गुजरात के अहमदाबाद में भी है 'युगांडा कॉलोनी'

  • 25 जुलाई 2018
गुजरात के अहमदाबाद में भी है 'युगांडा कॉलोनी' इमेज कॉपीरइट Kalpit Bhachech

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन अफ़्रीकी देशों के पांच दिवसीय दौरे पर हैं. इस दौरान उनके रवांडा, युगांडा और दक्षिण अफ्रीका जाने का कार्यक्रम है.

भारत और अफ्रीका के बीच ऐतिहासिक रिश्ते हैं. अफ्रीकी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं.

लेकिन एक वक़्त था जब अफ्रीकी देश युगांडा से भारतीयों को जान बचाकर भागना पड़ा था.

1972 में युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन ने करीब 90 हज़ार एशियाई मूल के लोगों को देश निकालने का फ़रमान सुनाया था.

उस वक़्त कई गुजरातियों ने भारत लौटने का फ़ैसला किया, जबकि कई दूसरे भारतीयों ने यूरोप समेत दूसरे देशों का रुख़ किया.

युगांडा से लौटने वाले कई गुजराती अहमदाबाद में आकर बस गए. उनकी बस्ती को युगांडा कॉलोनी कहा जाने लगा.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

ईदी अमीन की कार्रवाई

72 साल की चीनू गज्जर अहमदाबाद की युगांडा कॉलोनी में रहते हैं. वो उस वक्त को याद करते हैं जब युगांडा के एशियाई मूल के लोगों के ख़िलाफ़ बड़ी कार्रवाई की गई थी.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "मैं 1967 में एक टेक्सटाइल कंपनी में काम करने के लिए युगांडा गया था. वहां के हालात सामान्य थे और लोगों का व्यवहार काफी दोस्ताना था. हमारे साथ कई गुजराती और एशियाई मूल के लोग काम करते थे."

उस वक्त युगांडा की सत्ता मिल्टन ओबोटे के हाथ में थी. 1971 में जब मिल्टन ओबोटे, राष्ट्रमंडल की बैठक में शामिल होने सिंगापुर गए हुए थे, तो ईदी अमीन ने उनका तख़्तापलट दिया.

ओबोटे की सरकार को हटाकर ईदी अमीन ने सैन्य शासन लागू कर दिया.

चीनू गज्जर बताते हैं, "ईदी बहुत ही क्रूर थे. उन्होंने तीन महीने में सभी एशियाई लोगों को निकालने का आदेश सुना दिया. तभी से हालात ख़राब हो गए."

इमेज कॉपीरइट Kalpit Bhachech
Image caption प्रद्युमन भट्ट बताते हैं कि युगांडा के सैनिक लोगों को भी उठाकर ले जाया करते थे, उनमें से कई लोग अब भी लापता हैं

युगांडा कॉलोनी में ही रहने वाले 75 साल के प्रद्युमन भट्ट ने बीबीसी से कहा, "मेरे पिता 1964 में युगांडा गए थे. वो वहां सरकारी शिक्षक हुआ करते थे. मैं दस साल की उम्र में युगांडा गया था."

"ईदी अमीन ने सत्ता अपने हाथ में लेते ही सभी अश्वेत लोगों के देश निकालने का आदेश सुना दिया. उनके इस आदेश के बाद हालात तनावपूर्ण और हिंसक हो गए. युगांडा के सैनिक ज़बरदस्ती घर में घुस जाया करते थे और जो चाहे वो उठा लिया करते थे. कई दूसरे लोगों की तरह ही हमने भी स्वदेश लौटने का फ़ैसला किया."

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
युगांडा: नरेंद्र मोदी के स्वागत की तैयारी

"अब भी कई लापता"

प्रद्युमन भट्ट कहते हैं, "युगांडा के सैनिक ना सिर्फ़ घरों से पैसा और सोना ले जाते थे, बल्कि वो लोगों को भी उठाकर ले जाया करते थे, उनमें से कई लोग अब भी लापता हैं."

वो कहते हैं, "हमने तुरंत युगांडा छोड़ने का फ़ैसला किया. हम कीनिया के रास्ते भारत लौट आए. कीनिया जाते वक्त हमें कई बार लूटा गया."

"आखिरकार हम कीनिया के मोम्बासा पोर्ट पहुंचे, जहां से हम शिप से भारत आए."

चीनू गज्जर ने कहा, "हम बाली से मोम्बासा ट्रेन से पहुंचे थे. ट्रेन में एशियाई मूल के कई लोग सवार थे, जो भारत जा रहे थे. लेकिन वो लोग ट्रेन में भी सुरक्षित नहीं थे क्योंकि सैनिकों ने ट्रेन में भी उन्हें लूटा. हम बड़ी मुश्किलों के बाद मोम्बासा पहुंचे थे."

"जो जहाज हमें भारत लाया, उसमें क़रीब 800 लोग थे. कुछ दिनों में हम मुंबई पहुंच गए."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

'हालात क्यों खराब हुए'

सत्ता में आने के बाद ईदी अमीन ने एशियाई समुदाय के सभी लोगों को युगांडा की जनगणना में अनिवार्य तौर पर पंजीकरण कराने का आदेश दिया.

एशियाई लोगों में ज़्यादातर भारतीय थे और उनमें भी गुजराती ज़्यादा थे.

एशियाई मूल के लोग जब तक ईदी अमीन का फ़ैसला समझ पाते, तब तक युगांडा की नागरिकता के लिए लगाई गई 12 हज़ार अर्ज़ियां रद्द कर दी गईं.

ओबोटे सरकार ने ब्रिटेन की सरकार से एशियाई मूल के 12 हज़ार लोगों को ब्रिटेन और युगांडा की दोहरी नागरिकता देने का समझौता किया था.

ईदी आमीन ने एशियाई समुदाय पर भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, हवाला, टैक्स चोरी और धोखाधड़ी का आरोप लगाया.

इमेज कॉपीरइट Kaplit Bhachech

'युगांडा कॉलोनी की स्थापना'

युगांडा से आए भारतीय जब मुंबई के तट पर पहुंचे, तो उन्हें नहीं पता था कि अब वो कहां जाएंगे. भारत की सरकार ने उन्हें शरणार्थियों की तरह अपनाया था.

प्रद्युमन भट्ट कहते हैं, "जब हम गुजरात आए तो हमारे पास रहने की कोई जगह नहीं थी. विश्व गुजराती ट्रस्ट से जुड़े विनोद चंद्र शाह ने युगांडा से आए इन शरणार्थियों की मदद करने का फ़ैसला किया."

उन्होंने कहा, "उस वक्त दिनेश चंद्र शाह गुजरात के वित्त मंत्री थे. उन्होंने भी इन शरणार्थियों को लेकर चिंता ज़ाहिर की थी. उन्होंने नगरपालिका आयुक्त एसके गंगोपाध्याय से इन लोगों को अहमदाबाद के मणिनगर में ज़मीन आबंटित करने की अपील की."

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
भारतीयों को युगांडा से किसने बाहर निकाला?

युगांडा कॉलोनी के बलवंत पटेल ने बीबीसी से कहा कि सरकार ने 1973 में मणिनगर में एक हाउसिंग सोसाइटी के लिए फंड का एलान किया और 1978 में घर बन गए.

इस सोसाइटी को दरियापार विश्व गुजराती बसाहट को-ऑपरेटिव सोसायटी नाम दिया गया, लेकिन इसे "युगांडा कॉलोनी" के नाम से ही जाना जाता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे