रक्षा मंत्री गुमराह कर रही हैं, कांग्रेस को इस्तीफ़ा मांगना चाहिए: दिग्विजय सिंह

  • 22 जुलाई 2018
दिग्विजय सिंह

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह कभी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बेहद क़रीबी नेता माने जाते थे.

राजनीतिक गलियारों में उन्हें राहुल गांधी का राजनीतिक गाइड तक कहा जाता रहा है, लेकिन राहुल गांधी की नई टीम में वह शामिल नहीं हैं.

राहुल गांधी की कांग्रेस वर्किंग कमेटी से बाहर होने को दिग्विजय सिंह कोई बड़ा मुद्दा नहीं मानते हैं.

बीबीसी हिंदी से ख़ास बातचीत में उन्होंने राहुल गांधी की राजनीति और कांग्रेस के अंदर ख़ुद की भूमिका पर अपनी राय रखी.

इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा है कि 2019 का आम चुनाव चेहरों के आधार पर नहीं लड़ा जाएगा, बल्कि इस बार विचारधारा की लड़ाई होगी. इस लड़ाई में कांग्रेस कहां होगी, इसको लेकर भी उन्होंने अपनी बात रखी.

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राहुल गांधी ने संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान जो भाषण दिया है, उसे आप किस तरह से देखते हैं?

राहुल गांधी की बॉडी लैंग्वेज बहुत सही थी. वह कंपोज़ दिखे. अंग्रेज़ी और हिंदी के अपने भाषण में उन्होंने प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ा किया. प्रधानमंत्री ने अपने जवाब में बस लीपापोती की है, वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए.

उनके संबोधन में सबसे अहम मुद्दा रफ़ायल एयरक्राफ्ट डील रहा. कांग्रेस पार्टी शुरू से ये सवाल पूछ रही है कि किस क़ीमत में ये विमान ख़रीदे गए हैं.

क्या ऐसी ख़रीददारी के लिए मानक प्रावधानों का पालन किया गया- सिक्योरिटी कमेटी में ये निर्णय लिया गया, प्राइस निगोशिएशन कमेटी ने प्राइस निगोशिएट किया या नहीं, क्या ये प्रस्ताव वित्त मंत्रालय से पास हुआ है या नहीं. जहां 60 से 70 हज़ार करोड़ की ख़रीद हो रही है, वहां तो ध्यान से इनका पालन होना चाहिए था. इन सवालों का वह कोई जवाब नहीं दे रहे.

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रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण कहती हैं कि सीक्रेट एग्रीमेंट है, हम आपको नहीं बता सकते. अब ये कैसा सीक्रेट एग्रीमेंट है कि रफ़ायल बनाने वाली कंपनी ने अपने सालाना रिपोर्ट में इस सौदे का ज़िक्र किया हुआ है.

निर्मला जी ने संसद में एक समझौते से जुड़ा एक कागज भी दिखाया जिसके बारे में उन्होंने कहा कि ये समझौता 2008 में हुआ था और इस पर तब के रक्षामंत्री एके एंटनी के हस्ताक्षर हैं. हालांकि, रक्षा मंत्रालय के सूत्रों से मुझे जानकारी है कि ऐसा कोई समझौता 2008 में नहीं हुआ है.

इसके अलावा आज तक किसी भी डिफेंस वेपन को ख़रीदने के सौदे पर कहीं कोई सीक्रेट नहीं रहा. बोफोर्स कितने में ख़रीदे गए थे, ये कांग्रेस ने बताया था.

हमने रफ़ायल सौदा 550 करोड़ रुपये प्रति विमान किया था, अब ये डील क़रीब 1600 करोड़ रुपये प्रति विमान में हुई है. मेरे हिसाब से कांग्रेस पार्टी को रक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा मांगना चाहिए, वह देश को गुमराह कर रही हैं.

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इसके अलावा राहुल गांधी ने लिंचिंग के मुद्दे को उठाया है, हर छोटी बात पर ट्वीट करने वाले मोदी लिंचिंग के मामले पर चुप रहते हैं. अलवर में शनिवार को ही एक शख़्स की लिंचिंग हुई है, एक तरह से अराजकता की स्थिति है.

लिंचिंग के आरोपियों की ज़मानत हो रही है, पढ़े-लिखे मंत्री जयंत सिन्हा उन आरोपियों को माला पहना रहे हैं. देश को कहां ले जा रहे हैं. जब इन बातों को हम लोग उठाते हैं तो मोदी जी लफ्फाज़ी करके इस बात को मजाक के रूप में लेते हैं.

राहुल गांधी ने तमाम मुद्दे उठाए, लेकिन वह जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी से गले मिले और फिर उन्होंने आंख मारने का काम किया है, इससे उनके आरोपों की गंभीरता कम हो गई?

राहुल गांधी ने अपने भाषण के अंतिम हिस्से में कहा है कि मैं आभारी हूं भाजपा और आरएसएस का जिन्होंने मुझे भारत की परंपरा और संस्कृति को समझने का मौक़ा दिया.

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यानी जो तुम्हारा विरोध भी करे उससे सद्भाव से मिलना चाहिए. राहुल यही प्रदर्शित करने उनकी सीट तक गए, हाथ मिलाया, गले मिले कि मैं आपके ख़िलाफ़ बोला हूं लेकिन मेरे दिल में आपके लिए कोई बात नहीं है.

जहां तक आंख मारने की बात है, वो एकदम दूसरी बात है. दोनों में कोई संबंध नहीं है. मित्रों के साथ ऐसी बात होती है, तो कोई बड़ी बात नहीं है.

राहुल गांधी के साथ आपने 13-14 साल तक नज़दीक से काम करते हुए देखा है, आप उनके राजनीतिक गाइड भी माने जाते रहे...

(बीच में ही टोकते हुए) नहीं, मैं उनका राजनीतिक गाइड नहीं था, ये मीडिया के लोगों का प्रचार था.

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आप नज़दीक रहे हैं, उस हिसाब से बतौर राजनेता वे कितने मैच्योर हुए हैं?

वे काफ़ी मैच्योर हुए हैं. काफ़ी फ़र्क पड़ा है. उनमें राजनीतिक सूझबूझ है, समझ है और अपार संभावनाएं हैं.

वह मैच्योर हुए हैं और आप उनकी टीम में नहीं हैं, क्या इसकी कोई ख़ास वजह है?

मैं आपको 2011 के कांग्रेस अधिवेशन में ले जाना चाहता हूं. तब मैंने कहा था कि राहुल जी आप नेतृत्व संभालिए और नई कांग्रेस को बिल्ड कीजिए. अपनी नई टीम बनाइए. मैंने तब कहा था कि हमारे जैसे लोग, अहमद पटेल साहब हैं, गुलाम नबी आज़ाद साहब हैं, हम सबको रिटायर कीजिए.

मैं तब से लगातार ये कह रहा हूं, आज भी अपनी उस बात पर कायम हूं.

सवाल ये नहीं है कि कौन कांग्रेस वर्किंग कमेटी में है और कौन वर्किंग कमेटी में नहीं है. प्रश्न इस बात का है कि भारतीय जनता पार्टी से लड़ने और उन्हें हराने का हम में साहस है या नहीं.

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भारतीय जनता पार्टी की चुनौती के सामने कांग्रेस आज कहां है?

कांग्रेस की तैयारी पूरी है, कांग्रेस अध्यक्ष ने इस चुनौती के लिए अलग-अलग लोगों के ग्रुप बनाए हैं और सब अपना काम कर रहे हैं.

2019 के चुनाव को देखते हुए, एक अहम सवाल ये भी है कि क्या विपक्ष एकजुट हो पाएगा? इससे जुड़ा एक सवाल ये भी है कि क्या राहुल गांधी विपक्ष के नेता के तौर पर स्वीकार होंगे?

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2014 के चुनाव को भी अगर आप देखें तो पाएंगे कि भाजपा को महज़ 31 फ़ीसदी वोट मिले थे, तब उन्हें 283 सीटें मिली थीं. 69 फ़ीसदी वोट विपक्ष को मिले थे.

इस बार तो तेलुगू देशम और शिवसेना जैसे सहयोगी दल भी बीजेपी का साथ छोड़ रहे हैं.

जहां तक विपक्ष के नेता की बात है तो देखिएगा 2019 का चुनाव व्यक्ति केंद्रित नहीं होगा. पर्सनैलिटी के आधार पर नहीं होगा, वो चुनाव आइडियोलॉजी के आधार पर होगा.

इस देश में महात्मा गांधी, पंडित नेहरु, राम मनोहर लोहिया, बाबा आंबेडकर, सरदार पटेल, अब्दुल कलाम आज़ाद की विचारधारा काम करेगी या गोलवलकर, हेडगेवार, सावरकर और गोडसे की विचारधारा. ये सवाल एकदम साफ़ है.

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भारत जैसे समाज की शक्ति यहां की विविधता रही है, वैसे समाज में ये एरोगेंस रखना कि इस तरह से रहो, ये पहनो, ये खाओ, कैसे चल पाएगा.

अभी देखिए कि भगवा कपड़े पहनने वाले आर्य समाजी नेता स्वामी अग्निवेश, जो समाज सेवा में लगे रहे हैं, उनके साथ किस तरह से मारपीट की गई, उनके कपड़े फाड़ दिए गए और सरकार चुप है.

प्रधानमंत्री चुप हैं. कोई बयान तक नहीं आया है, जबकि ये प्रधानमंत्री जी के ही लोग हैं.

सत्तापक्ष में आक्रामकता तो इसलिए भी दिखती है क्योंकि पहली बार विपक्ष इतना कमज़ोर दिख रहा है?

विपक्ष इसलिए कमज़ोर दिख रहा है क्योंकि केंद्र सरकार के पास मीडिया को मैनेज करने के लिए हज़ारों करोड़ का पैकेज होता है, विपक्ष का कोई पैकेज नहीं होता. हमारी ख़बर अख़बारों में छोटे से कॉलम में छपती है, उनकी पांच-पांच कॉलम की ख़बरें छपती हैं. तो उसका फ़र्क भी दिखता है.

टीवी चैनलों पर तो विपक्ष की कोई ख़बर नहीं दिखती. इसी वजह से विपक्ष कमज़ोर नज़र आता है.

( दिग्विजय सिंह के साथ विशेष इंटरव्यू का दूसरा हिस्सा भी आप जल्द पढ़ेंगे, जिसमें बात होगी मध्य प्रदेश की राजनीति और दिग्विजय सिंह की भूमिका की.)

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