मराठों को आरक्षण देने की प्रक्रिया के पेंच

  • 28 जुलाई 2018
मराठा ओबीसी आरक्षण

मराठा ओबीसी के तहत आरक्षण की मांग को लेकर एक बार फिर महाराष्ट्र की सड़कों पर उतरे. पिछले साल पूरे राज्य में शांतिपूर्ण जुलूस निकालने के लिए तारीफ़ बटोरने वाले मराठा इस बार आक्रामक नज़र आए.

मराठा प्रदर्शनकारियों के कारण महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को 23 जुलाई को पंधरपुर में होने वाली भगवान विट्ठल की पूजा रद्द करनी पड़ी.

औरंगाबाद में प्रदर्शन के दौरान काकासाहेब शिंदा नाम के एक प्रदर्शनकारी ने गोदावरी में छलांग लगा दी जिसके बाद उनकी मौत हो गई. इस मौत के बाद मुंबई समेत राज्य के कई हिस्सों में बंद का आह्वान किया गया था और इस दौरान हिंसा की भी ख़बरें आईं.

राज्य सरकार का कहना है कि वह मराठा आरक्षण के लिए हर संभव कोशिश कर रही है मगर मामला कोर्ट के पाले में है. जिस समय कोर्ट में अभी मामले की सुनवाई चल रही है और गलियों में आरक्षण के समर्थन वाले नारे गूंज रहे हैं, हमने बात की सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज बीपी सावंत से और मामले के क़ानूनी पहलू समझने की कोशिश की.

यह भी जानने की कोशिश की कि इसका महाराष्ट्र की राजनीति, यहां के सामाजिक ढांचे और आने वाली पीढ़ियों पर क्या प्रभाव होगा.

मराठा आरक्षण के लिए ऐसे क्या क़दम हो सकते हैं जो अदालत की कसौटी पर खरे उतर सकें?

अन्य पिछड़ी जातियों को संविधान के आर्टिकल 16 के तहत आरक्षण मिला है. यह प्रावधान शिक्षा और सरकारी क्षेत्र में उन जातियों के लिए सीटें आरक्षित करता है जो सामाजिक और शैक्षिक स्तक पर पिछड़ी हुई हैं.

इसलिए मराठों के लिए पहला क़दम तो यह होना चाहिए कि वे साबित करें कि वे सामाजिक और शैक्षिक स्तर पर पिछड़े हुए हैं. मराठों को पिछड़ा माना जाए या नहीं, यह देखने के लिए दो आयोगों का गठन किया गया था. दोनों ने अपनी रिपोर्टों में कहा कि मराठा सामाजिक रूप से पिछड़े या वंचित नहीं हैं.

अब ज़रूरी नहीं है कि सरकार इन रिपोर्ट्स को स्वीकार करे. सरकार अपना विचार स्वंतत्र तौर पर रख सकती है. दूसरा सवाल है कि मराठों को उस कोटा में कैसे शामिल किया जाए जिसे अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित किया गया है. अभी जो ओबीसी हैं, वे इस बात का विरोध कहते हैं क्योंकि मराठों को शामिल कर लिए जाने पर ओबीसी सीटों में उनकी हिस्सेदारी कम हो जाएगी. इसलिए महत्वपूर्ण सवाल ये है कि आरक्षित कोटा का प्रतिशत बढ़ाया जा सकता है?

हां, मगर समस्या एक ही है कि इसकी सीमा 50 फ़ीसदी है. मगर आज भी महाराष्ट्र में कुल आरक्षित सीटों की संख्या 52 प्रतिशत है. इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन हुआ है. कर्नाटक में तो 68 प्रतिशत आरक्षण है. तमिलनाडु ने भी 50 की सीमा को पार किया है.

अगर आप व्यावहारिक रूप में देखें तो 50 प्रतिशत की सीमा सामाजिक रूप से न्यायोचित नहीं है. इस देश में पिछड़ी जातियां देश की कुल आबादी की 85 फ़ीसदी हैं. और हमारे पास 85 फ़ीसदी आबादी के लिए 50 प्रतिशत ही आरक्षण है. ये समाज में विभाजन पैदा करता है. इसलिेए इस सीमा को बढ़ाया जा सकता है. इसके लिए कोर्ट में बहस होना ज़रूरी है. कोर्ट इस पर फ़ैसला करेगा.

आरक्षण कौन देगा? अदालतें या सरकारें?

पहले तो मराठा जाति को ओबीसी में डालना होगा. सरकार ऐसा कर सकती है औक पिछड़ा आयोग भी ऐसा कर सकता है. अब काम बचता है आरक्षित सीटों का. इसमें सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश बाधा है. मगर कर्नाटक और तमिलनाडु ने इस सीमा को पार कर दिया है. महाराष्ट्र भी ऐसा कर सकता है.

इसका बस एक दुष्परिणाम है कि इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जाएगी. मगर कोर्ट के सामने मज़बूत तर्क दिए जा सकते हैं और मनोवांछित परिणाम पाए जा सकते हैं. इसमें दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि अगर मराठों को ओबीसी में डाला गया तो क्या आरक्षित सीटें बढ़ाई जाएंगी? और अगर आप सीटें बढ़ाने में कामयाब रहे तो क्या वे बढ़ाई गई सभी सीटें मराठा जाति को दी जाएंगी?

संविधान कहता है कि कम किसी खास जाति या धर्म को आरक्षण नहीं दे सकते. ये सभी पिछड़ी जातियों के लिए है. आज जो पिछड़ी जातियां हैं वे उसी कोटा के अंदर प्रतियोगिता में रहते हैं. इसलिए मराठों को बढ़े हुए सीट शेयर का पूरा हिस्सा नहीं मिलेगा. अगर लिमिट बढ़ी तो मराठों को भी अन्य पिछड़ी जातियों के साथ उसे साझा करना होगा.

मराठा आरक्षण की मांग को देखते हुए सरकार ने जो फिर से पिछड़ा आयोग बनाया है, उसे आप किस तरह से देखते हैं?

यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि आयोग के सामने मराठा समुदाय को पिछड़ा साबित करे. सरकार साबित कर सकती है कि पिछले आयोग ने कुछ तथ्यों पर विचार किया था और अन तथ्यों पर विचार किया जाए तो मराठों को ओबीसी में डाला जा सकता है. यह नया बना आयोग है कि मुझे नहीं पता कि उन्होंने अब तक क्या काम किया है. इसलिए मैं इस बारे में और टिप्पणी नहीं कर सकता.

क्या आप मराठा समुदाय को ओबीसी में डाले जाने की क़ानूनी प्रक्रिया से खुश हैं?

मेरे विचार से तभी, जब इस मामले में कोई प्रगति हो. अगर इस मामले में कोई प्रगति करनी है तो हमें उस राह पह चलना होगा जिसका मैंने जिक्र किया है.

मगर, जब तक हम ऐसा समाज नहीं बनाते जहां सभी को रोज़गार और शिक्षा मिले, इस तरह की समस्याएं कभी हल नहीं होंगी, न तो अनुसूचित जाति या जनजाति के लिए और न ही ओबीसी के लिए. यह सिस्टम बदलना चाहिए. और चूंकि मराठा एक बहुसंख्यक समुदाय है, उन्हें समान और मानवीय अर्थव्यवस्था बनाने की पहल करनी होगी.

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