मैरिटल रेप पर क्यों मचा है बवाल?

  • 18 जुलाई 2018
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'शादी का ये मतलब बिल्कुल नहीं की बीवी सेक्स के लिए हमेशा तैयार बैठी है' - दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका पर सुनवाई के दौरान एक्टिंग चीफ़ जस्टिस गीता मित्तल और सी हरि शंकर की बेंच ने ये टिप्पणी की.

मैरिटल रेप पर ये जनहित याचिका ऋत फ़ाउंडेशन और ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वूमन एसोसिएशन ने दिल्ली हाई कोर्ट में डाली थी.

ऋत फ़ाउंडेशन की अध्यक्ष चित्रा अवस्थी ने बीबीसी से बातचीत में इस जनहित याचिका को डालने के पीछे की मंशा बताई.

उनकी दलील है कि रेप की परिभाषा में शादीशुदा औरतों के साथ भेदभाव दिखता है. उनका तर्क है कि पति का पत्नी के साथ रेप परिभाषित कर इस पर क़ानून बनाया जाना चाहिए. इसके लिए कई महिलाओं की आपबीती को उन्होंने अपनी याचिका का आधार बनाया है.

ये जनहित याचिका दो साल पहले दायर की गई थी.

चूंकि ये एक जनहित याचिका है इसलिए दिल्ली स्थित एनजीओ, मेन वेलफ़ेयर ट्रस्ट ने भी इस पर कोर्ट में अपना पक्ष रखा है. मेन वेलफ़ेयर ट्रस्ट पुरुष अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था है.

मेन वेलफ़ेयर ट्रस्ट के अध्यक्ष अमित लखानी के मुताबिक, "शादीशुदा महिलाओं के साथ उनके पति किसी तरह की ज़बरदस्ती करें तो क़ानून में कई धाराएं हैं जिसका वो सहारा ले सकती हैं, तो फिर अलग से मैरिटल रेप पर क़ानून बनाने की ज़रूरत क्या है?"

ऐसे में ये सवाल पूछा जा सकता है कि 'रेप' और 'मैरिटल रेप' में क्या फ़र्क़ है.

क्या है रेप?

किसी भी उम्र की महिला की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ या उसकी सहमति के बिना-

उसके शरीर (वजाइना या एनस) में अपने शरीर का कोई अंग डालना रेप है.

उसके निजी अंगों को पेनिट्रेशन के मक़सद से नुकसान पहुंचाने की कोशिश करना, रेप है.

उसके मुंह में अपने निजी अंग का कोई भी हिस्सा डालना, रेप है.

उसके साथ ओरल सेक्स करना, रेप है.

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आईपीसी की धारा 375 के मुताबिक़, कोई व्यक्ति अगर किसी महिला के साथ नीचे लिखी परिस्थितियों में यौन संभोग करता है तो कहा जाएगा कि रेप किया गया.

1. महिला की इच्छा के विरुद्ध

2. महिला की मर्ज़ी के बिना

3. महिला की मर्ज़ी से, लेकिन ये सहमति उसे मौत या नुक़सान पहुंचाने या उसके किसी क़रीबी व्यक्ति के साथ ऐसा करने का डर दिखाकर हासिल की गई हो.

5. महिला की मर्ज़ी से, लेकिन ये सहमति देते वक़्त महिला की मानसिक स्थिति ठीक नहीं हो या फिर उस पर किसी नशीले पदार्थ का प्रभाव हो और लड़की सहमति देने के नतीजों को समझने की स्थिति में न हो.

लेकिन इसमें एक अपवाद भी है. पिछले साल अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी से शारीरिक संबंध बनाना अपराध है और इसे रेप माना जा सकता है. कोर्ट के अनुसार, नाबालिग पत्नी एक साल के अंदर शिकायत दर्ज करा सकती है.

इस क़ानून में शादीशुदा महिला ( 18 साल से ज्यादा उम्र ) के साथ उसका पति ऐसा करे तो उसे क्या माना जाएगा, इस पर स्थिति साफ नहीं है. इसलिए मैरिटल रेप पर बहस हो रही है.

क्या है मैरिटल रेप

भारत में 'वैवाहिक बलात्कार' यानी 'मैरिटल रेप' क़ानून की नज़र में अपराध नहीं है.

इसलिए आईपीसी की किसी धारा में न तो इसकी परिभाषा है और न ही इसके लिए किसी तरह की सज़ा का प्रावधान है.

लेकिन जनहित याचिका डालने वाली संस्था ऋत फ़ाउंडेशन की चित्रा अवस्थी के मुताबिक़ पति अपनी पत्नी की मर्ज़ी के बग़ैर उससे जबरन शारीरिक संबंध बनाता है तो उसे अपराध माना जाए.

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महिला एवं बाल कल्याण मंत्री मेनका गांधी ने 2016 में मैरिटल रेप पर टिप्पणी करते हुए कहा था, "भले ही पश्चिमी देशों में मैरिटल रेप की अवधारणा प्रचलित हो, लेकिन भारत में ग़रीबी, शिक्षा के स्तर और धार्मिक मान्यताओं के कारण शादीशुदा रेप की अवधारणा फ़िट नहीं बैठती."

केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट में 'मैरिटल रेप' को 'अपराध करार देने के लिए दायर की गई याचिका के जवाब में 2017 में कहा कि इससे 'विवाह की संस्था अस्थिर' हो सकती है.

दिल्ली हाई कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा, "मैरिटल रेप को अपराध नहीं क़रार दिया जा सकता है और ऐसा करने से विवाह की संस्था अस्थिर हो सकती है. पतियों को सताने के लिए ये एक आसान औज़ार हो सकता है."

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क्या कहता है हिंदू मैरेज एक्ट

हिंदू विवाह अधिनियम पति और पत्नी के लिए एक-दूसरे के प्रति कुछ ज़िम्मेदारियां तय करता है. इनमें सहवास का अधिकार भी शामिल है.

क़ानूनन ये माना गया है कि सेक्स के लिए इनकार करना क्रूरता है और इस आधार पर तलाक मांगा जा सकता है.

क्या है विवाद?

एक तरफ रेप का क़ानून है और दूसरी तरफ़ हिंदू मैरेज एक्ट - दोनों में परस्पर विरोधी बातें लिखी है जिसकी वजह से 'मैरिटल रेप' को लेकर संशय की स्थिति बनी है.

मेन वेलफ़ेयर ट्रस्ट के अमित लखानी का तर्क है कि रेप शब्द का इस्तेमाल हमेशा 'थर्ड पार्टी' की सूरत में करना चाहिए. वैवाहिक रिश्ते में इसका इस्तेमाल ग़लत है.

जबकि ऋत फ़ाउंडेशन का तर्क है कि क़ानून न होने की सूरत में महिलाएं इसके लिए दूसरे क़ानून जैसे घरेलू हिंसा क़ानून का सहारा लेती हैं, जो उनका पक्ष को मज़बूत करने के बजाय कमज़ोर करता है.

निर्भया रेप मामले के बाद बनी जस्टिस वर्मा कमेटी ने भी मैरिटल रेप के लिए अलग से क़ानून बनाने की मांग की थी. उनकी दलील थी कि शादी के बाद सेक्स में भी सहमति और असहमित को परिभाषित करना चाहिए.

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तो फिर महिलाओं की सुनवाई कहां?

जानकार मानते हैं, मैरिटल रेप पर अलग से क़ानून न होने की सूरत में महिलाएं अपने ऊपर हो रही क्रूरता के लिए अकसर 498(ए) का सहारा लेती हैं.

वैसे तो 498(ए) की धारा में पति या उसके रिश्तेदारों के ऐसे सभी बर्ताव को शामिल किया गया है जो किसी महिला को मानसिक या शारीरिक नुक़सान पहुंचाए या उसे आत्महत्या करने पर मजबूर करे.

दोषी पाए जाने पर इस धारा के तहत पति को अधिकतम तीन साल की सज़ा का प्रावधान है.

बलात्कार के क़ानून में अधिकतम उम्र क़ैद और जघन्य हिंसा होने पर मौत की सज़ा का प्रावधान है.

1983 की आईपीसी धारा 498(ए) के दो दशक बाद साल 2005 में सरकार ने घरेलू हिंसा की शिकायतों के लिए 'प्रोटेक्शन ऑफ़ वूमेन फ़्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस' नाम का एक नया क़ानून भी बनाया.

इसमें गिरफ़्तारी जैसी सज़ा नहीं बल्कि जुर्माना और सुरक्षा जैसी मदद के प्रावधान हैं.

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अब आगे क्या?

मैरिटल रेप पर केन्द्र सरकार कानून बनाए, इस मांग को लेकर पिछले दो साल से दिल्ली हाई कोर्ट में बहस चल रही है. इस मामले पर अगली सुनवाई 8 अगस्त को है. उस दिन दोनों पक्ष अपने तरफ से नई दलीलें पेश करेंगे और दुनिया के दूसरे देशों में इस पर क्या क़ानून है इस पर भी चर्चा होगी. फ़िलहाल इस पर कोई फ़ैसला आने में थोड़ा और वक़्त लगेगा.

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