34 रुपए महीने किराया नहीं चुका पा रही है कांग्रेस

  • 24 जुलाई 2018
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जिस शहर कांग्रेस कमेटी की पहली अध्यक्ष कमला नेहरू रही हों, उसके बाद जवाहर लाल नेहरू, पुरुषोत्तम दास टंडन, विश्वंभर नाथ पांडेय, इंदिरा गांधी जैसे नामी-गिरामी लोगों ने इसकी अध्यक्षता की हो, जिसका कांग्रेस के इतिहास के अलावा आज़ादी के इतिहास में योगदान रहा हो, जो दुनिया के सबसे चर्चित राजनीतिक प्रेम-प्रसंगों में से एक का गवाह रहा हो, उस शहर कांग्रेस कमेटी को सिर्फ़ इसलिए तत्काल भवन ख़ाली करने का नोटिस मिल जाए कि वो 34 रुपये प्रतिमाह का क़िराया वर्षों से अदा नहीं कर रहा है, तो ज़ाहिर तौर पर ये हैरान करने वाला है.

इलाहाबाद के चौक इलाक़े में 34, जवाहर स्क्वॉयर के पहले तल पर स्थित शहर कांग्रेस पार्टी का दो कमरों का दफ़्तर बेदख़ली के नोटिस से उतना परेशान नहीं है जितना कि इसकी ऐतिहासिकता के ख़त्म हो जाने की आशंका से.

पतली सीढ़ियों से चढ़ने के बाद एक बड़े से हॉल में बैठने की व्यवस्था वैसी ही है जैसी कि कांग्रेस के अन्य पुराने दफ़्तरों में, यानी ज़मीन पर गद्दा और उसके ऊपर सफ़ेद चादर बिछी है, दो चौकियां लगी हैं और दीवारों पर तमाम तस्वीरें और पुराने पदाधिकारियों के नाम की सूची इत्यादि.

दफ़्तर में बैठे कांग्रेस के नेताओं से जब इस विषय पर बात हुई तो उनका कहना था कि क़िराये का ये मामला कोई विवाद नहीं है बल्कि संवादहीनता का नतीजा है.

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1932 में बना था दफ़्तर

शहर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे अभय अवस्थी बताते हैं, "ये मामला कोर्ट में है और वहीं से इसके मालिक ने नोटिस भिजवाया है. पार्टी किराया दे देगी. प्रदेश कांग्रेस कमेटी और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी को ये सूचना दे दी गई है. वहां से किराये की राशि आ जाती है तो ठीक, नहीं तो पार्टी कार्यकर्ता चंदा लगाकर दे देंगे. ये कोई बड़ा मसला नहीं है."

अभय अवस्थी बताते हैं कि शहर कांग्रेस कमेटी का ये दफ़्तर 1932 में बनाया गया था और ये न सिर्फ़ कांग्रेस का बल्कि भारत में किसी भी राजनीतिक पार्टी का सबसे पुराना दफ़्तर है.

वे बताते हैं, "स्वराज भवन में कांग्रेस की बैठकें होती थीं और 1905 में मोतीलाल नेहरू ने उसे दान में ज़रूर दे दिया था लेकिन वो एक ट्रस्ट की ही संपत्ति थी. इसका मतलब ये कि मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस की बैठकों के लिए उस स्थान को दिया था. लेकिन दफ़्तर के तौर पर यही जगह सबसे पहले बनी है."

आज़ादी के आंदोलन के समय और उसके काफ़ी बाद भी इलाहाबाद राजनीतिक आंदोलन का प्रमुख केंद्र था और इलाहाबाद में चौक का यह इलाक़ा ख़ास था. यही कारण है कि शहर कांग्रेस कमेटी के इस दफ़्तर के बाद इसके आस-पास ही सोशलिस्ट पार्टी का दफ़्तर बना और फिर बाद में यहीं कम्युनिस्ट पार्टी का भी दफ़्तर बना. दोनों दफ़्तर आज भी मौजूद हैं और वैसे ही बदहाल हैं जैसे कांग्रेस पार्टी का दफ़्तर बदहाल है.

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Image caption शहर कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष अभय अवस्थी

जहां तक किराया न देने का सवाल है तो ये मामला भी काफी उलझा हुआ है. दरअसल, पहले ये मकान जिसका था उन्होंने किन्हीं और को बेच दिया, शायद इसी से ग़लतफ़हमी पैदा हुई.

इस मामले को कांग्रेस पार्टी की ओर से अदालत में पैरवी कर रहे वकील अजय शुक्ल बताते हैं, "पहले ये मकान हृदयनाथ मेहरोत्रा का था और उन्होंने 1983 में इसे ख़ाली करने का नोटिस दिया था. इसको कांग्रेस पार्टी ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी और फ़ैसला कांग्रेस पार्टी के हक़ में आया. उस समय ये केस मेरे पिता जी देख रहे थे."

अजय शुक्ल बताते हैं कि उसके बाद मेहरोत्रा ने ये मकान कब और किसको बेचा, ये पता नहीं है. उनके मुताबिक, अभी कुछ दिन पहले जो नोटिस मिली भी है, उन मालिकों से भी संपर्क का प्रयास किया गया लेकिन संपर्क हुआ नहीं. अजय शुक्ल बताते हैं कि नोटिस राजकुमार सारस्वत और बिल्लू पुरवार की ओर से मिला है और हमारी जानकारी में ये मकान उन्हीं को बेचा गया था.

राजकुमार सारस्वत से हमने भी संपर्क करने की कोशिश की, भारती भवन के पास जो उनके घर का पता दिया गया था, वहां गए भी लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया.

कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारी भी कहते हैं कि एक तो क़िराया इतना ज़्यादा नहीं है कि इसे इतना तूल दिया जाए बल्कि ये सिर्फ़ कम्युनिकेशन न हो पाने के कारण लटका रह गया.

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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता इरशादुल हक़ कहते हैं, "कुल क़िराया 50 हज़ार रुपए के आस-पास आ रहा है, जिसे देने के लिए हमने केंद्र और राज्य इकाई को लिखा है. अभी वहां से कोई जवाब नहीं आया है लेकिन इतना किराया तो कांग्रेस के कार्यकर्ता चंदा लगाकर भी देने को तैयार हैं लेकिन क़िराया लेने वाले कोर्ट में पहले आएं तो. सिर्फ़ नोटिस भेजने से कोई फ़ायदा नहीं."

वहीं अभय अवस्थी कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी तो इसका किराया सर्कल रेट के हिसाब से भी देने को तैयार है क्योंकि 34 रुपए प्रति महीने का कोई मतलब नहीं है. उनके मुताबिक़ ये किराया जब तय हुआ रहा होगा, तब से अब तक बहुत समय हो चुका है.

लेकिन इस मामले में पार्टी की स्थानीय इकाई और इस दफ़्तर के ऐतिहासिक महत्व की कथित अनदेखी के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं में काफी नाराज़गी है.

बुज़ुर्ग नेता राजकुमार वर्मा कहते हैं, "बड़े अफ़सोस की बात है कि कई वर्षों तक हमारी पार्टी की केंद्र और राज्य में सरकार रही, पार्टी के नेता यहां इस दफ़्तर में बैठकर बड़े पदों पर पहुंचे, प्रधानमंत्री तक बने लेकिन किसी ने इतनी ज़रूरत भी नहीं समझी कि सिविल लाइंस जैसे इलाक़े में एक अदद पार्टी का छोटा सा दफ़्तर बनवा सकते."

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जवाहर स्क्वॉयर स्थित जिस भवन की पहली मंज़िल पर शहर कांग्रेस इकाई का ये दफ़्तर है, उसके नीचे की मंज़िल पर कुछ दुकानें हैं. इन दुकानों के मालिकों ने काफ़ी पहले इस हिस्से को ख़रीद लिया था और अब वे ख़ुद उसके मालिक हैं लेकिन कांग्रेस पार्टी का दफ़्तर किराए पर ही चलता रहा.

स्थानीय कांग्रेस नेता ये भी चाहते हैं कि उनकी पार्टी इसे उचित दाम देकर ख़रीद ले और इसे संग्रहालय में बदल दिया जाए क्योंकि ये कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है.

अभय अवस्थी बताते हैं, "हम लोगों ने अपने बड़े बुज़ुर्गों से ये भी सुना है कि इंदिरा जी और फ़िरोज़ गांधी की मुलाक़ात भी यहीं हुई और यहीं से उनकी क़रीबी भी बढ़ी. दरअसल, 1942 के आंदोलन के समय ये दफ़्तर क्रांतिकारी और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बन चुका था और उस समय फ़िरोज़ गांधी एक यूथ आइकन की तरह से चर्चित हो गए थे. फ़िरोज़ से उनकी मुलाक़ात सबसे पहले यहीं हुई."

बहरहाल, पार्टी की ऐतिहासिक यादें कितनी भी सुखद और गर्व करने वाली हों लेकिन आज सच्चाई ये है कि उसे पूरा किराया जमा करके मकान जल्द ही ख़ाली करना है और वो भी कोर्ट के निर्देश पर. पार्टी नेता किराया चुकाने को तो तैयार हैं लेकिन चाहते हैं कि ये मकान कांग्रेस पार्टी के ही पास रहे, क्योंकि ये उनके लिए एक ऐतिहासिक धरोहर है.

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