स्तनपान का मामला आख़िर कोर्ट में क्यों है

  • भूमिका राय
  • बीबीसी संवाददाता
स्तनपान

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"आप ख़ुद बताइए मां बनना कोई जुर्म है क्या, नहीं न...तब बच्चे को ब्रेस्टफ़ीड कराना जुर्म कैसे हो जाता है? सार्वजनिक जगह पर अपने बच्चे को ब्रेस्टफ़ीड कराओ तो लोग ऐसे देखते हैं जैसे कोई क्राइम कर रहे हों."

ये कहना है नेहा रस्तोगी का. वही नेहा जिन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट में सार्वजनिक जगहों पर ब्रेस्टफ़ीडिंग सेंटर बनाने के लिए अपने नौ महीने के बच्चे के नाम पर जनहित-याचिका डाली है. लेकिन क्या ये परेशानी सिर्फ़ नेहा की है?

शायद नहीं. ये परेशानी उन तमाम मांओं की है जिनके बच्चे अभी छोटे हैं और जिन्हें घर से बाहर निकलना पड़ता है.

नेहा कहती हैं, "मुझे समझ नहीं आता कि अभी तक किसी ने इस बारे में सोचा क्यों नहीं. ब्रेस्ट फ़ीड कराना कोई नई बात तो है नहीं, लेकिन आज तक किसी ने इसकी ज़रूरत नहीं समझी, ये भी आश्चर्य की ही बात है."

नेहा की याचिका पर आधे घंटे की बहस के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और नगर निकायों को इस संबंध में नोटिस भेजकर जवाब मांगा है.

इस जनहित याचिका पर सरकार और नगर निगम को 28 अगस्त तक जवाब देना है.

लेकिन जनहित याचिका डालने का ख़्याल आया कैसे?

"इस बात का पहला ख़्याल तब आया जब मैं खुद मां बनी. "

नेहा का नौ महीने का बेटा है.

"अव्यान के जन्म के बाद मुझे लगा कि पब्लिक प्लेसेस पर ब्रेस्टफ़ीडिंग सेंटर होने चाहिए. कई बार ऐसा होता है कि जगह नहीं होने की वजह से मैं उसे दूध नहीं पिला पाती और वो भूख से तड़प उठता."

नेहा और उनके पति अनिमेश रस्तोगी दोनों ही दिल्ली हाई कोर्ट में एडवोकेट हैं. उनकी मांग सिर्फ़ फ़ीडिंग स्पेस की नहीं है. वो चाहती हैं कि सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं और बच्चों के लिए चेंजिंग रूम भी होने चाहिए.

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"मेरी मांग सिर्फ़ ब्रेस्टफ़ीड रूम की नहीं है, मैं चाहती हूं कि फ़ीडिंग रूम के साथ ही चेंजिंग रूम की भी सुविधा होनी चाहिए क्योंकि बच्चे के कपड़े चेंज कराना, उनके डायपर बदलना जैसे बहुत से कम होते हैं."

दिल्ली में रहने वाली गरिमा की भी लगभग यही कहानी है. उनकी भी 3 साल की बेटी है. गरिमा बताती हैं कि भले ही आज मेरी बेटी तीन साल की हो गई हो लेकिन जब वो छोटी थी तो मैंने बहुत परेशानी उठाई है.

गरिमा कहती हैं, "कई बार तो ऐसा होता था कि मेरी बेटी रोती रह जाती थी लेकिन मैं उसे दूध नहीं पिला पाती थी. मां की छटपटाहट बस वो ही समझ सकती है."

क्या नौ महीने का बच्चा याचिका डाल सकता है?

एक्टिंग चीफ़ जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस सी हरि शंकर ने इस मामले की सुनवाई हुई. नेहा इस मामले में मुख्य याचिकाकर्ता नहीं हैं. ये याचिका उनके नौ महीने के बच्चे अव्यान की ओर से डाली गई है और नेहा बतौर अभिभावक ये मामला देख रही हैं.

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अनिमेश रस्तोगी

नेहा की ओर से मामले की पैरवी कर रहे अनिमेश कहते हैं, "जैसे ही कोई बच्चा पैदा होता है उसे वो तमाम मौलिक अधिकार प्राप्त हो जाते हैं जो एक बालिग के हैं. याचिका पर हस्ताक्षर करने के लिए न्यूनतम उम्र 18 वर्ष होनी चाहिए लेकिन अगर कोई नाबालिग याचिका डाल रहा है तो उसके अभिभावक उसके नाम से आवेदन कर सकते हैं."

स्मोकिंग ज़ोन की बात होती है लेकिन इस पर कोई नहीं सोचता

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समाप्त

नेहा का कहना है कि हमारे देश में औरतों से जुड़ी परेशानियों को शायद परेशानी समझा ही नहीं जाता है.

"आप ख़ुद सोचिए एक औरत जो नौ महीने की प्रेग्नेंसी के बाद खुद ही बाहरी दुनिया से कट जाती है अगर उसे इस तरह की परेशानी उठानी पड़े तो क्या वो घर के बाहर निकलन की हिम्मत जुटा पाएगी? इसका असर उसके मेंटल लेवल पर नहीं होगा? "

नेहा मानती हैं कि हमारे देश में लोग स्मोकिंग ज़ोन बनाने को लेकर तो जागरुक हैं, लेकिन उनके लिए एक मां और उसके बच्चे को लेकर कोई चिंता नहीं है.

नवंबर 2016 में आरजेडी की राज्यसभा सांसद मीसा भारती संसद परिसर में अपने तीन महीने के बेटे के साथ संसद सत्र में हिस्सा लेने पहुचीं, लेकिन बच्चे को राज्यसभा के अंदर ले जाने की इजाजत नहीं होने की वजह से मीसा को अपने अपने बच्चे को पति शैलेष के साथ पार्टी के कमरे में ही छोड़ना पड़ा.

इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया की सांसद लैरिसा वॉटर्स भी अपनी बेटी को संसद में स्तनपान कराने को लेकर सुर्खियों में आ गई थीं.

रोज़ाना मेट्रो में सफ़र करने वाली चेतना कहती हैं कि भारत में सार्वजनिक जगह पर स्तनपान कराना बहुत मुश्किल है. मर्दों के साथ-साथ औरतों की नज़र भी अजीब तरीक़े से घूरती हैं.

क्या कहते हैं लोग?

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नेहा की इस याचिका को आधार बनाकर बीबीसी ने लोगों से कहासुनी में राय जाननी चाही. जिस पर बहुत सारी प्रतिक्रियाएं भी मिलीं.

कमलेश यादव का मानना है कि सार्वजनिक जगहों पर दूध पिलाने की व्यवस्था होनी चाहिए क्योंकि ममता की कोई सीमा नहीं होती.

सूर्य एन राव कहते हैं बिल्कुल होना चाहिए क्योंकि हम भी कभी उस उम्र में थे.

अकील अहमद का मानना है कि सरकार कहां तक व्यवस्था करेगी लेकिन अगर औरत ऑफिस में काम करती है तो उसके लिए अलग व्यवस्था होनी चाहिए.

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