अविश्वास प्रस्ताव के 'विपक्षी जाल' से नरेंद्र मोदी सरकार को कितना ख़तरा?

  • 18 जुलाई 2018
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नरेंद्र मोदी सरकार के ख़िलाफ़ लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने अविश्वास प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है.

तेलुगू देशम पार्टी ने लोकसभा में सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया था. इसका कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों ने समर्थन किया था.

बुधवार को मॉनसून सत्र के पहले दिन संसद में मॉब लिंचिंग और दूसरे मुद्दों पर ज़ोरदार हंगामा हुआ. इसी बीच लोकसभा में सत्तारूढ़ एनडीए सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा का नोटिस स्वीकार कर लिया गया और स्पीकर ने कहा कि वो अगले दो-तीन दिन में इस पर बहस की तारीख़ तय करेंगी.

मोदी सरकार के ख़िलाफ़ पहला अविश्वास प्रस्ताव

इसके जवाब में संसदीय कार्य मंत्री अनंत कुमार ने कहा कि वो बहस के लिए राज़ी हैं. बीते चार साल में मोदी सरकार के ख़िलाफ़ ये पहला अविश्वास प्रस्ताव है जिसे स्पीकर ने स्वीकार किया है.

इससे पहले मोदी सरकार के चार साल पूरे होने के ठीक दो महीने पहले यानी 16 मार्च को उसके ख़िलाफ़ संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश की गई थी.

मार्च में ही आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्ज़ा नहीं मिलने से नाराज़ होकर तेलुगू देशम पार्टी एनडीए से अलग हो गई थी और उसके बाद उसने अन्य विपक्षी पार्टियों की मदद से अविश्वास प्रस्ताव की नोटिस दी.

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लेकिन जब इसे पेश किया गया तब लोकसभा में लगातार हंगामा चल रहा था और सदन को बार-बार स्थगित किया जा रहा है. जिस दिन इसे सदन के पटल पर रखा गया उस दिन का सत्र भी बेहद हंगामेदार था और इसी के बीच लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने अविश्वास प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया और सदन की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित कर दी.

बुधवार को भी सदन में हंगामा हुआ, लेकिन इसके बीच सुमित्रा महाजन ने इसे स्वीकार कर लिया.

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Image caption चंद्रबाबू नायडु

लोकसभा की सीटें

अब सवाल यह उठता है कि क्या मोदी सरकार के पास इस अविश्वास प्रस्ताव को विफल करने के लिए पर्याप्त नंबर हैं? इस अविश्वास प्रस्ताव से केंद्र सरकार को कोई ख़तरा तो नहीं है?

वर्तमान में लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 543 है. इनमें से 9 सीटें अभी खाली हैं. यानी इस वक्त लोकसभा के कुल 534 सांसद हैं. इस लिहाज से लोकसभा में साधारण बहुमत का आंकड़ा 534 का आधा 267+1 यानी 268 होता है.

फ़िलहाल लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है. अकेले भारतीय जनता पार्टी के पास 272 + 1 (लोकसभा अध्यक्ष) सांसद हैं और सहयोगी दलों को मिलाकर एनडीए गठबंधन के पास 311 सांसद हैं. इनमें शिवसेना के सांसद (18), एलजेपी (6), अकाली दल (4), आरएलएसपी (3), जेडीयू (2), अपना दल (2), एनआर कांग्रेस (1), पीएमके (1) और एनपीपी (1) हैं.

अगर सहयोगी दलों को छोड़ भी दें तो भाजपा अकेले अपने दम पर सदन में विश्वास मत हासिल कर लेगी. ऐसे में तकनीकी तौर पर देखा जाए तो सरकार को पेश होने वाले अविश्वास प्रस्ताव से कोई ख़तरा नहीं है.

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क्या होता है अविश्वास प्रस्ताव?

अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा (केंद्र सरकार) या विधानसभा (राज्य सरकार) में विपक्षी पार्टी लाती है. विपक्षी पार्टी यह तब लाती है जब उसे लगता है कि सरकार के पास सदन चलाने के लिए पर्याप्त बहुमत नहीं या सदन में सरकार विश्वास खो चुकी है.

इस प्रस्ताव को लाने के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन चाहिए. अब जबकि इसे मंज़ूरी मिल गई है तो सत्ताधारी पार्टी को साबित करना होगा कि उन्हें सदन में ज़रूरी समर्थन हासिल है.

अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के बाद इस पर वोटिंग होगी और फ़ैसला साधारण बहुमत से तय होगा. अगर सदन ने इसके समर्थन में वोट दे दिया तो सरकार गिर जाएगी. यानी मोदी सरकार के बने रहने के लिए अविश्वास प्रस्ताव का गिरना ज़रूरी है.

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संविधान और अविश्वास प्रस्ताव

संविधान में अविश्वास प्रस्ताव का कोई ज़िक्र नहीं है. हां, अनुच्छेद 118 के तहत हर सदन अपनी प्रक्रिया के नियम बना सकता है. अविश्वास प्रस्ताव से संबंधित नियम 198 के तहत व्यवस्था है कि कोई भी सदस्य लोकसभा अध्यक्ष को सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे सकता है.

शर्त यह है कि नोटिस को अध्यक्ष जिस दिन की कार्यवाही का हिस्सा बनाएं और वह सदन के समक्ष आए तो उसके समर्थन में 50 सदस्यों को अपना समर्थन जताना होगा.

लेकिन सदन में हंगामा और संभ्रम (यानी अध्यक्ष का 50 सदस्यों की स्पष्ट ग़िनती करने में असमर्थ होना) की स्थिति में अविश्वास प्रस्ताव चर्चा के लिए नहीं लिया जा सकता.

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Image caption इंदिरा गांधी

अविश्वास प्रस्ताव का इतिहास

भारतीय संसद के इतिहास में पहली बार अगस्त 1963 में जे बी कृपलानी ने अविश्वास प्रस्ताव रखा था.

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार के ख़िलाफ़ रखे गए इस प्रस्ताव के पक्ष में केवल 62 वोट पड़े और विरोध में 347 वोट.

पहला अविश्वास प्रस्ताव पंडित जवाहर लाला नेहरू सरकार के ख़िलाफ़ आया था.

तब से लेकर अब तक संसद में कई बार अविश्वास प्रस्ताव रखे जा चुके हैं. 2014 में सत्ता में आई मोदी सरकार के ख़िलाफ़ यह पहला अविश्वास प्रस्ताव है.

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Image caption अटल बिहारी वाजपेयी

किसके ख़िलाफ़ सबसे ज़्यादा प्रस्ताव?

सबसे ज़्यादा अविश्वास प्रस्ताव का सामना इंदिरा गाँधी की काँग्रेस सरकार को करना पड़ा है. उनके ख़िलाफ़ 15 अविश्वास प्रस्ताव आए.

लाल बहादुर शास्त्री और नरसिम्हा राव की सरकारों ने तीन-तीन बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना किया.

1993 में नरसिंह राव बहुत कम अंतर से अपनी सरकार के ख़िलाफ़ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को हरा पाए.

बाद में उनकी सरकार पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को प्रलोभन देने का आरोप भी लगा.

अविश्वास प्रस्ताव पेश करने का रिकॉर्ड मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद ज्योति बसु के नाम है.

उन्होंने अपने चारों प्रस्ताव इंदिरा गाँधी की सरकार के ख़िलाफ़ रखे थे.

Image caption मोरारजी देसाई

जब गिर गई मोरारजी सरकार

एनडीए सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने विपक्ष में रहते हुए दो बार अविश्वास प्रस्ताव पेश किए हैं और जब वो ख़ुद प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने दो बार विश्वास प्रस्ताव पेश किया और दोनों बार ही इसे हासिल करने में असफल रहे.

1996 में तो उन्होंने मतविभाजन से पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया और 1998 में वे एक वोट से हार गए.

वाजपेयी के ख़िलाफ़ एक बार अविश्वास प्रस्ताव भी लाया जा चुका है.

संविधान के लागू होने के बाद से आज तक संसद में लाए गए सभी अविश्वास प्रस्ताव खारिज कर दिए गए हैं, सिवाय एक के.

वो अविश्वास प्रस्ताव मोरारजी देसाई सरकार के ख़िलाफ़ 1978 में लाया गया था.

मोरारजी देसाई सरकार के कार्यकाल के दौरान दो बार अविश्वास प्रस्ताव रखा गया. पहले प्रस्ताव से उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई, लेकिन दूसरे के समय उनकी सरकार के घटक दलों में आपसी मतभेद थे.

अपनी हार का अंदाज़ा लगते ही मोरारजी देसाई ने मतविभाजन से पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया.

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