GROUND REPORT: आंबेडकर को एक दलित लड़के से जबरन गाली दिलाने की असल कहानी

  • 26 जुलाई 2018
दलित लड़के की पिटाई

वो बुधवार का दिन था. शाम का वक़्त. लवली दफ़्तर से वापस लौटे ही थे कि किसी का फ़ोन आया और वो घर से निकल गए.

शाम से रात हो गई, रात सुबह में तब्दील हो गई और फिर दोपहर हो आई. मां-बाप की बेचैनी बढ़ने लगी. लवली लौटकर नहीं आए, पर आया उनका एक वीडियो.

वीडियो में कुछ लोग लवली को मार-मारकर भीमराव आंबेडकर को भद्दी गालियां देने पर मजबूर कर रहे थे.

"उनमें से एक को मैं जानता था और उसके फ़ोन पर ही घर से निकला था, लेकिन फिर मुझे नशा खिला दिया गया और उसी हालत में पीट-पीटकर, बंदूक़ का डर दिखाकर मुझसे मेरी जाति मुर्दाबाद, जट्ट ज़िंदाबाद और आंबेडकर की मां के लिए अपशब्द कहने पर मजूबर किया गया."

यह कहते हुए दलित युवक लवली सहम जाते हैं. 18 जुलाई की उस घटना के निशान आज भी उनके चेहरे पर डूबते-उभरते नज़र आते हैं.

बुझा-बुझा सा चेहरा. उस रात को याद करते हुए झिझकती दबी-दबी सी आवाज़ जो बीच-बीच में "इंसाफ़ नहीं मिल रहा" की शिकायत करते हुए उत्तेजित हो उठती है.

परेशान पिता का हाल

इस बीच मां ओंकारी देवी और वृद्ध पिता सुरेंद्र कुमार के लिए ये समय क़यामत की घड़ी-सा गुज़रा जिस दौरान उन्होंने रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों से पूछताछ करने और पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने तक वो सब कुछ किया जो उनके बस में था. हालांकि बेटा किस हाल में है इसका समाचार उन्हें दो दिनों बाद ही मिल पाया और वो भी रेलवे पुलिस के माध्यम से.

स्थानीय थाने ने गुमशुदगी की रिपोर्ट की जांच का काम आला अधिकारी को बढ़ा दिया था.

रिटायर्ड पोस्ट ऑफ़िस कर्मचारी सुरेंद्र कुमार कहते हैं, "बेटा रात भर से ग़ायब था और इसी बीच लोगों ने मुझे इस वीडियो के बारे में बताया तो मैं बहुत परेशान हो गया. मैंने 19 जुलाई की रात पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाई."

सुरेंद्र कुमार के घर की बैठकी वाली जगह में दिवंगत पिता की ब्लैक-एंड-व्हाइट तस्वीर के बराबर ही शेल्फ़ पर आंबेडकर की फ़ोटो रखी है. एक नहीं, दो-दो.

अभी तक गिरफ़्तारी नहीं

"नशा खिलाए जाने," और होश में आने के बीच लवली की ज़िंदगी के पचास घंटे बीत चुके थे. तक़रीबन दो दिन से ज़्यादा का समय उन्हें बस एक काले साये की तरह याद है, सिवाए इसके कि कुछ लोगों ने उन्हें रिवॉल्वर की नोक पर उनके दलित समाज के सबसे बड़े आइकन भीमराव आंबेडकर को गाली देने पर मजूबर किया.

बड़े भाई अनुज कुमार कहते हैं, "उस दिन के बाद ये काम पर नहीं गया है, वैसे भी मालूम नहीं कि कब थाने से बुलाहट आ जाए, इन्हीं कुछ दिनों में तो तीन चक्कर लग चुके हैं."

अनुज बीएड करके नौकरी की तलाश में हैं. मैनेजमेंट की पढ़ाई कर चुके लवली गाडि़यां फ़ाइनैंस करनेवाली एक स्थानीय कंपनी में काम करते थे और घर में कमाने वाले अकेल सदस्य हैं.

ओंकारी देवी ने स्थानीय थाने में तीन लोगों के ख़िलाफ़ नामजद रिपोर्ट दर्ज करवाई है. इसमें कहा गया है कि लवली उनमें से एक का फ़ोन आने पर घर से गया था. अभी तक मामले में किसी की गिरफ़्तारी नहीं हुई है.

ड्रिंक में नशा मिलाया गया था?

लवली के गुमशुदा होने की रिपोर्ट पर कार्रवाई को लेकर मामले को सीनियर अधिकारी के पास बढ़ाने की वजह पर पुलिस सुप्रीम कोर्ट के हुक्म का हवाला देती है. सुप्रीम कोर्ट ने मार्च में आदेश दिया था कि अनुसूचित जाति और जनजाति क़ानून के भीतर कोई भी केस दर्ज किए जाने से पहले सर्किल ऑफ़सर स्तर का एक अधिकारी उसकी जांच करेगा.

अदालत के इस आदेश को दलित समाज ने अनुसूचित जाति और जनजाति उत्पीड़न क़ानून को कमज़ोर किए जाने के तौर पर लिया था और कुछ दूसरे मामलों के साथ इस पर दो अप्रैल को देशव्यापी दलित आंदोलन भी हुआ था.

पुलिस ये भी कह रही है कि तीनों अभियुक्तों से लवली की दोस्ती थी वरना रात में नहर के किनारे कौन खाने-पीने जाता है?

लवली मानते हैं कि तीन में से एक युवक से उनकी जान-पहचान थी और उसी ने उन्हें छोटे भाई को घर छोड़ने के नाम पर बुलाया था और ये सब हो जाने के बाद उसने ही उन्हें चाउमीन और ड्रिंक की दावत दी थी.

जब ये सब लेकर वो नहर की तरफ़ जाने लगे तो उन्होंने सवाल भी उठाया था, लेकिन उन्हें कहा गया कि बस पांच मिनट का काम है.

लवली बताते हैं, "वहां दो लोग और थे. मैं टॉयलट जाने के लिए वहां से थोड़ी देर को हटा और फिर जब वापस आकर कोल्ड ड्रिंक ली तो मझे बेहोशी-सी आने लगी जिसके बाद वीडियो वाली घटना पेश आई."

मेरठ कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर और दलित चिंतक सतीश प्रकाश सवाल करते हैं कि हो सकता है कि लवली की उस लड़के से जान-पहचान हो और वो सब साथ खा-पी रहे, हों लेकिन इससे किसी को ये अधिकार कैसे मिल जाता है कि वो किसी को डरा-धमकाकर और पीटकर अपनी जाति और बाबा साहब को बुरा-भला कहने को मजबूर करे?

ये पूछे जाने पर कि किसी दलित के ख़िलाफ़ सिख जट्ट समुदाय से जुड़े लोगों के ज़रिए इस तरह के हमले का ये पहला मामला है और ऐसा क्यों है, सतीश प्रकाश कहते हैं, "भारत में आप लोगों के भीतर से मज़हब तो निकाल सकते हैं लेकिन जाति नहीं."

स्थानीय दलित समुदाय लवली के साथ हुए हादसे को लेकर बेहद पीड़ित है और वो इसे सूबे की भारतीय जनता पार्टी की योगी आदित्यनाथ से जोड़कर देख रहे हैं. लवली के घर पर जमा लोगों में से एक ने हमसे कहा कि पहले की अखिलेश या दूसरी सरकारों के काल में ऐसा कभी नहीं हुआ था जो इस सरकार में हो रहा है.

बहुजन समाज पार्टी कार्यकर्ता ओंकार कहते हैं, "ये बाबा साहब को मानने वाला लड़का है, लोगों को उनसे जोड़ता रहा है, इसी की सज़ा दी गई है उसको."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)