बंगाल में बीजेपी: आदिवासियों पर निगाहें, सत्ता पर निशाना

  • 25 जुलाई 2018
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अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल जीतने के लिए भाजपा आदिवासियों पर दांव लगाने जा रही है.

इसकी वजह भी है. बीते पंचायत चुनावों में हिंसा और चुनावी धांधली के तमाम आरोपों के बावजूद भाजपा का प्रदर्शन काफ़ी बेहतर रहा था और वह दूसरे स्थान पर रही थी.

उसके बाद पुरुलिया में अपने दो कार्यकर्ताओं की हत्या को भी भुनाने में पार्टी ने कोई कसर नहीं छोड़ी है.

बीते महीने पहले अमित शाह ने पुरुलिया में रैली की और फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेदिनीपुर में रैली की. अमित शाह अगले महीने फिर बंगाल दौरे पर आने वाले हैं.

इसके अलावा पार्टी अब उत्तर बंगाल के चाय बागानों में काम करने वाले आदिवासी चाय मज़दूरों को लुभाने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है.

उसने न्यूनतम मज़दूरी की मांग में आंदोलन का फ़ैसला किया है.

इलाक़े की लोकसभा की दो और विधानसभा की एक दर्जन सीटों पर बागान मज़दूरों के वोट ही निर्णायक हैं.

इस साल मार्च में त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में आदिवासी इलाक़ों की 20 सीटों ने ही भाजपा को सत्ता तक पहुंचाया था.

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पार्टी अब बंगाल में भी त्रिपुरा फ़ॉर्मूले का इस्तेमाल करना चाहती है.

उसने अगले साल होने वाले आम चुनावों को सेमी-फ़ाइनल और वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों को फ़ाइनल कहा है.

बंगाल के आदिवासी वोटर

पश्चिम बंगाल में आदिवासी दशकों से लेफ्ट फ़्रंट का वोट बैंक रहे हैं.

जलपाईगुड़ी कॉलेज में राजनीति विज्ञान की प्रोफ़ेसर रहीं मालती विश्वास बताती हैं, "चाय बागानों में ट्रेड यूनियनों के ज़रिए मज़बूत उपस्थिति की वजह से दशकों तक लेफ्ट फ़्रंट की तूती बोलती रही है. लेकिन साल 2011 के चुनावों में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद इन इलाक़ों में समीकरण बदले हैं."

"बागानों के लगातार बंद होने, मज़दूरों में भुखमरी और आदिवासी इलाक़ों में विकास नहीं होने की वजह से बढ़ती माओवादी गतिविधियों से आदिवासियों का लेफ्ट फ्रंट से मोहभंग तो वर्ष 2006 के विधानसभा चुनावों से ही शुरू हो गया था."

"चाय बागान मज़दूरों और आदिवासियों के लिए एकमुश्त दर्जनों योजनाएं शुरू कर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इन वोटरों का भरोसा हासिल किया था. लेकिन, अब तृणमूल के इस वोट बैंक में भाजपा सेंध लगाने लगी है."

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भाजपा का प्रदर्शन

हाल के पंचायत चुनावों में आदिवासी इलाक़ों में भाजपा का प्रदर्शन काफ़ी बेहतर रहा है.

उसने इन इलाक़ों में ग्राम पंचायतों की कई सीटें जीती हैं और कई जगह तृणमूल कांग्रेस के साथ उसका फासला काफ़ी कम हुआ है.

मिसाल के तौर पर कभी माओवादी गतिविधियों के लिए कुख्यात रहे झाड़ग्राम और पुरुलिया में भाजपा ने क्रमशः 42 और 33 फ़ीसदी सीटें जीती हैं जबकि पूरे राज्य में उसकी जीत का औसत 18 फ़ीसदी है.

इन दोनों इलाक़ों में आदिवासियों की आबादी क्रमशः 30 और 20 फ़ीसदी है.

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सीटों की तादाद

उत्तर बंगाल के चाय बागान इलाक़ों में लोकसभा की दो और विधानसभा की कम से कम एक दर्जन सीटें ऐसी हैं, जहां चाय बागान मज़दूरों के वोटों से ही हार-जीत तय होती है.

इसी तरह दक्षिण बंगाल के आदिवासी-बहुल ज़िलों में लोकसभा की कम से कम चार और विधानसभा की 20 सीटों पर आदिवासी वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं.

भाजपा की निगाहें इन सीटों पर ही हैं. भाजपा ने साल 2016 के विधानसभा चुनावों में अलीपुरद्वार ज़िले की एक आदिवासी-बहुल मदारीहाट सीट जीती थी.

यहां के भाजपा विधायक मनोज तिग्गा कहते हैं, "अब हम तमाम आदिवासी-बहुल इलाक़ों में यही करिश्मा दोहराना चाहते हैं. तृणमूल कांग्रेस से आदिवासियों का मोहभंग हो चुका है."

तिग्गा बताते हैं कि लेफ्ट फ़्रंट से लेकर तृणमूल कांग्रेस तक तमाम सरकारों ने आदिवासियों को खोखले आश्वसान देने के अलावा कुछ नहीं किया है.

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पंचायत चुनावों की कामयाबी

अपनी योजना को मूर्त रूप देने के लिए पार्टी इसलिए एक ओर जहां चाय मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी और दूसरी मूलभूत सुविधाओं की मांग में आंदोलन करने की रणनीति बना रही है.

वहीं, आने वाले दिनों में कई केंद्रीय नेताओं के भी इन इलाक़ों के दौरे का कार्यक्रम तय किया जा रहा है.

भाजपा को आदिवासी इलाक़ों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की ओर से चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं और उसके मज़बूत नेटवर्क का भी फ़ायदा मिल रहा है.

संघ वहां आदिवासी बच्चों के लिए कई स्कूल चला रहा है.

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "भाजपा को हमेशा संघ के कामकाज का फ़ायदा मिला है. उसके नेटवर्क के सहारे पार्टी आदिवासी इलाक़ों में अपने पांव मज़बूत करने की रणनीति पर बढ़ रही है."

"पार्टी बंगाल में सरकार बनाए बिना चैन से नहीं बैठेगी. हम पंचायत चुनावों की कामयाबी को जारी रखना चाहते हैं."

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ख़तरे की घंटी

घोष पंचायत चुनावों को तृणमूल कांग्रेस के अंत की शुरुआत बताते हैं.

वह कहते हैं, "लालगढ़ आंदोलन के बाद आदिवासियों के समर्थन से ही ममता सत्ता में आई थीं. लेकिन, अब ममता और उनकी पार्टी से आदिवासियों का मोहभंग हो गया है और वे भाजपा का समर्थन कर रहे हैं."

उन्होंने बताया कि पार्टी आदिवासी इलाक़ों में युवा नेतृत्व को बढ़ावा देकर अपना संगठन मज़बूत करने पर ख़ास ज़ोर दे रही है.

पंचायत चुनावों में आदिवासी-बहुल इलाक़ों में भाजपा के प्रदर्शन ने सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के लिए ख़तरे की घंटी बजा दी है.

यही वजह है कि नतीजों के फ़ौरन बाद ममता बनर्जी ने आदिवासी कल्याण मंत्री समेत अपने तीन मंत्रियों को मंत्रिमंडल से हटा दिया.

उन्होंने सीपीएम से निष्कासित सांसद ऋत्तब्रत बनर्जी की अगुवाई में एक आदिवासी कल्याण समिति का गठन कर दिया है इसमें आदिवासियों के कई प्रतिनिधि शामिल हैं.

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लोकसभा और विधानसभा चुनाव

भाजपा के राष्ट्रीय सचिव राहुल सिन्हा कहते हैं, "मंत्रियों को हटाने और नई समिति बनाने से साफ़ है कि तृणमूल कांग्रेस का नेतृत्व सदमे में है."

दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस महासचिव पार्थ चटर्जी कहते हैं, "पंचायतों की कुछ सीटें जीतने का कोई मतलब नहीं है."

"लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मुद्दे और समीकरण एकदम अलग होते हैं. राज्य के लोग ममता बनर्जी और उनकी नीतियों के साथ हैं."

जबकि राजनीतिक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चौधरी कहते हैं, "भाजपा नेतृत्व फिलहाल आदिवासी इलाक़ों में अपनी पकड़ मज़बूत करने और तृणमूल कांग्रेस के साथ फासला कम करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है."

"हाल के तमाम चुनावों और उपचुनावों में कांग्रेस और लेफ़्ट फ़्रंट को पीछे धकेल कर वह दूसरे नंबर पर तो पहले ही काबिज हो चुकी है. अब उसका मक़सद तृणमूल कांग्रेस के साथ अपने फासले को धीरे-धीरे पाटना है."

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