ग्राउंड रिपोर्टः बिहार में कितना रिस्की है आरटीआई एक्टिविस्ट होना

  • 24 जुलाई 2018
सूचना का अधिकार, आरटीआई,​ बिहार, आरटीआई कार्यकर्ता इमेज कॉपीरइट manish saandilya/bbc
Image caption आरटीआई ऐक्टिविस्ट बाल्मीकि यादव

"इसको गोली मार दो. बहुत बड़ा कागज़ी आदमी है, ज़िंदा रहने पर हम लोगों को चैन से जीने नहीं देगा." आरटीआई एक्टिविस्ट बाल्मीकि यादव के क़त्ल की एफ़आईआर में ये बात दर्ज है.

बाल्मीकि के परिजनों का आरोप है कि आरटीआई के तहत लगातार जानकारियां मांगे जाने के कारण ही उनकी हत्या हुई. जमुई ज़िले की पुलिस को भी शुरुआती जांच में ऐसे ही तथ्य मिले हैं.

जैसा कि जमुई के एसपी जेजे रेड्डी बताते हैं, "प्रांरभिक जांच से ये बात सामने आई है कि मुखिया के ख़िलाफ़ आरटीआई डालने के कारण ही बाल्मीकि यादव की हत्या हुई है."

बिहार में मारे गए आरटीआई कार्यकर्ताओं की एक लंबी फेहरिस्त है.

बाल्मीकि यादव की मौत इसी साल की एक जुलाई को हुई है.

इसके पहले 19 जून को मोतिहारी के 65 वर्षीय आरटीआई कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह को अज्ञात लोगों ने गोली मार दी थी.

इमेज कॉपीरइट manish saandilya/bbc
Image caption बाल्मीकि यादव के क़त्ल की एफ़आईआर

अप्रैल में वैशाली ज़िले के जयंत कुमार भी अज्ञात हमलावरों का शिकार हो गए थे.

बिहार में सूचना का अधिकार क़ानून पर काम कर रहे संगठनों का दावा है कि सूबे में आरटीआई क़ानून लागू होने के बाद से अब तक 14 आरटीआई कार्यकर्ता अपनी जान गंवा चुके हैं.

इनमें से तीन की हत्या तो इसी साल बीते चार महीनों के दौरान हुई है. जमुई का मामला इनमें से सबसे ताज़ा है.

जमुई में गोली मार कर हत्या

बिहार के जमुई शहर में नेशनल हाइवे नंबर 333ए पर क़रीब 20 किलोमीटर आने बढ़ने के बाद विछवे गांव आता है.

इसी विछवे गांव में एक जुलाई को सूरज डूबने से थोड़ी देर पहले बाल्मीकि यादव और उनके साथी धर्मेंद्र यादव, दोनों की गोली मार कर हत्या कर दी गई.

बाल्मीकि की हत्या के क़रीब दो हफ़्ते बाद उनकी पत्नी और बेटे पर इस घटना का इतना सदमा था कि वो कुछ बातचीत नहीं कर सके.

बाल्मीकि के 54 वर्षीय चाचा सरयुग यादव ने इस कत्ल की एफ़आईआर दर्ज कराई थी.

इमेज कॉपीरइट manish saandilya/bbc
Image caption बाल्मीकि यादव के भाई और बेटा

बाल्मीकि के परिजनों का आरोप

सरयुग यादव बताते हैं, "यूं तो बाल्मीकि ने बहुत पहले ही जानकारी पाने के लिए आरटीआई का इस्तेमाल करना शुरू किया था. लेकिन बीते क़रीब ढाई साल से वो ज़्यादा एक्टिव हो गए थे. पहले उन्होंने मनरेगा के तहत हुए काम, तालाब खुदाई जैसे कार्यों के बारे में जानकारी मांगी थी."

"फिलहाल उन्होंने ज़मीन अतिक्रमण और सामुदायिक भवन निर्माण से जुड़ी जानकारियों के लिए आवेदन दे रखा था. उनके इन कामों के चलते उन्हें पहले भी हत्या की धमकी मिली थी."

वहीं, एक जुलाई को हुई घटना के बारे में सरयुग कहते हैं, "एक तारीख को धर्मेंद्र मोटरसाइकिल से घर पर बीज पहुंचाकर बाल्मीकि को लाने रोड पर गए. दोनों मोटरसाइकिल से लौट रहे थे. पहले उन्हें रॉड से मारकर गिरा दिया गया. इसके बाद वहां मौजूद नौ लोग लाठी और रॉड से उन्हें मारने लगे. और फिर दोनों की गोली मार कर हत्या कर दी गई."

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
भारतीय पत्रकारिता में आरटीआई के इस्तेमाल पर चर्चा

आरटीआई कार्यकर्ता होना इतना जोखिम भरा क्यों

सूचना के अधिकार के लिए काम करने वाली ग़ैर सरकारी संस्था 'एनसीपीआरआई' के आशीष रंजन कहते हैं, "आरटीआई कार्यकर्ताओं को पुलिस का सहयोग नहीं मिलता. वो आम तौर पर किसी नेटवर्क से भी जुड़े हुए नहीं होते. इन सब वजहों से वो कमज़ोर और अलग-थलग पड़ जाते हैं और कई बार उनकी हत्या तक कर दी जाती है."

तो क्या उन्हें सुरक्षा मुहैया करा देने से हालात बदल जाएंगे? पूर्व सूचना आयुक्त शैलेश गांधी इससे इत्तेफाक़ नहीं रखते.

वो कहते हैं, "ये सिर्फ़ आरटीआई वालों के साथ नहीं हो रहा है. जो भी सिस्टम या भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ते हैं, उनके साथ ये हो रहा है. सुरक्षा पूरे समाज के लिए होनी चाहिए, सिर्फ़ आरटीआई वालों के लिए अलग से नहीं हो सकती."

लेकिन मध्यप्रदेश के व्यापमं मामले से सुर्खियों में आए व्हिसलब्लोअर डॉक्टर आनंद राय शैलेश गांधी से सहमत नहीं दिखते.

उनकी राय में, "किसी सूबे में आरटीआई के लिए काम करने वाले सक्रिय कार्यकर्ताओं की संख्या इतनी ज़्यादा भी नहीं होती कि उन्हें सुरक्षा नहीं मुहैया कराई जा सके."

इमेज कॉपीरइट manish saandilya/bbc
Image caption बिहार के जमुई शहर में नेशनल हाइवे नंबर 333ए पर करीब बीस किलोमीटर आने बढ़ने के बाद विछवे गांव आता है

व्हिसलब्लोअर की सुरक्षा का मुद्दा

आरटीआई एक्ट लोगों को सरकार और प्रशासन से सवाल पूछने का हक़ तो देता है लेकिन जवाब मांगने के बाद उनकी सुरक्षा की गारंटी नहीं देता है.

ऐसे में व्हिसलब्लोअर एक्ट का जिक्र आता है, जिससे ये उम्मीद की जा रही थी कि समाज के हित में सिस्टम के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले शख़्स को सुरक्षा मिलेगी.

लेकिन, डॉक्टर आनंद राय बताते हैं कि व्हिसलब्लोअर एक्ट, 2011 राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद भी पिछले चार साल से नोटिफ़ाई होने का इंतज़ार कर रहा है. इस सूरत में ये सवाल उठना लाज़िम है कि आख़िर सरकारें ईमानदार क्यों नहीं हैं?

शैलेश गांधी इसका जवाब देते हैं, "जो भी सत्ता में हैं, वो आरटीआई नहीं चाहते लेकिन जो विपक्ष में हैं उन्हें आरटीआई बहुत अच्छी लगती है."

इमेज कॉपीरइट RTI.GOV.IN

आरटीआई क़ानून में प्रस्तावित संशोधन

संसद के मॉनसून सत्र में ये बात उठी कि सरकार आरटीआई क़ानून में संशोधन लाने जा रही है.

शैलेश गांधी बताते हैं, "अभी जो संशोधन प्रस्तावित हैं, वो लागू हुए तो सूचना आयुक्तों की सैलरी से लेकर ओहदे और कार्यकाल तक की शर्तें केंद्र सरकार तय करेगी."

आरटीआई क़ानून के मुताबिक़ सूचना आयुक्तों का दर्जा (प्रोटोकॉल) और सैलरी सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर है. ये सवाल पूछा जा सकता है कि सूचना आयुक्त कितने खुदमुख़्तार होकर काम कर पाते हैं.

शैलेश गांधी का कहना है कि 80 से 90 फीसदी कमिशनरों की राजनीतिक नियुक्ति होती है. जो स्वतंत्र होकर काम करते हैं, अब शायद सरकार उन्हें नियंत्रित कर पाए. लेकिन, प्रस्तावित संशोधन का क्या सिर्फ़ इतना ही मक़सद है?

वो कहते हैं, "इसका बड़ा संकेत ये है कि अगर ये संशोधन हो गया तो आगे चलकर वो और बड़ा संशोधन करेंगे क्योंकि सिर्फ़ इतने के लिए संशोधन लाने का कोई मतलब नहीं दिखाई देता."

इमेज कॉपीरइट AFROZ AALAM SAHIL/ BBC

आरटीआई कार्यकर्ताओं की मुश्किलें

हत्या के साथ-साथ सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करने के कारण आरटीआई कार्यकर्ताओं को दूसरी कई तरह की परेशानियों और उत्पीड़न का सामना भी करना पड़ता है.

नवादा ज़िले के आरटीआई कार्यकर्ता प्रणव कुमार चर्चिल बताते हैं, "सूचनाएं मांगने के बाद मुझे धमकी मिलने लगी. सुरक्षा मुहैया कराने के लिए जब मैंने आवेदन दिया तो मुझे भुगतान के आधार पर सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश दिया गया."

वहीं, वैशाली ज़िले के नागेश्वर राय के साथ हुआ ताज़ा मामला थोड़ा अलग है. सूचना मांगने पर संबंधित अधिकारी ने उन पर सरकारी दस्तावेज़ चोरी करने का मामला दर्ज़ करा दिया.

हालांकि, ज़िले की विकास योजना पदाधिकारी वंदना नागेश्वर राय पर ये आरोप लगाती हैं कि रजिस्टर चोरी और आरटीआई के जरिए उन पर अवैध बहाली का दबाव बनाया जा रहा है.

आरटीआई आवेदनों के बारे में एक आरोप ये लगाया जाता है कि परेशान करने, काम में बाधा डालने और यहां तक कि वसूली करने के लिए इनका इस्तेमाल किया जाता है.

शैलेश गांधी के शब्दों में "हरेक क़ानून के बेजा इस्तेमाल के मामले सामने आते हैं. आरटीआई क़ानून का बेजा इस्तेमाल करने वाले भी मुठ्ठी भर लोग हैं. हालांकि, ऐसा होना नहीं चाहिए."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)