.

एस.एस. रामदास की यात्रा मुंबई के लोकप्रिय भाउ चा धाक्का से रेवास के लिए 17 जुलाई 1947 को सुबह 8 बजे शुरू हुई थी. वह गटारी अमावस्या का दिन था और लोग छुट्टी पर थे.

कई लोग अलीबाग से रेवास जा रहे थे. वारकारी मंडली पंढरपुर से लौट रही थे. मछुआरे और छोटे व्यापारी भी जहाज़ में थे. ऊपरी डेक पर कुछ अंग्रेज़ी अधिकारी अपने परिवारों के साथ यात्रा कर रहे थे.

बरकू शेठ मुकादम जो इस वक्त 90 साल के हैं वो भी जहाज़ पर थे. उस वक़्त उनकी उम्र 10 साल के क़रीब थी.

वहीं, अब्दुल कैस उस वक्त 12 साल के थे. हालांकि, 89 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई. जहाज़ में कुछ गर्भवती महिलाएं भी थीं.

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Image caption हादसे में बचने वाले अब्दुल कैस

जब शुरू हुआ सफ़र

एक बार यात्रियों के जहाज़ में चढ़ने के बाद वॉर्फ़ सुपरिंटेंडेंट ने सीटी बजाई और जहाज़ तेज़ी से आवाज़ करता हुआ चल पड़ा. इससे पहले की कुली जहाज़ में चढ़ने वाली सीढ़ियां हटाते कुछ और यात्री किसी तरह जहाज़ में चढ़ गए.

उस वक्त को याद करते हुए बारकू शेठ बताते हैं, ''अब ऐसा लगता है कि जैसे उन लोगों की मौत उन्हें बुला रही थी.''

तब मुंबई में भारी बारिश हो रही थी. यात्रियों को बारिश से बचाने के लिए जहाज़ में तिरपाल से कवर किया गया था. वो बस आधे घंटे की यात्रा थी.

कई लोग एक-दूसरे को जानते थे क्योंकि वो अक्सर यात्रा करते रहते थे. समुद्र में जहाज़ हिचकोले खा रहा था, लेकिन लोगों को इसकी आदत थी क्योंकि पानी में उतरते वक्त जहाज़ थोड़ा डगमगाता है.

लोग सुस्ता रहे थे और एक-दूसरे से बात कर रहे थे, लेकिन, जहाज़ 13 किलोमीटर दूर ही पहुंचा होगा कि बारिश और तेज़ हो गई. साथ ही बहुत तेज़ हवाएं भी चलने लगीं.

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धीरे-धीरे जहाज़ में पानी भरना शुरू हो गया. ये देखते ही लोग अचानक चुप हो गए और पूरे जहाज़ में सन्नाटा छा गया. तभी जहाज़ एक तरफ को झुका और लोगों ने चिल्लाना शुरू कर दिया.

उस वक्त जहाज़ में बहुत कम लाइफ़ जैकेट्स थे. लोगों ने जैकेट्स के लिए लड़ना शुरू कर दिया. जो लोग कुछ देर पहले एक-दूसरे से हंस-मुस्कुराकर बातें कर रहे थे वो अब झगड़ने लगे.

पूरे जहाज़ में अफ़रातफ़री और डर का माहौल था. कप्तान शेख़ सुलेमान और चीफ़ अफ़सर आदमभाई लगातार लोगों से शांत रहने की अपील कर रहे थे. लेकिन उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं था. सभी अपनी जान बचाने की कोशिश में लगे थे.

जैसे ही जहाज़ एक तरफ झुका तो जिन लोगों को तैरना आता था वो पानी में कूद गए. जहाज़ पर मौजूद लोग ईश्वर से जान बचाने की प्रा​र्थना कर रहे थे.

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Image caption प्रतीकात्मक चित्र

एक बड़ी लहर आई और...

उस वक्त रामदास गल्स द्वीप के आसपास पहुंचा था कि तभी एक बहुत बड़ी लहर उससे टकराई और जहाज़ एक तरफ़ पलट गया. कई लोग तिरपाल में ही फंस गए और उससे बाहर ही नहीं निकल सके.

तभी एक और लहर ने जहाज़ को घेरा और वो पानी में डूब गया.

यह भारतीय समुद्री ​इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा हादसा रहा है. रामदास सुबह क़रीब 9 बजे पानी में डूबा था, लेकिन मुंबई में लोगों को शाम 5 बजे तक इसकी कोई ख़बर ही नहीं थी.

बारकू शेठ मुकादम लाइफ़ जैकेट की मदद से किसी तरह अपनी जान बचा पाए और समुद्र के किनारे पर पहुंचे. उन्होंने मुंबई पहुंचकर लोगों को इस बारे में बताया. उसके बाद तो जैसे ये ख़बर आग की तरह फैल गई.

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Image caption टाइटेनिक जहाज का प्रतीकात्मक चित्र

जहाज में सवार ज़्यादातर लोग गिरगांव और परेल इलाके से थे. जैसे ही यात्रियों के परिवार वालों तक ये ख़बर पहुंची तो वो तुंरत भाउ चा धाक्का पहुंचे जहां से जहाज़ ने यात्रा शुरू की थी.

परिजनों को उम्मीद थी कि शायद उनका कोई अपना वहां दिख जाए और वो उसे बचा कर ला सकें. लोग कई महीनों तक लगातार ऐसा करते रहे.

लेकिन, जहाज में सवार कई लोग हमेशा के लिए खो गए. यहां तक कि उनके शव भी नहीं मिले.

रामदास 17 जुलाई 1947 को डूबा था. इसके एक महीने बाद भारत आज़ाद हो गया. जब पूरा देश आज़ादी के जश्न में डूबा था तब मुंबई, रेवास, अलीबाग, नंदगांव, मानगांव और आसपास के इलाकों के कई लोग अपनों की तलाश में जुटे हुए थे.

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