नज़रिया: क्या भारत उल्टी दिशा में छलांग लगा रहा है?

  • 22 जुलाई 2018
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अमर्त्य सेन ने कहा कि 2014 में मुल्क ने उल्टी दिशा में छलांग लगाई है.

अपनी बात को समझाने के लिए अर्थशास्त्री सेन ने जो चंद उदाहरण लिए उनमें एक था विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को ख़त्म करके उसकी जगह नए उच्च शिक्षा आयोग के गठन का सरकारी प्रस्ताव.

सेन साहब को दुनिया भर के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों का लंबा अनुभव है. भारत में भी वे अपने वक़्त के सबसे बेहतरीन शिक्षा केन्द्रों में से एक माने जानेवाले दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में बहुत कम उम्र में ही प्रोफ़ेसर हो गए थे.

उसके बाद अगर उन्हें अपने यहाँ बुलाने के लिए यूरोप और अमरीका के उम्दा शिक्षा संस्थानों में होड़ लगी रहती है तो उसकी वजह है उनका बौद्धिक क़द, जिसका अंदाज़ा उन्हें डीएसई में छोटी उम्र में ही प्रोफ़ेसरशिप देने वाले प्रशासकों को ज़रूर रहा होगा. वे पारखी थे, यह सेन ने साबित किया.

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आज हम सवाल करें कि क्या हमारे कुलपति और शिक्षा संस्थानों के प्रमुख ऐसा ही किसी सेन जैसी प्रतिभा का अनुमान देने वाले के साथ कर सकते हैं?

आम तौर पर उत्तर होगा: नहीं!

वे क्यों आज़ाद महसूस नहीं करते जबकि बाहर के श्रेष्ठ माने जाने वाले विश्वविद्यालय का प्रमुख ऐसा कर सकता है?

क्या हमारे यहाँ का कुलपति किसी ऐसे ही व्यक्ति से मिलने पर उसे अपने यहाँ तुरंत अध्यापक का पद देने का प्रस्ताव कर सकता है? उत्तर है नहीं!

क्या वह संस्था छोड़कर जा रहे किसी अध्यापक को कुछ अतिरिक्त सुविधा देकर अपने यहाँ रोक सकता है? नहीं!

बात अध्यापक तक सीमित नहीं है. क्या हमारे यहाँ कोई अध्यापक अपने मुताबिक़ पाठ्यक्रम बना सकता है? इसका उत्तर भी नहीं ही है.

वजह बहुत साफ़ है. हमारे यहाँ विश्वविद्यालयों के हाथ पाँव बंधे हुए हैं. नियम क़ानून क़ायदे एक केन्द्रीय संस्था बनाती है और सबको एक ही तरह उसका पालन करना है.

दमघोंटू नियंत्रण से आज़ादी

ऐसी हालत में औसतपन ही पनप और फलफूल सकता है, श्रेष्ठता कतई नहीं. सबसे ताज़ा उदाहरण सीबीसीएसई नामक एक चौखट बनाकर हर पाठ्यक्रम को उसमें फिट करने की कवायद है.

इसका इतना ढोल पीटा जा रहा है उसकी असलियत जानना हो तो किसी विभाग की इसे लेकर हो रही बैठक के किनारे खड़े होना काफ़ी है!

ऐसे हालात में अगर कोई कहे कि इस तरह के दमघोंटू नियंत्रण से आज़ादी दी जा रही है तो हर कोई उसका स्वागत ही करेगा!

यही दावा सरकार उच्च शिक्षा आयोग के अपने प्रस्ताव के पक्ष में कर रही है: वह ऐसी नियंत्रणकारी संस्था होगी जो सबको आज़ाद कर देगी.

लेकिन असल इरादा प्रस्ताव के हर नुक्ते में ज़ाहिर है. वह इरादा है और लगाम कसने का. पहले तो उस संस्था को सरकार की पालतू बनाने का जो सारे उच्च शिक्षा जगत के शीर्ष पर होगी.

यह उसके मुखिया और प्रमुख अधिकारियों को चुनने की प्रक्रिया से ही स्पष्ट है. जिस समिति की अध्यक्षता ही कैबिनेट सचिव करेगा, वह सरकार से किस तरह स्वायत्त होगी?

दूसरा नुक्ता जो इस प्रस्ताव का राजफाश कर देता है वह है इसमें एक परिषद् का प्रावधान जिसकी अध्यक्षता मानव संसाधन विकास मंत्री के हाथ होगी.

कहा तो उसे सलाहकार परिषद जा रहा है, लेकिन यह लिखा है कि उसके सुझाव को आयोग को मानना होगा. आयोग के भीतर इस तरह के निकाय की बात ही बेतुकी है.

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शिक्षा संस्थानों को स्वायत्तता

कैबिनेट सचिव की अध्यक्षतावाली समिति और मानव संसाधन विकास मंत्री की अध्यक्षता वाली सलाहकार समिति का प्रावधान इसके स्वायत्तता के दावे की पोल खोल देता है.

कहा तो जा रहा है कि यह सबको आज़ाद करेगी, लेकिन इसमें लिखा है कि इसकी जाँच भी करेगी कि छात्र ने वह प्रत्येक पाठ्यक्रम में क्या सीखा!

यानी समाजशास्त्र में क्या हासिल होना चाहिए और भौतिकी में क्या या दर्शन में, यह नया आयोग तय करेगा.

वह यह भी तय करेगा कि किन रास्तों से कौन सा पाठ्यक्रम अधिक कारगर होगा और नौकरी देने लायक बनेगा! ये सारे काम अध्यापक, विभाग, संकाय और अकादमिक परिषद के हुआ करते थे.

इन्हें अब यह आयोग अपने हाथ में ले लेना चाहता है. मसलन वह बताएगा कि दर्शन का पाठ्यक्रम कैसे बनाएं कि वह बाज़ार के लिए दार्शनिक तैयार करे!

वह हर साल हर संस्था की प्रगति की भी पड़ताल करेगा! फिर और बचा ही क्या जो विश्वविद्यालय के अपने हाथ में होगा?

सबसे दिलचस्प है यह प्रस्ताव कि यह आयोग उन मानदंडों को तय करेगा जिनके आधार पर शिक्षा संस्थानों को स्वायत्तता दी जाएगी.

और वह भी क्रमिक स्वायत्तता होगी. यानी कौन ख़ुदमुख्तार होगा, कब और कितना, यह आयोग तय करेगा!

उसी तरह इसका अधिकार आयोग को दिया जा रहा है कि वह किसी भी विश्वविद्यालय को अपने पाठ्यक्रम ख़ुद तय करने के कायदे भी तय करेगा.

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लंबी प्रक्रियाओं का परिणाम

आज की बात करें तो यह अधिकार हर विश्वविद्यालय के पास है. यानी, जो अधिकार अभी विश्वविद्यालय के पास है उसे भी यह नया आयोग ले लेना चाहता है. फिर इस दावे का क्या मोल कि वह विश्वविद्यालय को स्वतंत्र करने के लिए बनाया गया है!

सबसे दिलचस्प प्रस्ताव है विश्वविद्यालय को अनुदान देने का अधिकार मंत्रालय को दे देना. जब थैलीशाह सरकार हो तो क्या उससे स्वतंत्र कुछ करने की हिमाकत कोई विश्वविद्यालय कर सकता है?

यूजीसी साठ साल की हो गई, इसीलिए अब चल फिर नहीं सकती और एक जवान और फुर्तीली संस्था को उसकी जगह आना चाहिए, यह तर्क संस्थाओं के ऊपर लागू नहीं होता.

संस्थाओं का निर्माण फानी इंसानी ज़िंदगी की मियाद के मुताबिक़ नहीं होता. वे दरअसल लंबी प्रक्रियाओं के परिणाम हैं.

तो क्या यह कहा जा रहा है कि परिवर्तन न हो? क्या यूजीसी काफ़ी है? ये सवाल आज से दस साल पहले उठाए गए थे.

यह सरकार उस बहस की याद नहीं करती क्योंकि यह भ्रम पैदा करना चाहती है कि हर चीज़ यह पहली बार कर रही है!

दस बरस पहले यूजीसी की जगह नए निकाय के प्रस्ताव का दर्शन यशपाल समिति ने दिया था: वह सिर्फ़ यूजीसी को बदलना नहीं था, उच्च शिक्षा के बारे में पूरा नज़रिया बदलने की शुरुआत की दावत थी.

उसका कारण यह भी था कि यूजीसी जिस वक़्त बनी थी तब से शिक्षा का पर्यावरण पूरी तरह बदल चुका था.

बुनियाद या पहली शर्त

यशपाल का कहना था कि विश्वविद्यालय पूरी तरह से स्वनियंत्रित होने चाहिए. दूसरे, उच्च शिक्षा को टुकड़े टुकड़े करके न देखना चाहिए.

इसलिए क़ानून हो या चिकित्सा या वास्तुकला, सबकी शिक्षा को एक समग्र शिक्षा दर्शन के दायरे में रख कर देखा जाना चाहिए.

यानी, आईआईएम हो या आईआईटी, शिक्षा के बारे में उनकी चिंता वही होनी चाहिए जो जेएनयू या हैदराबाद विश्वविद्यालय या जामिया मिल्लिया इस्लामिया की होगी.

इसीलिए समग्रता यशपाल का प्रिय शब्द था, जैसे स्वायत्तता. स्वायत्तता मेरे अच्छे काम का पुरस्कार नहीं हो सकती, स्वायत्तता अच्छा काम करने की बुनियाद या पहली शर्त है.

अगर इस निगाह से देखें तो सरकार का नए आयोग का प्रस्ताव नियंत्रण कम करने की जगह लगाम कसने की कवायद है.

लेकिन एक ऐसी संस्था को खत्म करने के बहाने जो अपनी साख खो चुकी है, यह सरकार पूरे शिक्षा जगत को ही अपने मातहत लाना चाहती है. इस साज़िश को सबने भांप भी लिया है.

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