बीजेपी सरकार से क्यों ख़फ़ा है ये हिंदू गांव?

  • 29 जुलाई 2018
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Image caption शिप्रा दास

"मेरे ससुर की उम्र 80 साल से ज़्यादा है. वो बीमार चल रहे थे, लेकिन काफ़ी दिनों से घर नहीं आए हैं. पता नहीं किसने उनके ख़िलाफ़ संदिग्ध नागरिक होने की शिकायत दर्ज करवाई है."

कांपती हुई आवाज़ में अपने ससुर के बारे में बात कर रही 34 साल की शिप्रा के चेहरे पर अपनी और उनकी नागरिकता को लेकर डर और चिंता साफ़ दिख रही थी.

असम के सिलचर शहर से क़रीब 35 किलोमीटर दूरी पर बसे भुबनखाल गांव में ज़्यादातर परिवार बंगाली हिंदुओं के हैं, लेकिन इनमें से आधों की नींद अपनी नागरिकता को लेकर उड़ी हुई है.

इनका दावा तो भारतीय नागरिक होने का है, लेकिन तमाम लोगों को विदेशी होने का नोटिस थमा दिया गया है.

शिप्रा के ससुर प्रद्यम्न दास भी उनमें से एक हैं और इन दिनों छिपते फिर रहे हैं.

असम में अपडेट की जा रही 'नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़नशिप' यानी एनआरसी की अंतिम सूची 30 जुलाई को जारी होनी है.

लेकिन जैसे-जैसे यह तारीख़ नज़दीक आ रही है, गांव के लोगों में अपनी नागरिकता गंवाने का डर बढ़ता जा रहा है.

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Image caption अबोला दास

'एनआरसी से नाम कट गया तो कहां जाएंगे?'

शिप्रा कहती हैं, "मेरे ससुर तो पिछले कई सालों से वोट भी डाल रहे थे. उनके नाम के आगे 'डी' वोटर अर्थात संदिग्ध मतदाता भी नहीं था, लेकिन अचानक एक दिन हमारे घर पर पुलिस आ गई. हमने पुलिस को समझाया कि वे बीमार हैं. काफ़ी समय तक गिड़गिड़ाने के बाद पुलिस कुछ दिनों की मोहलत देकर चली गई. उसके बाद से हमारा पूरा परिवार तनाव में है."

वो बताती हैं, "मेरे ससुर ने गांव में बीजेपी पार्टी के लिए काम भी किया है. फिर भी कोई हमारी मदद नहीं कर रहा. अगर हमारा नाम एनआरसी से कट गया तो हम कहां जाएंगे, मेरे आठ साल के बेटे का क्या होगा?"

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असम की इस महिला के पति के सामने नागरिकता बचाने की चुनौती

शिप्रा के ससुराल में उनके पति का बड़ा परिवार एक ही परिसर में बने अलग-अलग मकानों में रहता है, लेकिन अब वो अलग-थलग पड़ गए हैं.

उनकी सास अबोला दास इस परेशानी के चलते सदमे में हैं. उन्होंने बताया, "जीवन में ऐसी परेशानी कभी नहीं देखी. अब ईश्वर जो चाहेंगे वही होगा."

'पति नहीं हैं तो खाना-पीना मुहाल है'

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Image caption अर्चना दास

कुछ ऐसी ही कहानी शिप्रा के पड़ोस में रहने वाली 35 साल की अर्चना दास की भी है.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "मेरे पति का नाम रोंगेश दास है. हमारे वकील ने कहा था कि उन पर जो विदेशी होने का मामला था वो अब ख़त्म हो जाएगा, लेकिन उसके कुछ दिन बाद मेरे पति के नाम से वारंट जारी कर दिया गया."

"पुलिस मेरे पति को पकड़ने के लिए घर आ गई थी, लेकिन उस समय मेरे पति घर पर नहीं थे. लिहाज़ा पुलिस ने उन्हें सारे कागज़ात के साथ थाने बुलवाया था. मेरे पति काफ़ी डर गए थे और उसके बाद वो घर से गए और अब तक उनका कोई पता नहीं है. अब तो खाने पीने की तकलीफ़ परेशान करने लगी है. कोई उधार भी नहीं देता."

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Image caption अपनी नागरिकता से जुड़े कागजात दिखाते हुए प्रबुद्ध रंजन दास

आमराघाट से सटे भुबनखाल, मोहनखाल ऐसे गांव है जहां बंगाली बोलने वाले अधिकतर हिंदू लोगों का मामला विदेशी ट्राइब्यूनल में है और उनकी ज़िंदगी मुश्किलों से घिरी है.

इन सभी का आरोप है कि इस मुसीबत के समय प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार इनकी कोई मदद नहीं कर रही. प्रदेश सरकार में मौजूदा वन मंत्री इसी क्षेत्र से विधायक हैं.

इस इलाके में कपड़े की एक छोटी-सी दुकान चलाने वाले तपन कहते है, "जबसे गांव के कुछ लोगों को अवैध नागरिक होने के नोटिस भेजे गए हैं और एक-दो लोगों को पकड़ा गया है, लोग काफ़ी डर गए हैं."

"यहां तक कि जिनके पास अपनी नागरिकता से जुड़े पूरे कागज़ात हैं, उनके मन में भी डर आ गया है. इस वजह से कई लोग घर छोड़कर भाग गए हैं."

वो कहते हैं, "हमारे इलाके में जिन लोगों को नोटिस दिया गया है, उनमें ज़्यादातर हिंदू हैं. जिन लोगों को पकड़ कर डिटेंशन कैंम्प में डाल दिया गया है वो भी हिंदू हैं."

"सरकार तो बोलती है कि वो हिंदुओं का सपोर्ट करेगी, लेकिन कहाँ कर रही हैं? "इन लोगों के लिए तो कोई कुछ नहीं कर रहा. सबसे ज़्यादा परेशानी तो हिंदुओं को ही हो रही है."

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Image caption भुबनखाल में रहने वाले एक ग्रामीण

भाजपा सरकार से पूछे जा रहे हैं सवाल

ऐसा ही कुछ कहते है मोहनखाल गांव के मंटू दास,"हम तो हिंदू हैं और सरकार से हमें पूरी उम्मीद थी कि जो लोग बांग्लादेश से यहां कर बसे थे उन्हें कुछ नहीं होगा, लेकिन यह उम्मीद अब नहीं बची है. लोग डर रहे हैं उनकी ज़मीन और मकान का क्या होगा."

हालांकि प्रदेश की भाजपा सरकार ने इस तरह के सभी आरोपों से लगातार इनकार किया है और कहा है, "एनआरसी का काम एक क़ानूनी प्रक्रिया के तहत हो रहा है."

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Image caption अर्चना दास का घर

इधर अपने क्षेत्र के लोगों की नाराज़गी को स्वीकार करते हुए प्रदेश के वन मंत्री परिमल शुक्लवैद कहते हैं, "नागरिकता का जो यह मुद्दा है, इसमें हमारी पार्टी का कमिटमेंट रहा कि जो हिंदू लोग हैं वो यहीं पर रहेंगे."

"लेकिन जहां तक बात एनआरसी अपडेट करने की है वो सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में हो रहा है. इसलिए हम इसमें किसी तरह की दखलअंदाज़ी नहीं कर सकते. लोगों को इतना भरोसा दे सकता हूं कि नागरिकता संशोधन बिल जब संसद में पास हो जाएगा तब उनकी यह तकलीफ़ ख़त्म हो जाएगी."

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Image caption वन मंत्री परिमल शुक्लवैद

एक सवाल का जबाव देते हुए परिमल शुक्लवैद ने कहा, "जो लोग अपनी नागरिकता को लेकर परेशान हैं उन लोगों के मन में नाराज़गी ज़रूर है. 'डी' वोटर" और एनआरसी की समस्या को लेकर हम लोग भी हैरान हैं."

"लेकिन हमको इन लोगों की मदद करनी है, वो केवल कोर्ट के ज़रिए ही कर सकेंगे. मैं पुलिस को नहीं रोक सकता क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला है."

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