मुजफ़्फ़रपुर: बकरी चराने से शुरू हुआ विवाद दो बच्चों की हत्या तक पहुंचा

  • 24 जुलाई 2018
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Image caption मृतक बच्चों के शव को राष्ट्रीय राजमार्ग पर रख किया गया प्रदर्शन

मुजफ़्फ़रपुर ज़िले के सरैया इलाके से गुज़रने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच-722 पर सोमवार की दोपहर को जाम लगा था. दो बच्चों की लाश एनएच पर रखकर लोग विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे. ये लाशें जमुना (बदला हुआ नाम) के बच्चों की थीं जो अपने लिए इंसाफ़ मांगतीं हुईं रह-रह कर गश खाकर गिर पड़ती थीं.

रविवार की शाम इन दोनों बच्चों की लाश इनके ही गांव के पास से गुजरने वाली एक बरसाती नदी के किनारे मिली थी. बच्चों के परिजनों का आरोप है कि उनकी दस साल की बेटी के साथ पहले कथित रुप से बलात्कार किया गया और फिर उसकी हत्या की गई. जबकि नौ साल के बेटे की आंखें फोड़ कर हत्या कर दी गई.

जमुना आरोप लगाती हैं कि उनके ही गांव के एक शख़्स और पड़ोस के गांव के दो लोगों ने मिलकर इस वारदात को अंजाम दिया है. जमुना के अनुसार इन लोगों के साथ उनके छोटे-मोटे विवाद हुए थे. जमुना ने बताया, 'वे कहते थे तुम्हारे घर में खून कर देंगे. उन लोगों ने मेरे दो बच्चों को उठा लिया, रेप किया और फिर छुरा भोंक कर मार दिया. आंख (बेटे का) फोड़ दिया.''

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Image caption इसी तालाब में परिजनों को अपने बच्चों के शव मिले

सभी अभियुक्त फ़रार

मारे गए बच्चों के पिता ने जो एफ़आईआर सरैया थाने में दर्ज़ करवाई है उसके आधार पर लाला ठाकुर, विकास कुमार ठाकुर और फरीद साईं को अभियुक्त बनाया गया है. एफ़आईआर के मुताबिक दस दिन पहले बकरी चराने के नाम पर जमुना और लाला ठाकुर के बीच विवाद हुआ था.

तीनों अभियुक्तों के ख़िलाफ़ हत्या और बलात्कार की धाराओं के तहत एफ़आईआर दर्ज़ की गई है. साथ ही उन पर पोक्सो एक्ट के तहत भी मामला दर्ज़ किया गया है. लेकिन तीनों अभियुक्तों में से किसी की भी गिरफ़्तारी अभी तक नहीं हो पाई है.

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स्थानीय पुलिस के मुताबिक अब तक न तो हत्या के कारणों का पता चला है और न ही बच्ची के साथ बलात्कार किए जाने की पुष्टि ही हुई है, क्योंकि मृतकों से संबंधित मेडिकल रिपोर्ट नहीं मिली है.

हालांकि परिजनों ने बीबीसी के सामने बार-बार यह आरोप दोहराया कि बच्ची के साथ बलात्कार हुआ है. उन्होंने बताया कि उन्हें जब बच्ची की लाश मिली तो कमर के नीचे का बच्ची के निजी अंगों का हिस्सा खून से लथपथ था.

बलात्कार के मामले डेढ़ गुना से ज़्यादा बढ़े

बिहार में हाल के दिनों में बलात्कार और यौन शोषण की कई घटनाएं लगातार सामने आई हैं. जिनमें बलात्कार और यौन-उत्पीड़न के बाद उसका वीडियो वायरल करने की कई घटनाओं से लेकर सरकारी बालिका गृहों में रहने वाली बच्चियों के साथ हुईं बलात्कार और यौन-उत्पीड़न के मामले तक शामिल हैं.

जुमना के बच्चों का मामला जिस ज़िले का है उसी ज़िले के मुख्यालय शहर मुजफ्फरपुर के एक सरकारी बालिका गृह में हुए करीब तीस लड़कियों के यौन-शोषण का मामला अभी लगातार चर्चा में है.

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आंकड़ों की बात करें तो खुद बिहार पुलिस के आंकड़े भी बताते हैं कि बलात्कार की घटनाओं में वुद्धि हुई है. बिहार पुलिस ने इस साल अप्रैल तक के आंकड़े जारी किए हैं. बीते साल 2017 में जनवरी से अप्रैल के बीच जहां बलात्कार के 368 मामले सामने आए थे तो इस साल इन्हीं चार महीनों के दौरान ऐसे 428 मामले दर्ज हुए हैं.

साल 2018 के महीनों के बीच की तुलना तो और भी परेशान करने वाली है. शुरुआत के दो महीने जनवरी और फरवरी में जहां बलात्कार के 162 मामले सामने आए थे तो वहीं बाद के दो महीनों मार्च और अप्रैल में यह डेढ़ गुना से भी ज़्यादा बढ़कर 266 हो गए.

बीबीसी ने पटना स्थित एएन सिन्हा सामाजिक अध्ययन संस्थान के पूर्व निदेशक डॉक्टर डीएम दिवाकर से पूछा कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या-क्या करने की ज़रूरत है?

जवाब में डीएम दिवाकर ने कहा, ''ये सामाजिक समस्याएं ज़्यादा हैं. इन्हें रोकने के लिए ज़रूरी सामाजिक चेतना और निगरानी का विस्तार नहीं हो रहा है. समाज से सचेत लोग इस काम में सामने आएं और साामाजिक पहरेदारी बढ़ाई जाए. जबकि सरकार को चाहिए कि वह बिना किसी भेदभाव के दोषियों को कड़ी-से-कड़ी सजा दिलवाए. साथ ही सरकार को अपने शासनतंत्र के ढीले-ढाले संरचनात्मक ढांचे को भी बदलना चाहिए.''

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