रकबर हत्याकांड: एक पुलिसकर्मी सस्पेंड, चार लाइन हाज़िर

  • 23 जुलाई 2018
रकबर के गांव में मातम का माहौल

अलवर के रकबर हत्याकांड मामले में राजस्थान सरकार ने संबंधित पुलिस थाने के सहायक उप पुलिस निरीक्षक मोहन सिंह को निलंबित कर दिया है.

जयपुर के स्थानीय पत्रकार नारायण बारेठ के मुताबिक, इसके साथ ही थाने के चार सिपाहियों को लाइन हाज़िर किया गया है.

आरोप है कि अलवर ज़िले के रामगढ़ थाना क्षेत्र में शुक्रवार रात कथित गोरक्षकों ने रकबर की बुरी तरह पिटाई की थी, जिसके बाद वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे. आरोप है कि रकबर को अस्पताल ले जाने में पुलिस ने कोताही बरती. पुलिस कोई तीन घंटे बाद रकबर को पास के सरकारी अस्पताल ले गई, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.

बीबीसी संवाददाता सलमान रावी रकबर के गांव पहुंचे और इस घटना की पड़ताल की. पढ़िए उनकी ग्राउंड रिपोर्ट:

"कुछ लोग गौ तस्करी के लिए राजस्थान से हरियाणा की तरफ़ पैदल जा रहे हैं."

रक़बर के क़त्ल के मामले में राजस्थान के अलवर ज़िले के रामगढ़ थाने को पहली ख़बर यही मिली थी.

एफ़आईआर के मुताबिक़ घटना की ख़बर देर रात 12 बजकर 41 मिनट पर मिली. ख़बर किसी नवल किशोर शर्मा नाम के शख़्स ने दी थी.

पुलिस का कहना है कि रकबर को इसी इलाक़े के रहने वाले कुछ लोगों ने इतना पीटा था कि सरकारी अस्पताल जाते-जाते उन्होंने दम तोड़ दिया.

घटना लालावंडी के जंगलों के पास की है जहाँ से पुलिस ने दो हमलावरों को मौक़ा-ए-वारदात से गिरफ़्तार किया.

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रकबर के गांव में इतना मातम कभी नहीं हुआ था

एफ़आईआर में ये भी कहा गया है कि मरने से पहले रकबर ने अपने बयान में अज्ञात लोगों के हमले की बात कही थी.

इस बयान को एफ़आईआर में दर्ज किया गया है. इस मामले में पुलिस को सूचना देने वाले नवल किशोर विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े बताए जाते हैं.

घटनास्थल से गिरफ़्तार किए गए अन्य लोगों का संबंध दूसरे हिन्दू संगठनों से बताया जा रहा है. इस बात का पता चलने पर ये मामला राजनीतिक रंग भी ले चुका है.

दूसरी तरफ़ इस मामले में राज्य के बीजेपी विधायक ज्ञान देव आहूजा ने अपने बयान से पुलिस को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है.

पत्रकारों से बात करते हुए आहूजा ने बताया है कि उनके कार्यकर्ताओं ने रकबर को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया था.

उनका ये भी कहना है कि जिस वक़्त कार्यकर्ताओं ने रकबर को पकड़ा उसने भागने की कोशिश की और उसी में वो घायल भी हो गया.

आहूजा का आरोप है कि रकबर को पुलिस के हवाले कर दिया गया था.

वहीं, मामले में दूसरा मोड़ तब आया जब पुलिस को ख़बर देने वाले नवल किशोर ने एक बड़े हिंदी अख़बार को बयान दिया कि वो भी पुलिस के साथ घटनास्थल पर गए थे.

उनके हवाले से अख़बार ने लिखा है कि एक बजे रात के आस-पास पुलिस दल ने रकबर को अपने क़ब्ज़े में ले लिया था.

Image caption रकबर की उम्र 28 साल के आसपास थी

मगर उनका आरोप है कि जब रकबर को अलवर ज़िले के रामगढ़ स्थित सरकारी अस्पताल में ले जाया गया, उस वक़्त सुबह के चार बज रहे थे जबकि घटनास्थल से अस्पताल की दूरी मात्र चार से पांच किलोमीटर ही है.

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में भी ये भी कहा जा रहा है कि गायों को पहले गौशाला पहुँचाया गया और उसके बाद रकबर को अस्पताल.

Image caption रकबर की पत्नी

पुलिस ने अपनी एफ़आईआर में घटनास्थल से गिरफ्तार किए गए लोगों के नाम भी सार्वजनिक किए हैं, रविवार को पुलिस ने दावा किया कि रकबर पर हमला करने की घटना में शामिल व्यक्ति को भी गिरफ़्तार किया गया है.

अब भारतीय जनता पार्टी के विधायक पूरे मामले की न्यायिक जांच मांग कर रहे हैं.

Image caption रकबर के भाई इरशाद

'किसने मारा, कैसे मारा, हमें कुछ नहीं पता'

वहीं, रकबर के साथ दुधारू गाय लेकर जाने वाले असलम ने किसी तरह ख़ुद को हमलावरों के चंगुल से छुड़ाने में कामयाबी हासिल की और वो रात के अँधेरे में खेतों और जंगलों से होते हुए किसी तरह अपनी जान बचा पाए.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि रकबर की मौत की ख़बर उन्हें सुबह गांव लौटकर ही मिल पाई.

मगर इसी बीच मेवात की पुलिस अधीक्षक नाज़नीन भसीन ने अलवर के एसपी से व्यक्तिगत रूप से बात की और कहा कि असलम का रामगढ़ जाना मुमकिन नहीं है क्योंकि उसे भी अपनी जान को ख़तरा हो सकता है.

इसलिए मेवात की पुलिस अधीक्षक की पहल पर रविवार की दोपहर राजस्थान की पुलिस मेवात के फिरोज़पुर झिरका थाने पहुँची जहां असलम का बयान दर्ज किया गया.

अलवर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अनिल बेनीवाल का भी कहना है कि अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि रकबर और असलम वाक़ई तस्कर ही थे. फ़िलहाल दोनों गायों को रामगढ़ की ही एक गौशाला में रखा गया है.

Image caption रकबर के पिता सुलेमान

मगर इसी बीच पुलिस ने रकबर के ख़िलाफ़ वर्ष 2014 में भी गौ तस्करी से संबंधित दर्ज की गयी एक प्राथमिकी का हवाला भी दिया है.

रकबर और असलम नूह के फ़िरोज़पुर झिरका स्थित कोलगांव के रहने वाले हैं. रकबर के भाई इरशाद ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि उन्हें भी मौत के कारणों का पता नहीं चल पाया है.

उन्होंने कहा, "क्या हुआ था हमें कुछ नहीं पता. हमें तो सिर्फ़ मौत की ख़बर दी गई. किसने मारा, कैसे मारा, अभी तक पता नहीं चल पाया है."

पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट में रकबर को गंभीर चोटों की बात कही गई है. उनकी पसलियां टूट गई थीं जिससे फेफड़ों में पानी भर गया था. इसके अलावा भी पूरे शरीर में चोटों के निशान बताए गए हैं.

गर्भवती हैं रकबर की पत्नी

कोलगांव में इससे पहले इतना मातम का माहौल पहले कभी नहीं था. 500 घरों के इस इलाक़े में शायद ही कोई घर हो जहां रविवार को खाना पका हो.

तेज़ बारिश के बावजूद रकबर के घर लोगों का आना जाना लगा रहा. रकबर की उम्र 28 साल बताई जाती है.

रकबर की पत्नी असमीना गर्भवती हैं. वो रो-रो कर बार बार बेहोश हो जाती हैं. असमीना की माँ उन्हें संभालने की कोशिश में लगी हैं मगर उनका बुरा हाल है.

रकबर के पिता सुलेमान कहते हैं की मूलतः उनका दूध बेचने का ही काम है.

'मना किया था, अलवर मत जाओ'

रकबर के पास तीन गाय पहले से मौजूद हैं और वो अपने काम को बढ़ाने के लिए दो और दूधारू गाय ख़रीदने अलवर गए थे.

सुलेमान ने कहा, "हमने बहुत मना किया कि हालात ठीक नहीं हैं. अलवर मत जाओ. मगर वो कहता रहा कि कुछ नहीं होगा. काश वो मेरी बात मान लेता."

वहीं असलम ने बताया कि वो गायों को पिकअप वाहन से लेकर आना चाह रहे थे, लेकिन पिकअप पर गाय बिदक जा रही थीं. इसलिए वो रोड के रास्ते ही अपने गाँव लौट रहे थे.

उनके गाँव से रामगढ की दूरी ज़्यादा नहीं है, इसलिए वो आश्वस्त थे कि सब उन्हें पहचानते हैं और कोई उन पर हमला नहीं करेगा.

नूह के विधायक ज़ाकिर हुसैन बताते हैं चूँकि पूरे मेवात के इलाक़े में ज़मीनी जलस्तर काफ़ी नीचे है, सदियों से यहाँ के लोगों की आजीविका का एक ही सहारा है - गोपालन और दूध का व्यवसाय.

वो बताते हैं कि हिन्दुओं से ज़्यादा मेवात के मुसलमान गोपालन करते हैं और गोधन का संरक्षण भी. हरियाणा की विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष आज़ाद मुहम्मद भी रामलीला समिति और गोशाला समिति के आजीवन सदस्य हैं.

Image caption असलम किसी तरह से अपनी जान बचा पाए हैं

वो कहते हैं कि मेवात के इलाक़े में हिन्दुओं और मुसलामानों के बीच कभी गौपालन को लेकर कोई विवाद रहा ही नहीं. गौरक्षा के नाम पर हो रहीं हिंसक घटनाओं का केंद्र राजस्थान ज़्यादा है.

कोलगांव में मेरी मुलाक़ात भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रदेश सचिव सुरेंद्र सिंह कहते हैं कि जो कुछ राजस्थान और हरियाणा में गौरक्षा के नाम पर हो रहा है वो अचानक घटित घटनाएं नहीं हैं. वो इस संगठित तरीके से किए जा रहे काम की संज्ञा देते हैं.

वो कहते हैं, "मेवात के लोगों को अपनी देशभक्ति का सर्टिफ़िकेट देना पड़ रहा है जिनके पूर्वजों ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़ाई में बड़ी तादाद में अपनी जाने दीं हैं. ये कभी बाबर की फौजों से लड़े तो कभी अकबर की. आज इन्हें शक की नज़रों से देखा जा रहा है जो दुर्भाग्यपूर्ण है."

अलवर के बहरोर में सबसे पहले पहलू ख़ान की गौरक्षक दलों द्वारा पीट पीट कर हत्या कर दी गयी थी. ये घटना 13 अप्रैल, 2017 की है.

इसके बाद अलवर के ही मरकपुर में उम्मार ख़ान की हत्या 9 नवंबर वर्ष 2017 को हुई जबकि इस साल 21 जुलाई को रकबर की.

भीड़ के हाथों क़त्ल

सरकारी आंकड़ों के अनुसार पहलू ख़ान से लेकर रकबर की हत्याओं के बीच उन्मादी भीड़ ने भारत के विभिन्न प्रांतों में कुल मिलाकर 44 लोगों की हत्या की है.

झारखण्ड में उन्मादी भीड़ ने 13 लोगों को मार डाला है, जबकि महाराष्ट्र में आठ लोग मारे गए.

तमिलनाडु और त्रिपुरा में पांच-पांच लोग मारे गए हैं. तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक गुजरात और असम भी अछूते नहीं है.

Image caption नूह के विधायक ज़ाकिर हुसैन

हाल ही में वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा तब विवाद में फँस गए जब उन्होंने गौरक्षा के नाम पर हत्या करने के आरोपियों की जेल से रिहाई के बाद उनका माला पहनाकर और मिठाई खिलाकर स्वागत किया था.

हालांकि अलवर में शक्रवार की देर रात हुई घटना थोड़ी अलग है. इस घटना की निंदा के साथ साथ राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने अधिकारियों को आरोपियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं.

Image caption रकबर की गर्भवती पत्नी रह-रहकर बेहोश हो जा रही हैं

हालांकि बीजेपी के विधायक ज्ञान देव आहूजा ने जिस तरह से स्थानीय पुलिस पर सवाल उठाए हैं, उसे देखते हुए मुख्यमंत्री ने जयपुर रेंज के क्राइम एंड विजिलेंस विभाग के एसीपी स्तर के अधिकारी को जांच का ज़िम्मा सौंपा है.

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