'नीरज से पहले गीतों में सब कुछ था, पर प्यार नहीं'

  • 20 जुलाई 2018
गोपालदास नीरज

हिंदी के सबसे उम्रदराज़ और सर्वाधिक लोकप्रिय कवि पद्मभूषण गोपालदास 'नीरज' ने गुरुवार को महाप्रयाण किया.

अनेक छवि-चित्र मन-मस्तिष्क में आ-जा रहे हैं और अनेक गीतों की लय कौंध रही हैं, शब्द गूँज रहे हैं. भाव, लय और शब्द की जैसी एकान्विति नीरज को सिद्ध थी, वह सदियों में किसी कवि को चुनती है. वैसे तो उन्हीं के शब्दों में- 'मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य', किंतु ऐसा सौभाग्य किसी-किसी को ही हासिल होता है.

इटावा में जन्मे और अलीगढ़ को अपनी कर्मस्थली बनाने वाले नीरज ने जीवन में अनथक संघर्ष किया. बहुत मामूली-सी नौकरियों से लेकर फ़िल्मी ग्लैमर तक, मंच पर काव्यपाठ के शिखरों तक, गौरवपूर्ण साहित्यिक प्रतिष्ठा तक, भाषा-संस्थान के राज्यमंत्री दर्जे तक उनकी उपलब्धियाँ उन्हें अपने संघर्ष-पथ पर पढ़े मानवीयता और प्रेम के पाठ से डिगा न सकीं-

हम तो बस एक पेड़ हैं, खड़े प्रेम के गाँव।

खुद तो जलते धूप में, औरों को दें छाँव।।

मंच का चुनाव अपने और अन्य कुछ परिवारों के दायित्व को निभाने की खातिर किया था नीरज ने. एक बार उन्होंने कहा था- ''लोग कहते हैं, पर भाई हमारी तो यह आजीविका है.'' संभवतः उन्हें यह स्वयं भी नागवार गुज़रता था-

इस मजबूरी का अहसास कितना ही गहरा रहा हो, पर नीरज की कविता के वस्तु-रूप को उसने कभी नियंत्रित नहीं किया. मंच की कविताएँ हों या फ़िल्मी गीत, नीरज का कवि कहीं भी समझौता नहीं करता.

फिल्म के लिए लिखे गए उनके गीत अपनी अलग पहचान रखते हैं. फ़िल्म-संगीत का कोई भी शौकीन गीत की लय और शब्द-चयन के आधार पर उनके गीतों को फ़ौरन पहचान सकता है. वस्तु के अनुरूप लय के लिए शब्द-संगति जैसे उनको सिद्ध है, उदाहरण के लिए 'शर्मीली' फ़िल्म का यह गीत देखें-

इस गीत को अगर आपने ध्यान से सुना है, तो आपको याद होगा कि जब कड़ी की पंक्तियों को टेक तक लाने के लिए दुहराया जाता है, तो उन्हें साँस के एक ही क्रम में गाया जाता है. यह नीरज के लय-रचाव की अपनी विशिष्टता है.

एक बार बातचीत के क्रम में उन्होंने बताया था कि 'रँगीला' के लिए जब उन्होंने टाइटिल साँग लिखा तो सचिन देव वर्मन ने इसके गाने को लेकर प्रश्न उठाया, बाद में नीरज ने जब स्वयं उसे गाकर सुनाया तो धुन तैयार हुई.

इस गीत में भी उपर्युक्त गीत की तरह 'तेरे रंग में जो रँगा है मेरा मन' को 'छलिया रे...' से जोड़ना होता है. 'कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे...' गीत रफ़ी ने तो 'ऐ भाई ज़रा देखके चलो...' मन्ना डे ने नीरज की लय को सुनकर ही गाया है.

अब ज़रा 'प्रेम पुजारी' के इस गीत के सम तक की लंबी यात्रा पर ध्यान दीजिए-

अपनी मृत्यु से कुछ ही पहले देवानंद ने नीरज की याद करते हुए उनकी गीत-रचना की प्रशंसा की थी. फ़िल्म इंडस्ट्री के अंधविश्वासों के चलते नीरज को वापस अलीगढ़ लौटना पड़ा, यद्यपि वही उनके लिए अधिक प्रियकर भी था.

अलीगढ़ के उनके निवास पर जानेवाले लोग जानते हैं कि नीरज को सादगी, सहजता और आत्मीयता का जीवन और वातावरण ही काम्य था. प्रायः घुटन्ना और बंडी पहने, बीड़ी पीते और अपने साहित्येतर आत्मीय जन के साथ तन्मयता से ताश और लूडो खेलते, गपशप करते नीरज को देखकर नया व्यक्ति काफ़ी देर में सहज हो पाता था.

उनके घर में उनके सहायक भी पारिवारिक दर्ज़ा रखते थे. एक दिन जब मैं उनके यहाँ पहुँचा तो वे अपने सहायक के बेटे को गोद में लिए कार की अगली सीट पर बैठे थे, बोले- "आज इसका जन्मदिन है, घुमाने और खरीददारी कराने ले जा रहे हैं."

बच्चा अपने बाबा (नीरज जी) से उत्साह में बातें कर रहा था और उसका पिता मुस्कुराते हुए कार को गेट से बाहर निकाल रहा था.

सामान्य जन के लिए उनके मन में दर्द था, इसी दर्द को वे 'प्रेम' कहते थे. प्रेम ही उनकी कविता का मूल भाव भी है, और लक्ष्य भी.

पेंगुइन से छपे उनके कविता-संग्रह 'नीरज : कारवाँ गीतों का' की भूमिका से उन्हीं के शब्दों में- "मेरी मान्यता है कि साहित्य के लिए मनुष्य से बड़ा और कोई दूसरा सत्य संसार में नहीं है और उसे पा लेने में ही उसकी सार्थकता है... अपनी कविता द्वारा मनुष्य बनकर मनुष्य तक पहुँचना चाहता हूँ... रास्ते पर कहीं मेरी कविता भटक न जाए, इसलिए उसके हाथ में मैंने प्रेम का दीपक दे दिया है... वह (प्रेम) एक ऐसी हृदय-साधना है जो निरंतर हमारी विकृतियों का शमन करती हुई हमें मनुष्यता के निकट ले जाती है. जीवन की मूल विकृति मैं अहं को मानता हूँ... मेरी परिभाषा में इसी अहं के समर्पण का नाम प्रेम है और इसी अहं के विसर्जन का नाम साहित्य है."

आध्यात्मिक रुचि के नीरज का मन मानव-दर्दों को अनेकविध रूप में महसूस करता था और उनके मनन का यही विषय था. 'सत्य' किसी एक के पास नहीं है, वह मानव-जाति की थाती है और मनुष्य-मनुष्य के हृदय में बिखरा हुआ है.

इस सत्य को प्रेम से जाना-पहचाना जा सकता है और जानना-पहचानना ही काफ़ी नहीं है, उसे मांस-मज्जा की तरह अपना हिस्सा बनाना ज़रूरी है. जब वह इस रूप में आ जाता है तो कविता का भाव बन जाता है और भाव-तीव्रता लय पकड़कर शब्दों में बह पड़ती है-नीरज की ऐसी मान्यता है और भाव-लय-शब्द की जिस एकान्विति का पहले ज़िक्र किया गया है, वह नीरज के काव्य में महसूस की जा सकती है.

आध्यात्मिक यात्रा में उपनिषदों, पुराणों से लेकर महर्षि अरविंद और रजनीश तक को उन्होंने आत्मसात किया था. वे स्वयं को प्रगतिशील या प्रगतिवादी कहते रहे, पर इस स्पष्टीकरण के साथ कि साहित्य में प्रचलित 'वाद' से वे भिन्न हैं.

संभवत उनकी चेतना पर सर्वाधिक प्रभाव एम.एन. रॉय के 'रेडिकल ह्यूमेनिज़्म' का था, जो उन दिनों के युवाओं की भावुकता को रास्ता दिखा रहा था.

नीरज का पार्थिव शरीर मेडिकल कॉलेज को अर्पित कर दिया जाएगा. प्रोफेसर कुँवरपाल सिंह ने देहदान की जो परंपरा कायम की, वह अलीगढ़ ही नहीं, अनेक शहरों में फल-फूल रही है. यह मनुष्य के प्रति प्रेम की पराकाष्ठा है, जो जीवन में ही नहीं, जीवन के बाद भी चलता रहता है यह जीवन के प्रति अगाध आस्था है, नीरज के यहाँ प्रेम से जन्मी जीवन के प्रति आस्था बार-बार मुखरित होती है-

छिप-छिप अश्रु बहाने वालो! मोती व्यर्थ लुटाने वालो!

कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है।

प्रेम को ही सर्वाधिक महत्त्व देने वाले कवि की इन पंक्तियों के साथ मैं उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ-

आज भले कुछ भी कह लो तुम, पर कल विश्व कहेगा सारा

नीरज से पहले गीतों में सब कुछ था, पर प्यार नहीं था।

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