गुजरात में पानी-पूरी पर बैन का सच

  • 2 अगस्त 2018
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गुजरात के वडोदरा में गोल-गप्पे पर बैन लगाने की चर्चा सब जगह है. वडोदरा नगर निगम के ट्विटर हैंडल से हुए एक ट्वीट से इसकी शुरुआत हुई.

ट्वीट में उन्होंने लिखा है - "वडोदरा फ़ूड डिपार्टमेंट ने 50 पानीपूरी बनाए जाने वाली जगहों पर सरप्राइज़ चेकिंग की. 4000 किलो पानी-पूरी, 3350 किलो आलू और चना और 1200 लीटर पानी-पूरी का पानी ज़ब्त कर फेंका. शहर में दस्त और उल्टियों के मामलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए नगर निगम ने फ़ैसला लिया है कि इसकी बिक्री पर रोक लगाई जाए."

पूरा मामला क्या है?

राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक़, जुलाई के महीने में वडोदरा में 120 लोगों को दस्त और उल्टी की शिकायत की बात सामने आई थी. इसके बाद प्रशासन ने ये कदम उठाया.

मामला कितना गंभीर है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि हालात का जायज़ा लेने के लिए दिल्ली से नेशनल सेंटर फ़ॉर डिज़ीज़ कंट्रोल के दो सदस्य, जांच के लिए वडोदरा पहुंच गए. पिछले पांच दिनों से वो इलाके में सर्वे कर रहे हैं.

वडोदरा नगर निगम के इस ट्वीट के बाद गुजरातियों की तरफ़ से इस फ़ैसले पर तीखी प्रतिक्रिया आने लगी.

लेकिन वीएमसी के ऐलान के बाद कुछ लोगों ने ट्विटर पर लिखा "सरकार ने जितनी तत्परता इस स्ट्रीट फ़ूड को बंद करने में दिखाई, काश उतनी तत्परता समस्या के समाधान में भी दिखाई होती."

कुछ लोगों ने इसे स्ट्रीट फ़ूड वालों के साथ अन्याय बताया है.

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तो कुछ लोगों ने कहा कि नगर निगम वालों के इस फ़ैसले से ब्रांडेड पानी-पूरी बेचने वालों का फ़ायदा होगा.

इसके बाद वीएमसी के हेल्थ ऑफिसर डॉ मुकेश वैद्य ने बीबीसी को बताया, "वीएमसी ने ऐसी कई जगहों पर कार्रवाई की है जहां गंदे तरीक़े से तैयार की गई पानी-पूरी बिक रही थी. पानी-पूरी बेचने पर बैन नहीं है, लेकिन पानी-पूरी गंदे तरीक़े से बनाते और बेचते पाए गए तो उन दुकानदारों और स्ट्रीट फ़ूड वालों पर सख़्त कार्रवाई होगी."

जितनी मुंह उतनी बातें सामने आई. लेकिन क्या वाक़ई में गोल-गप्पे सेहत के लिए इतना ज़्यादा ख़तरनाक होता है?

इस सवाल के जवाब में डायटिशियन शालिनी सिंघल कहती हैं, "हमारे देश में लोगों का ये सबसे ज़्यादा पसंदीदा स्ट्रीट फ़ूड है. गोल-गप्पे खाने में कोई दिक्क़त नहीं है. गंदे तरीक़े से बनाए गए उसके पानी से तबियत ज़रूर बिगड़ सकती है. घर पर बनाकर इसे खाया जाए तो ये नुकसानदायक नहीं है. रोज़-रोज़ न खाए, कभी-कभार स्नैक्स के तौर पर इसका इस्तेमाल करें तो कोई दिक्क़त नहीं है."

दिल्ली में रहने वाली अपर्णा, डायटिशियन शालिनी की बात से पूरी तरह सहमत नहीं दिखती.

उनके मुताबिक, "गोल-गप्पे खाने का मज़ा तो गली-नुक्कड़ में लगे फुलकी वालों के यहां ही है. घर पर बनाए खाने में वो बात नहीं है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं की पानी ढका न हो, गोल-गप्पे प्लास्टिक से ढके न हों. इतना मैं ज़रूर देख लेती हूं. वडोदरा नगर निगम को बैन के बजाए इस बात पर ध्यान देना चाहिए था. "

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किसका कितना फ़ायदा

गुजरात मे गोल-गप्पे की बिक्री के तीन तरीक़े हैं. इस धंधे में कुछ छोटे व्यापारी हैं तो कुछ ब्रांडेड नाम भी शामिल हैं.

ब्रांडेड गोल-गप्पे बनाने वालों को इस धंधे पर सलाह देने वाले संजय चक्रवर्ती कहते हैं, "कुछ लोग गोल-गप्पे घर में बनाते हैं और पानी भी घर पर बनाते हैं. गुजरात के वडोदरा शहर में ऐसे व्यापारियों की संख्या ज़्यादा है. ऐसे लोग इस धंधे में 75 फ़ीसदी लागत से ज़्यादा कमाते हैं. लेकिन कुछ व्यापारी गोल-गप्पे बाहर से ख़रीदते हैं और पानी घर पर बनाते हैं. ऐसे व्यापारियों को इस धंधे में 50 फ़ीसदी का फ़ायदा होता है."

दिल्ली में गोल-गप्पों को ब्रांडेड नाम से बेचने वाले एक व्यापारी गिरिश ने बीबीसी को बताया, "हम किसी एक खाने के प्रोडक्ट पर फ़ायदा-नुक़सान नहीं जोड़ते. खाने की दुकान है, लोगों के टेस्ट के हिसाब से सब कुछ रखना पड़ता है. गोल-गप्पे भी उसी का हिस्सा है. हम तो इस बात का विशेष ख्याल रखते हैं कि हमारे यहां हर खाने में इस्तेमाल होने वाली हर चीज़ सेहतमंद हो. फिर चाहे वो गोल-गप्पे का पानी ही क्यों न हो."

वैसे गोल-गप्पे को अलग-अलग नाम से पूरे देश में जाना जाता है. बंगाल में फुचका, गुजरात और महाराष्ट्र में कई जगह पानी-पूरी, मध्य प्रदेश में पानी बताशा, उत्तर प्रदेश में फुलकी, बिहार में गुपचुप, महाराष्ट्र में कई जगह इस बटाटा-पूरी के नाम से जाना जाता है.

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कितने सेहतमंद होते हैं गोल-गप्पे?

डॉ. शालिनी के मुताबिक़ तीन गोल-गप्पे में एक रोटी जितनी कैलरी होती है, लगभग 70 कैलरी सूजी से बने और आटे से बने गोलगप्पे में कैलरी का बहुत ज्यादा अंतर नहीं होता.

इसका फ़ायदा कुछ नहीं होता सिवाय इसके कि 2-4 गोल-गप्पे में आपका पेट भर जाता है. लोग टेस्ट बड बदलने के लिए भी गोल-गप्पे खाते हैं.

क्या है इसके खाने का सही समय?

डॉ. शालिनी के मुताबिक़, अमूमन सुबह-सुबह इसे कोई नहीं खाता. दोपहर या फिर शाम को हल्के स्नैक के तौर पर इसका इस्तेमाल करने में कोई बुराई नहीं है. समोसा और कचौड़ी के मुक़ाबले ये ज़्यादा सेहतमंद स्नैक है.

तो फिर नुकसानदायक कैसे? इस पर डॉक्टर का कहना है कि गोल-गप्पे में नमक का इस्तेमाल ज़्यादा होता है. इसलिए दिल की बीमारी, एडिमा (जिनके शरीर में पानी रुकने की दिक्कत होती है), किडनी की दिक्क़त वाले, हार्मोनल प्रॉब्लम वालों को गोल-गप्पे न खाने की सलाह दी जाती है.

इसके आलावा गोल-गप्पे का पानी बनाने में, साफ़ पानी का इस्तेमाल न किया जाए तो पेट से जुड़ी बीमारियों का ख़तरा ज़्यादा होता है जैसे दस्त, पीलिया, टाइफॉयड.

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गोल-गप्पे का इतिहास

भारतीय व्यंजनों पर ख़ास पकड़ रखने वाले पुष्पेश पंत कहते हैं, गोल-गप्पे का इतिहास भारत में 100-125 साल से ज़्यादा पुराना नहीं है.

उनके मुताबिक़, "गोल-गप्पे का जन्म उत्तर प्रदेश और बिहार के आस-पास का है. इन इलाकों में जो पहले पूरी बनती थी वहीं से इस व्यंजन का जन्म हुआ है. इसलिए पहले इसे पानी-पूरी कहा जाता था. लेकिन बाद में आकार गोल और छोटा कर दिया गया जो एक बार में गप कर खाया जा सकता था. इसलिए इसे गोल-गप्पा भी कहा जाने लगा. बंगाल में जब ये पहुंचा तो लोगों ने इसे फुचका कह कर पुचकारा."

पुष्पेश पंत कहते हैं, "इसका कोई उल्लेख पुराने ग्रंथों या इतिहास में नहीं मिलता. ऐसा लगता है कि ये बनारस जहां चाट पकौड़ियां बनाने का रिवाज़ है वहां से निकल कर आया है. राज कचौड़ी इसका बड़ा रूप है. कई इलाकों में ये आटे और सूजी से बनाई जाती है. कई जगह इसके पानी के साथ अलग-अलग तरह के प्रयोग किए जाते हैं.

फिलहाल तो वडोदरा नगर निगम मुस्तैद है, ताकि गोलगप्पा खाकर बीमार पड़ने वालों की तादाद अब न बढ़े. लेकिन कुछ दिनों बाद पता चलेगा कि गोलगप्पा खाने वालों की संख्या घटी है या फिर बेचने वालों की.

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