सीपीएम नेता सीताराम येचुरी के सिर पर 'विवादित कलश' रखने के पीछे का सच क्या है

  • 18 जुलाई 2018
सीताराम येचुरी इमेज कॉपीरइट Pippala Venkatesh

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) के महासचिव सीताराम येचुरी की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है.

ये तस्वीर हैदराबाद के एक समारोह की है जिसमें येचुरी सिर पर 'बोनम' रखे हुए हैं. मीडिया ने भी व्यापक रूप से इस तस्वीर को छापा है.

तस्वीर के पीछे की कहानी

दरअसल बहुजन लेफ़्ट फ़्रंट (बीएलएफ़) ने रविवार को हैदराबाद में चुनाव सुधारों पर चर्चा करने के लिए एक सम्मेलन आयोजित किया था.

बीएलएफ़ का गठन तेलंगाना में सीपीएम सचिव ताम्मिनेनी वीरभद्रम ने किया था. उनका सबसे बड़ा लक्ष्य था कि पार्टी में कुछ लोगों के समूह के प्रभुत्व को समाप्त किया जाए. जब ये माना गया कि लेफ़्ट पार्टियाँ भारत के दलितों को अपने दलों में सही स्थान दिला पाने में नाकाम साबित हो रही हैं, तब बीएलएफ़ का गठन किया गया था.

बहरहाल, रविवार को बीएलएफ़ ने जो सम्मेलन आयोजित किया उसमें दलितों के उत्थान के लिए लंबे वक़्त से लड़ रहे दलित चिंतक कांचा इलैया हर बार की तरह मौजूद थे.

इस बैठक में सीताराम येचुरी ने भी शिरक़त की. बैठक के बाद एक रैली का भी आयोजन किया गया था.

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इस रैली में सीताराम येचुरी ने फूलों की देवी कही जाने वाली 'बटुकम्मा' को सिर पर रखा हुआ था. जैसे ही येचुरी मंच पर पहुँचे तो पत्रकारों ने उन्हें 'बोनम' को भी सिर पर रखने को कहा.

येचुरी उनकी बात मान भी गए और फ़ोटोग्राफ़रों ने उनकी तस्वीरें खींच लीं.

इस मुद्दे पर हमने सीताराम येचुरी से बात करने की कोशिश की, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया.

उनके कुछ क़रीबी सूत्रों का कहना है कि इन तस्वीरों को धार्मिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. उनके मुताबिक येचुरी ने तेलंगाना की संस्कृति के सम्मान में ये किया था.

इन दिनों तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में एक लोक महोत्सव चल रहा है जिसका नाम है बोनालू. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बोनालू के दौरान 'बटुकम्मा' के आयोजन की परंपरा नहीं है.

हालांकि 'बटुकम्मा' वक़्त के साथ तेलंगाना राज्य की संस्कृति के प्रतिबिंब के रूप में बदल रहा है. इसी वजह से येचुरी के 'बटुकम्मा' को सिर पर रखना सुर्ख़ियों में आ गया.

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बटुकम्मा और बोनम

बटुकम्मा एक ऐसा त्योहार है जो विजयदशमी (दशहरा) के दौरान मनाया जाता है. नौ दिन चलने वाला बटुकम्मा तेलंगाना में एक महत्वपूर्ण धार्मिक त्योहार है.

त्योहार के एक हिस्से के रूप में श्रद्धालु गोवरी (माता देवी) का अनुष्ठान करते हैं. वो इसे गोवरी के अवतार का समय मानते हैं. बटुकम्मा के दौरान कई किस्म का भोजन बनाया जाता है.

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हालांकि तेलंगाना में ही लोग बटुकम्मा को कई अलग-अलग नामों से बुलाते हैं.

बटुकम्मा को लेकर कई तरह की मान्यताएं और कहानियाँ भी हैं. कुछ लोग कहते हैं कि आधुनिक सिद्धांत के अनुसार बटुकम्मा गोवरी का एक दूसरा रूप है. वैसे बटुकम्मा मूल रूप से एक स्थानीय ग्राम देवी हैं.

जबकि कुछ अन्य लोगों का अनुमान है कि जब गाँवों में महामारी फ़ैल जाती थी तो लोग बटुकम्मा की पूजा करते थे.

एक और कहानी

लोग बताते हैं, "एक गाँव में एक ज़मींदार ने लड़की का रेप कर दिया था और इसके बाद लड़की की मौत हो गई. इसके बाद गाँव के वो सभी लोग इकट्ठा हुए जो कभी न कभी अत्याचारों और ऐसे अपराधों के पीड़ित रह चुके थे. उन्होंने मिलकर लड़की के जीवन के लिए प्रार्थना की. मृत लड़की का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बटुकम्मा की कामना की. माना जाता है कि तभी से ये त्योहार अस्तित्व में आया. उस मृत लड़की को याद करते हुए आज भी गोवरी माँ की शक्तियों की पूजा की जाती है."

हालांकि ये कोई अकेली कहानी नहीं है. इस त्योहार से जुड़ी कई अन्य पौराणिक कहानियाँ भी हैं.

कुछ दलित चिंतकों का कहना है कि पुराने समय में बड़े ज़मींदार दलित महिलाओं को नग्न करके उन्हें नाचने पर मजबूर करते थे और बटुकम्मा खेलते थे. इसलिए दलित बटुकम्मा से जुड़े अनुष्ठानों की निंदा करते हैं. वे बटुकम्मा से जुड़े रिवाज़ों पर सवाल उठाते हैं और पूछते हैं कि क्या आज भी लोग दलित महिलाओं के साथ बटुकम्मा खेलते हैं.

इसके विकल्प के रूप में दलित समाज के लोग अपने तरीक़े से बटुकम्मा त्योहार मनाते हैं.

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तेलंगाना में कई धर्मनिरपेक्ष और उदार सोच रखने वाले परिवार भी बटुकम्मा त्योहार में शामिल होते हैं.

इससे जुड़ा एक और तर्क भी है. कहा जाता है कि बटुकम्मा को आध्यात्मिकता से जोड़कर देखने की बजाय इसे संस्कृति के एक हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए.

बहरहाल, ये बटुकम्मा महोत्सव तेलंगाना में एक प्राकृतिक त्योहार के तौर पर ज़मीन पर मज़बूत होता जा रहा है. इसे फूलों और पत्तियों के साथ मनाया जाता है.

बटुकम्मा से जुड़ी कई धर्मनिरपेक्ष कथाएं भी हाल ही में अस्तित्व में आई हैं.

ऐसे समय में जब क्षेत्र, जाति और धर्म को राजनीति में प्रतीकों के तौर पर हिस्सा बना लिया गया है, बटुकम्मा ने कई अन्य सांस्कृतिक चीज़ों की तरह ही अपनी व्याख्याएं प्राप्त कर ली हैं.

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हिंदू समाज की पूजा

बटुकम्मा और बोनालू दो अलग-अलग त्योहार हैं. येचुरी और अन्य सीपीएम नेताओं के पास बटुकम्मा को सिर पर रखकर ले जाने का इनमें से कोई भी कारण रहा हो, लेकिन ये साफ़ है कि तेलंगाना में फ़िलहाल जो त्योहार मनाया जा रहा है वो बोनालू है, बटुकम्मा नहीं.

इस त्योहार का पूरा नाम 'महाकाली बोनालू' है. शब्दकोश के अनुसार, बोनम का अर्थ 'भोजन' होता है.

इस संदर्भ में, बोनम भगवान को दी गई एक भेंट है और इसे 'नैवेद्यम' कहा जाता है.

बोनालू त्योहार के दौरान हिंदू समाज देवी महाकाली की पूजा करता है और उन्हें भोजन की पेशकश करता है. कोई कह सकता है कि ये पूजा करने की परंपरा है.

सीताराम येचुरी ने बटुकम्मा के साथ-साथ बोनालू को भी अपने सिर पर रखा. येचुरी की तस्वीर में जो फूलों के साथ दिख रही हैं वो बटुकम्मा हैं और सीताराम येचुरी ने 'बटुकम्मा' के साथ-साथ अपने सिर पर 'बोनालू' भी ले लिया. फूलों के साथ दिखाई देने वाला एक 'बटुकम्मा' है और मिट्टी के एक बड़े कलश के साथ जो हैं वो 'बोनम' हैं.

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