क्या लौट पाएगा कश्मीरी सिल्क का जादू?

  • 29 जुलाई 2018
रेशम का धागा इमेज कॉपीरइट Majid Jahangir/BBC

भारत- प्रशासित कश्मीर में तीन दशकों के बाद एक बार फिर 120 साल पुरानी रेशम रीलिंग फैक्ट्री में धागा बुनते और रेशमी गुच्छे बनाते कारीगर नज़र आने लगे हैं.

आज से तीस साल पहले इस सरकारी फैक्ट्री में काम बंद कर दिया गया था. लेकिन बीते पचीस दिनों से यहां काम करने वाले कारीगर रेशम के गुच्छों से धागा निकालने में जुटे हैं.

फैक्ट्री एक बार फिर चालू कर दी गई है लेकिन तीस साल पहले वाली शान लौटने में वक्त लगेगा.

ग़ुलाम नबी बट बीते 38 सालों से कश्मीर के रेशम उद्योग से जुड़े हैं. 1975 में बट ने रेशम रीलिंग फैक्ट्री में काम करना शुरू किया था. 1989 तक वह मैकेनिक के तौर पर वहां काम करते थे.

गुज़रे ज़माने को याद करते हुए ग़ुलाम नबी बट कहते हैं कि वो ज़माना यहां रेशमी धागा बनाने का एक सुनहरा दौर था.

वो कहते हैं, "उस वक्त यहां दो शिफ्टों में काम होता था. सरकार को भी इस फैक्ट्री से काफ़ी फ़ायदा मिलता था. मुझे वो ज़माना भी याद है जब यहां बहुत कारीगर काम करते थे. मुझे ख़ुशी है कि एक बार फिर ये फैक्ट्री खुल गई है. लेकिन आज मैं यहां अकेला मैकेनिक हूँ."

"1989 से पहले हम यहां क़रीब चार मैकेनिक काम करते थे. मैं कभी-कभी रात के साढ़े दस बजे तक यहां काम करता रहता हूं क्योंकि मैं चाहता हूं कि फैक्ट्री में एक बार फिर वही जान आ जाए और इसे वही शान मिले जो अब से तीस बरस पहले थी. यहां कितना रेशम का धागा तैयार होता था उसका तो हिसाब लगाना भी मुश्किल है."

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कई कारण थे फैक्ट्री बंद करने के

साल 1989 में रेशम की इस फैक्ट्री को बड़े घाटे से दो चार होना पड़ा था जिसके बाद सरकार ने इसे बंद करने का फ़ैसला लिया था. श्रीनगर के सुलीना इलाके में मौजूद ये फैक्ट्री जाने माने लाल चौक से सिर्फ दो किलोमीटर की दूरी पर है.

अधिकारयों के मुताबिक़ ये फैक्ट्री 120 साल पुरानी है. रेशम की इस फ़ैक्ट्री को साल 1897 में शुरू किया गया था. फैक्ट्री के मैनेजिंग डायरेक्टर जावेद इक़बाल के अनुसार इसकी बुनियाद सर वालटन ने रखी थी. वो कहते हैं कि तीस साल पहले इसे बंद करने के कई कारण थे.

वो कहते हैं, "तीस साल पहले जब फैक्ट्री बंद हुई थी तो उस समय फैक्ट्री में कई लोगों को रोज़गार दिया गया था. लेकिन रेशम की क्वालिटी में गिरावट आ गई थी. यहां टेक्निकल स्टाफ की भी कमी थी. इसी तरह की छोटी-छोटी ग़लतियों की वजह से फैक्ट्री को बंद होना पड़ा था. जब इसे दोबारा चालू किया गया तो ये फ़ैसला लिया गया कि फिर से वही ग़लतियां ना हों जो पहले हुईं हैं."

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हालांकि फ़ैक्ट्री के इंचार्ज ग़ुलाम मोहम्मद बट कहते हैं कि कश्मीर में साल 1989 में जब हालात ख़राब होने लगे तो उसका सीध असर फैक्ट्री के कामकाज पर भी पड़ा और फैक्ट्री को बंद करना पड़ा.

इक़बाल कहते हैं कि अब हम उस अंदाज़ से फ़ैक्ट्री को चला रहे हैं कि पहले की तरह इसे फिर से बंद ना करना पड़े.

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हज़ारों परिवारों को पहुंचेगा फ़ायदा

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ इस समय कश्मीर घाटी में रेशमी गुच्छों की पैदावार के व्यवसाय से चालीस हज़ार परिवार जुड़े हैं, जिनसे फैक्ट्री के लिए माल ख़रीदने के लिए एक प्रोग्राम भी तैयार किया गया है.

जावेद इक़बाल कहते हैं, "जो चालीस हज़ार परिवार इस काम से जुड़े हैं उनमें महिलाओं की बड़ी तादाद है जो दूर-दराज़ इलाकों में रहती हैं. पहले होता ये था कि जिनके पास पैसा होता था वो लोग इन रेशमी गुच्छों की पैदावार करने वालों से फ़ायदा उठाते थे."

"अब हमने उनसे कहा है कि आप अपना माल हमें दिया करें और हम सीधा आपसे माल ख़रीदेंगे. इस वजह से मार्केट में इस रेशम के गुच्छों की क़ीमत में भी बढ़ोतरी आ गई है. और पैदावार करने वालों के साथ ग़लत तरीके से जो कुछ होता था वो भी अब फैक्ट्री आने के बाद खत्म हो गया है."

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जम्मू-कश्मीर राज्य में साल में हज़ार टन के क़रीब रेशमी गुच्छों की पैदावार की जाती है. साल 1961-62 में राज्य में रेशम की पैदावार 98,000 किलो रही है.

बीते पच्चीस दिनों में सुलीना की इस फ़ैक्ट्री में रेशमी गुच्छों से 200 किलो से भी ज़्यादा धागा तैयार किया गया है.

फ़ैक्ट्री में दोबारा जान डालने के लिए बाहर से कारीगरों को यहां लाया गया है.

फैक्ट्री के इंचार्ज ग़ुलाम मोहम्मद बट कहते हैं, "हम अभी ट्रेल बेसिस के लिए बाहर से कुछ कारीगर लाए हैं जिनकी संख्या दस है. ये कारीगर यहां के स्थानीय लोगों को भी ट्रेनिंग दे रहे हैं. हमने अपने विभाग के कुछ रिटायर्ड लोगों को भी लिया है जो यहां ट्रेनिंग दे रहे हैं."

फैक्ट्री के बंद होने के बाद से ग़ुलाम मोहम्मद बट इसकी देख-रेख करते रहे हैं. उनके मुताबिक़ न सिर्फ ये फैक्ट्री एशिया का सबसे बड़ा रेशम का केंद्र भी रहा है.

वो कहते हैं, "1980 में यहां क़रीब 3500 कर्मचारी काम करते थे. फिर आहिस्ता-आहिस्ता लोगों की संख्या घटती गई. कुछ लोग रिटायर्ड हो गए. कुछ लोग अब इस दुनिया में भी नहीं हैं. कुछ ने नौकरी छोड़ी और कईओं का तो तबादला हो गया."

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कश्मीर का रेशम दुनिया में नंबर वन था

बट के मुताबिक़ जब ये फ़ैक्ट्री बंद हो गई थी तो उस समय दिन में 120 किलो धागा रेशमी गुच्छों से निकाला जाता था.

वो कहते हैं, "जब दिन में 120 किलो धागा निकाला जाता था तो उस वक्त यहां तीन फिलाचर (कोकून से रेशम का धागा निकालने वाली मशीन) चलाए जाते थे. इस समय सिर्फ एक फिलाचार चल रहा है."

बट कहते हैं कि जब रेशम का कपड़ा तैयार होता है तो हमारे शोरूम में एक साड़ी की क़ीमत एक लाख तक भी हो सकती है. बंगाल से आए एक कारीगर मोहम्मद अली कहते हैं कि वो दिन भर क़रीब 9 से 14 किलो धागा निकाल लेते हैं.

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जावेद इक़बाल कहते हैं कि एक ज़माना था जब कश्मीर का रेशम पूरी दुनिया में नंबर वन माना जाता था.

कश्मीर और रेशम के रिश्ते को बयां करते हुए वो कहते हैं, "कश्मीर का रेशम एक ज़माने में कश्मीर की शान हुआ करता था. पूरी दुनिया में कश्मीर का रेशम नंबर एक था. यूरोप के देशों में इसका इस्तेमाल होता था."

"वो भी एक ज़माना था जब हमारे सोने के हाथ हुआ करते थे. हमारा जो रेशमी गुच्छा है उसकी खूबियां यहां के मौसमी हालात के कारण बढ़ जाती हैं. यहां चीनी रेशम भी है लेकिन जो रेशमी गुच्छा है ये और कहीं आसानी से नहीं मिलता. इसका हैरिटेज वैल्यू भी बहुत ऊँचा है."

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सुलीना मार्केट के अध्यक्ष मोहम्मद शाबान सिल्क फैक्ट्री के दोबारा खुलने से बहुत उत्साहित हैं. वो कहते हैं कि फैक्ट्री कब की मर गई थी लेकिन अब दोबारा सांस लेने लगी है.

वो कहते हैं, "हमारा बाज़ार इसी फ़ैक्ट्री की वजह से चलता था. यहां के दुकानदारों को इस फैक्ट्री से काफ़ी काम मिलता था. जब ये फ़ैक्ट्री चल रही थी तो इसमें काम करने वालों की इतनी तादाद थी, देखों तो जैसे बाज़ार से जुलूस निकलता था."

"घाटी के कोने-कोने से यहां लोग काम करने या फिर रेशम लेने आते थे. ये फ़ैक्ट्री तो रेशम के काम के लिए जैसे जन्नत थी."

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