ये विधेयक बन गया है सेक्स वर्कर के लिए गले की फांस

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  • दिल्ली
सेक्स वर्कर, मानव तस्करी क़ानून

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"मुझे एक फ़ोन कॉल आता है, उनके बताए पते पर मैं जाती हूं, हम सेक्स करते हैं और फिर दोनों के रास्ते अलग-अलग. फिर शुरू हो जाता है अगले फ़ोन कॉल का इंतज़ार. अगला दिन भी ऐसे ही गुज़रता है. कभी इंतज़ार में तो कभी धंधे में. ये सब मैं अपनी आजीविका के लिए करती हूं. महीने में शायद 10 दिन काम मिलता है बाकी के दिन खाली बैठी रहती हूं"

सेक्स वर्कर के तौर पर अपनी मर्ज़ी से काम करने वाली कुसुम अपने बारे में खुल कर बात करती हैं.

कुसुम का कहना है कि क़ानून की नज़र में वो कोई ग़लत काम नहीं कर रही हैं. लेकिन मानव तस्करी के नए क़ानून से वो खफ़ा हैं. उनका मानना है कि इस क़ानून की वजह से वो अपनी ज़िंदगी सही तरीक़े से नहीं चला सकेंगी.

एड्स शब्द से परहेज़

ग़ुस्से में कुसुम कहती हैं, "लोगों को ऐसा लगता है कि देश भर में हम एड्स फैलाने वाली कोई मशीन हैं. नए क़ानून में हमारे लिए सीधे तौर कुछ नहीं कहा गया है. पर एक जगह लिखा है कि तस्करी कर लाए लोगों में जो कोई भी एड्स फैलाएगा उस पर भी ये क़ानून लागू होगा. साफ़ है कि इशारा हमारी तरफ़ है. नहीं तो मानव तस्करी के क़ानून में एड्स शब्द क्यों डाला जाएगा."

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मानव तस्करी क़ानून

व्यक्तियों की तस्करी (रोकथाम, सुरक्षा और पुनर्वास) बिल, 2018 में सरकार ने नए सिरे से तस्करी के सभी पहलुओं को परिभाषित किया है.

नई परिभाषा के मुताबिक़ तस्करी के गंभीर रूपों में जबरन मज़दूरी, भीख मांगना, समय से पहले जवान करने के लिए किसी व्यक्ति को इंजेक्शन या हॉर्मोन देना, विवाह या विवाह के लिए छल या विवाह के बाद महिलाओं और बच्चों की तस्करी शामिल है.

नए बिल के नए प्रावधानों के मुताबिक़ :

•पीड़ितों, शिकायतकर्ताओं और गवाहों की पहचान को गोपनीय रखना

•30 दिन के अंदर पीड़ित को अंतरिम राहत और चार्जशीट दायर करने के बाद 60 दिन के अंदर पूरी राहत देना

•एक साल के अंदर अदालत में सुनवाई पूरी करना

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•पकड़े जाने पर कम से कम 10 साल और अधिकतम उम्र क़ैद की सज़ा और एक लाख रुपए का जुर्माना

•पहली बार मानव तस्करी में शामिल होने पर सम्पत्ति ज़ब्त करने का अधिकार

•राष्ट्रीय जांच एजेंसी ( एनआईए) को तस्करी विरोधी ब्यूरो बनाना

•इतना ही नहीं पीड़ितों के लिए पहली बार पुनर्वास कोष भी बनाया गया है, जो पीड़ितों के शारीरिक, मनोवैज्ञानिक समर्थन और सुरक्षित निवास के लिए होगा.

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पुनर्वास पर आपत्ति

नए प्रावधानों को जब हमने कुसुम के सामने रखा तो उनका एक सवाल था, ' हमारी जीविका छीन लो और फिर कहो कि पुनर्वास करवा देंगे. ये कहां का इंसाफ़ है'?

वो आगे कहती हैं, ''सरकारी पुनर्वास का मतलब कौन नहीं जानता? हम सुधार गृह के किसी कोने में डाल दिए जाएंगे जहां हमारी सुध लेने वाला कोई नहीं होगा? हमें ऐसा सुधार नहीं चाहिए.''

कुसुम खुद एक सेक्स वर्कर तो हैं, साथ ही साथ वो ऑल इंडिया नेटवर्क ऑफ़ सेक्स वर्कर (AINSW) की अध्यक्ष भी हैं. ऑल इंडिया नेटवर्क ऑफ़ सेक्स वर्कर के मुताबिक़ देश में तक़रीबन 10 लाख सेक्स वर्कर हैं, जिनमें से तक़रीबन 80 फ़ीसदी अपनी मर्ज़ी से इस पेशे से जुड़ी हैं.

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कमेटियों से क्या मिलेगा?

AINSW की ओर से आरोप लगाए गए हैं कि सरकार ने क़ानून लाने के पहले न तो कोई रिसर्च की और न ही कोई स्टडी.

इस बिल से कुछ और आपत्तियां भी हैं.

उनके मुताबिक़ :

  • बिल में 10 नई कमेटियां बना दी गई हैं, कई पहले से भी मौजूद थीं. ये सिर्फ़ दिक्क़तों को और बढ़ावा देगा न कि तस्करी रोकने में मदद करेगा.
  • तस्करी रोकने के लिए पहले से मौजूद कई और क़ानून जैसे आईपीसी में धारा 370 तस्करी के लिए है. बंधुआ मज़दूरी के लिए भी कई क़ानून मौजूद हैं, इस नए क़ानून से किसी का भला होता नहीं दिखता.
  • ट्रांसजेंडर और सेक्स वर्कर को इस नए क़ानून के बाद ज़्यादा परेशान किया जाएगा.

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ट्रांसजेंडर भी साथ नहीं हैं

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बात सरहद पार

दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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समाप्त

यही बात बिहार की किन्नर कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष रेशमा भी कहती हैं.

उनका कहना है, "ट्रांसजेंडर के लिए भी नए क़ानून में कुछ साफ़ नहीं कहा गया है. हमारे यहां गुरू-शिष्या परंपरा सदियों से चली आ रही है. शिष्य एक गुरू से निकल कर दूसरे गुरू के पास जाते हैं तो उसमें पैसे का लेन देन भी होता है. अब इसे भी तस्करी से जोड़ कर देखा जाने लगेगा और पुलिस परेशान करने लगेगी."

लेकिन क्या अपनी आपत्तियों के बारे में किन्नर और सेक्स वर्कर समुदाय ने सरकार को बताया है?

रेशमा कहती हैं, "इस मुद्दे पर हम मेनका गांधी से मिले, सांसदों से मिले, कुछ सांसदों ने हमारी ओर से मंत्री को चिट्ठियां भी लिखी, लेकिन हाथ कुछ नहीं लगा. इसी सूरत में अगर ये क़ानून पास हो गया तो हमारे बुरे दिन शुरू हो जाएंगे."

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक़ 2016 में मानव तस्करी के कुल 8132 आंकड़े सामने आए थे जबकि 2015 में इनकी संख्या 6877 थी. राज्यों की बात करें तो 2016 में मानव तस्करी के सबसे ज़्यादा मामले पश्चिम बंगाल से सामने आए. दूसरे नंबर पर राजस्थान और तीसरे नंबर पर गुजरात था.

इन आपत्तियों के बीच सरकार संसद के इसी सत्र में ये बिल ले कर आ रही है.

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