ग्राउंड रिपोर्ट: इस अगस्त में बच्चों को बचाने के लिए कितना तैयार है गोरखपुर?

  • 11 अगस्त 2018
गोरखपुर , इंसेफेलाइटिस
Image caption बीआरडी मेडिकल कॉलेज का इंसेफेलाइटिस वार्ड

"अबकी तीसरी में गयी थी हमारी लड़की. पर स्कूल ही नहीं जा पाई. पहले ही ख़तम हो गयी. उस दिन हमने उसके लिए दाल का पीठ और खीर बनाई थी. बड़े प्यार से खाई और सो गई. फिर पता नहीं क्या हुआ उसे, अचानक रात को 12 बजे उठ के उल्टियाँ करने लगी."

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में इंसेफ़ेलाइटिस का शिकार हुई करीना की माँ अब भी बेटी का स्कूल बैग निहारती हैं. तीन दिन पहले ही घर में बच्ची की मौत हुई है मगर फिर भी पेट भरने के लिए पिता को दिहाड़ी पर जाना पड़ा है.

घर के नाम पर उनके परिवार के पास टिन की छत वाला पक्का कमरा. फूलों के प्रिंट वाली एक पुरानी साड़ी में लिपटी करीना की माँ उदास चेहरा ज़मीन की ओर झुकाए हुए घर के आँगन में झाड़ू लगा रही थीं.

उस रात को याद करते हुए उन्होंने बताया, "उल्टियाँ करते हुए लड़की बउआने लगी. हाथ-पैर इतनी ज़ोर से ऐंठे कि छिल गए जगह-जगह से. आँखें ऊपर हो गईं और झटके मारने लगी. हमने गोद में लिया तो शरीर तप रहा था. इतनी अकड़ रही थी कि हमसे संभल नहीं रही थी. फिर हम तुरंत उसको ब्लॉक अस्पताल ले गए तो वहाँ डॉक्टर ने तुरंत सदर (ज़िला) भेज दिया."

करीना गोरखपुर ज़िला अस्पताल में 10 दिन भर्ती रही. वो ठीक होने लगी थी. उसके बाद उसे डिस्चार्ज कर वापस घर भेज दिया गया. घर आने के अगले ही दिन बुखार वापस आ गया.

उसकी माँ ने आगे का घटनाक्रम बताया, "अबकि बार लड़की न ही ताक रही थी न ही बोल रही थी. किसी को नहीं पहचान रही थी. तीन दिन बाद सदर वालों ने मेडिकल कॉलेज भेज दिया. वहाँ डॉक्टर कुछ बताते ही नहीं. हम पूछते की हमारी लड़की कैसी है, बताओ तो हमको डाँट के चुप करवा देते. चार दिन मेडिकल में पड़ी रही. पाँचवे दिन ख़त्म हो गयी."

Image caption बीआरडी मेडिकल कॉलेज

करीना की माँ का अफ़सोस शब्दों में साफ़ ज़ाहिर था, "अगर सदर वालों ने लड़की को घर नहीं भेजा होता तो शायद बच जाती. लेकिन मैंने वहां देखा- बच्चा पूरी तरह ठीक हुआ हो या नहीं, सदर में सबको 10 दिन बाद छुट्टी दे देते थे. हमारी लड़की का इंसेफेलाइटिस पूरी तरह ठीक नहीं हुआ था तभी तो दोबारा वापस आया."

गाँव का बुरा हाल

गोरखपुर के ख़ोराबर ब्लॉक में राबती नदी के किनारे बसे भाठवा गाँव की करीना की कहानी आपको दूसरी जगहों पर भी मिल जाएगी. सिर्फ़ किरदारों के नाम बदले होंगे.

करीना के गाँव की आबादी 3000 की है. वहाँ दो परिवारों को छोड़कर किसी भी परिवार के पास शौचालय नहीं है. पीने के लिए भी यहाँ के लोग निजी हैंडपंपों के पीले प्रदूषित पानी पर निर्भर हैं.

खुले में शौच से फैलने वाला ज़मीनी प्रदूषण, गंदगी और फिर कम गहराई वाले निजी हैंडपंपों का इस्तेमाल एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) फैलने का प्रमुख कारण है.

मैंने पाया कि कूड़ेदानों और जल निकासी के अभाव में गोरखपुर एक खुले सीवर की तरह बजबजा रहा था. बड़का भाठवा जैसे देहाती इलाक़ों का भी यही हाल था.

Image caption गोरखपुर के प्रमुख चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) श्रीकांत तिवारी

'अगस्त में बच्चों की मौत'

बीते अगस्त में गोरखपुर के बाबा राघवदास (बीआरडी) मेडिकल कॉलेज में अचानक हुई ऑक्सीजन की कमी से पांच दिनों के भीतर 72 बच्चों की मौत हो गई थी. मरने वालों में से ज़्यादातर बच्चे 'इंसेफेलाइटिस' के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती थे.

घटना के तुरंत बाद उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने मीडिया से बातचीत के दौरान दिए गए एक चर्चित बयान में कहा था कि, 'गोरखपुर में पिछले कई सालों से हर बार अगस्त के महीने में बच्चे दिमाग़ी बुखार की चपेट में आते हैं और इस हॉस्पिटल में आकर मर जाते हैं'.

इस बयान की वजह से एक ओर जहां सरकार की चौतरफ़ा किरकिरी हुई वहीं दूसरी ओर 'गोरखपुर में अगस्त का महीना' और 'इंसेफेलाइटिस से मरने वाले बच्चे' एक दूसरे के पर्याय के तौर पर जनमानस में स्थापित हो गए.

यूं तो गोरखपुर अंचल में बरसात के दौरान फैलने वाले जापानी इंसेफेलाइटिस (जेइ) और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) नामक दिमाग़ी बुखारों की चपेट में आने वाले बच्चों का सिलसिला 40 साल पुराना है.

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Image caption सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, पिपरौली

लेकिन अगस्त 2017 के 'ऑक्सीजन कांड' के बाद सरकारी लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता के चलते राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्ख़ियाँ बटोरने वाली उत्तर प्रदेश सरकार इस साल अगस्त के महीने में पुरानी गलतियां न दोहराने के दावे कर रही है.

वैसे बीआरडी मेडिकल कॉलेज में इस साल 24 जुलाई 2018 तक जुटाए गए आकंड़ों के अनुसार 196 बच्चे और 57 वयस्क इंसेफेलाइटिस के इलाज के लिए दाख़िल हुए. इसमें से 69 बच्चों और 13 वयस्कों की मृत्यु हो गयी. अगस्त के साथ-साथ बरसात का मौसम यहां शुरू हुआ ही है.

बढ़ती उमस के बीच दोपहर बाद भी ज़िला चिकित्सालय के पास ही बने मुख्य चिकित्सा अधिकारी के दफ़्तर में मिलने वालों का तांता लगा हुआ था. सीएमओ श्रीकांत तिवारी सरकारी काग़ज़ात पर दस्तख़त करने में व्यस्त थे.

Image caption गोरखपुर का ज़िला अस्पताल

सीएमओ श्रीकांत तिवारी के दावे

- शहर के बाहर भी पेडियाट्रिक आईसीयू बनवाए गए

- ज़िला अस्पताल में जो पेडियाट्रिक आईसीयू था उसमें 5 बिस्तरों का इज़ाफ़ा

- पेडियाट्रिक आईसीयू या मिनी-पीकू ज़रूरी उपकरणों और इंतज़ामों से लैस

- हर मिनी-पीकू में दो बाल चिकित्सा विशेषज्ञ और तीन प्रशिक्षित नर्सें तैनात

- ज़िले के 19 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर 'इंसेफेलाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर' बनवाए गए जहाँ बुख़ार का प्राथमिक इलाज होगा डॉक्टर मरीज़ के लक्षण देखेंगे और ज़रूरत पड़ने पर पास के पेडियाट्रिक आइसीयू पर रेफ़र कर देंगे

- इंसेफ़ेलाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर में मरीज़ को रेस्टोर करने के लिए वेंटिलेटर, मॉनिटर और दवाइयों से लेकर सारी सुविधाएँ उपलब्ध

- 'स्टॉप जेई/एईस' के नाम से एक मोबाइल ऐप्लिकेशन भी शुरू हुआ, जिसे गांव का सरपंच, आशा या कोई भी अन्य व्यक्ति अपने फ़ोन में डाउनलोड कर सकता है

- ऐप में सिर्फ़ एक बटन दबाने से कॉल सेंटर पर अलर्ट आएगा कि फलां नंबर से अलर्ट आया. वहां से नंबर पर फ़ोन जाएगा और तुरंत मदद पहुँचाई जाएगी

- टाटा के साथ एक क़रार, जिसके तहत फ़िलहाल पिपरौली में पायलट स्तर पर चार मोबाइल वैन रोस्टर के हिसाब से घूम रही हैं

- इन गाड़ियों में एल.ई.डी, वेंटिलेटर तथा मेडिकल स्टाफ़ मौजूद

- इसके अलावा जागरूकता फैलाने के लिए 'दस्तक' नाम से अभियान

- इस अभियान के तहत हर गाँव में कार्यरत सरकारी आशा कार्यकर्ता हर घर में जाकर इंसेफेलाइटिस से बचने के सम्बंध में जानकारी देगी और एक सूचनात्मक पोस्टर हर घर की दीवार पर चिपकाएगी

Image caption उत्तर प्रदेश सरकार का दस्तक अभियान

दावों का सच

अगर यह प्रयास वाक़ई काग़ज़ों पर दर्ज स्याही में रंगे वादों से निकलकर ज़मीन पर अमली जामा पहनते तो गोरखपुर अंचल की तस्वीर बदल जाती. मगर एक इंसेफेलाइटिस मुक्त गोरखपुर का ख़्वाब दिखाने वाली वादों की इस लम्बी फ़ेहरिस्त की सच्चाई सीएमओ के दफ़्तर में इसी इंटरव्यू के दौरान खुलने लगी.

गोरखपुर शहर से 17 किलोमीटर दूर स्थित जिले की सिहोरिया ग्राम पंचायत के सरकारी स्वास्थ्य केंद्र के प्रतिनिधि डॉक्टर हमारे बीच आकर बैठे.

तभी सीएमओ डॉक्टर तिवारी को एक फ़ोन आया. फ़ोन पर बात करते हुए उन्होंने 'स्टॉप जेई/एईस' ऐप की कमियाँ गिनवाते हुए उसके ठीक से काम न करने की शिकायत की.

उन्होंने कहा कि 'ऐप ज़्यादा सक्सेसफ़ुल साबित नहीं हो रहा'.

Image caption उत्तर प्रदेश सरकार का दस्तक अभियान

फ़ोन कॉल लेने के बाद सिहोरिया से आए फ़रियादी ने उनसे कहा, "हमारे यहां प्रसूति के लिए कोई डॉक्टर नहीं है. एक्स-रे मशीन भी ख़राब है. शौचालय टूट-फूट गए हैं और अस्पताल की इमारत कमज़ोर हो गई है".

जवाब देते हुए डॉक्टर तिवारी ने कहा, "मैं आपको सिहोरिया में कहाँ से स्पेश्लिस्ट डॉक्टर लाकर दूं? यहां गोरखपुर ज़िला अस्पताल में मेरे पास एक अदद डेंटिस्ट नहीं है. दसियों बार शासन को लिख चुका हूँ. अभी तक डेंटिस्ट नहीं मिला. डॉक्टर नहीं मिल सकता. स्पेश्लिस्ट तो भूल ही जाइए. आजकल सीएमओ के नीचे एमबीबीएस से ज़्यादा कोई काम नहीं करना चाहता. डॉक्टर छोड़कर और जो भी समस्या है बताइए, मैं फ़ॉर्वर्ड कर दूंगा".

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Image caption डॉक्टर गणेश कुमार

इसके बाद डॉक्टरों की कमी के बारे में पूछने पर सीएमओ डॉक्टर तिवारी ने बताया कि उन्हें गोरखपुर की स्वास्थ्य व्यवस्था ठीक से चलाने के लिए कम से कम 70 और डॉक्टरों की ज़रूरत है.

इंसेफेलाइटिस के इलाज में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बाल रोग विशेषज्ञों या पेडियाट्रिशन के बारे में उन्होंने बताया कि जिले में कुल 13 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं और हर केंद्र पर उन्हें एक पेडियाट्रिशन की ज़रूरत है.

साथ ही हर पीकू में दो पेडियाट्रिशन की दरकार है. सीएमओ ने बताया, "लेकिन हमारे पास कुल 7-8 पेडियाट्रिशन ही हैं. इसके अलावा हमें प्रसूति विशेषज्ञ और एनेस्थिसियोलॉजिस्ट की भी बहुत ज़रूरत है"

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Image caption बीआरडी मेडिकल कॉलेज के इंसेफेलाइटिस वार्ड के बाहर बैठे मरीज़ों के परिजन

अन्य अस्पतालों और गांवों का सच

इस साल के अगस्त में इंसेफेलाइटिस से लड़ने के लिए प्रचारित किए जा रहे सरकारी दावों और योजनाओं की ज़मीनी सच्चाई समझने के लिए हमने गोरखपुर जिले में कई अस्पतालों और गांवों का दौरा किया.

जिस नौ साल की बच्ची करीना की मौत का ज़िक्र आपने इन रिपोर्ट के शुरू में पढ़ा था उसके गाँव में दस्तक अभियान का कोई पोस्टर नहीं लगा था. पहले और दूसरे फ़ेज़ की बात तो दूर, यहां निवासियों ने कभी किसी दस्तक अभियान ने बारे में सुना ही नहीं. करीना की दादी कहती हैं की कभी कोई आशा उनके घर नहीं आई.

उस गाँव से आगे बढ़ते हुए हम पहुंचे ब्रह्मपुर ब्लॉक स्थित 'बरही सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र'. जिस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर सरकारी नियमों के अनुसार एक पेडियाट्रिशन, एक सर्जन, एक प्रसूति विशेषज्ञ, एक रेडीयोलॉजिस्ट और एक नाक-कान-गला रोग विशेषज्ञ होना चाहिए, वहां का पूरा कार्यभार मेडिकल ओफिसर डॉक्टर एसके मिश्रा अकेले सम्भालते हैं.

एक डॉक्टर वाले इस अस्पताल में लैब टेक्नीशियन तो है पर लैब में जाँच करवाने के लिए ज़रूरी उपकरण नहीं हैं. एक जर्जर कमरे में अकेले बैठे डॉक्टर मिश्रा कमरे की हालत के बारे में पूछने पर बताते हैं कि बीती बरसात में बाढ़ का पानी अस्पताल में भर गया था. उन्होंने कहा, "कमरे में ये निशान पानी के हैं. बाढ़ के बाद से इमारत कमज़ोर हो गयी है... न जाने कब गिर जाए".

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Image caption ख़ोराबर ब्लाक का बड़का भाठवा गांव

चौरी-चौरा की स्थिति

बरही से आगे हम गोरखपुर के चौरी चौरा में बहु-प्रचारित 'सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र' और इस अस्पताल में बने मिनी-पीकू की स्थिति देखने पहुंचे. यहां के अधीक्षक डॉक्टर सर्वजीत प्रसाद ने हमें अस्पताल के एक अलग कमरे में बन रहे मिनी पीकू दिखाते हुए बताया कि तीन बिस्तरों वाले इस नए इंसेफेलाइटिस वार्ड के लिए ज़रूरी आधुनिक पलंग तो आ गए हैं पर वेंटिलेटर और मॉनिटर की ख़रीदारी अभी शासन के स्तर पर चल रही हैं.

अस्पताल पर बढ़ते भार के बारे में बताते हुए डॉक्टर प्रसाद कहते हैं कि उनके सामुदायिक अस्पताल में 10 डॉक्टरों की दरकार है पर उनके पास सिर्फ़ 4 डॉक्टर हैं.

उन्होंने बताया, "ज़िला अस्पताल में कमी थी तो यहां के स्टाफ़ को जिले में अटैच कर दिया गया है. अब यहां पर इमरजेंसी में सिर्फ़ तीन डॉक्टर हैं. इमरजेंसी 24 घंटे चलती है तो तीन डॉक्टर तो शिफ़्ट में रोज़ ही चाहिए. चौथी महिला डॉक्टर हैं. स्पेश्लिस्ट नहीं हैं, सिर्फ़ एमबीबीएस हैं लेकिन हमारे पास प्रसूति विशेषज्ञ नहीं है तो यही प्रसूति का काम देखती हैं. रात में महिला डॉक्टर की सुरक्षा सुनिश्चित करने की व्यवस्था हमारे पास नहीं है. इसलिए उनको इमरजेंसी में नहीं लगाते".

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Image caption सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, चौरी चौरा

डॉक्टर प्रसाद कहते हैं, "इस साल हम अब तक 39,600 मरीज़ देख चुके हैं. ओपीडी हफ़्ते में छह दिन चलता है. उसके हिसाब से यहाँ हर रोज़ 217 मरीज़ देखे जा रहे हैं. कभी दो तो कभी तीन डॉक्टरों के बीच. इसी बीच मुझे वीआईपी ड्यूटी करने भी जाना पड़ता है और महीने में एक बार जिले में पोस्टमॉर्टम के लिए भी ड्यूटी लगती है. यहां डॉक्टर सो नहीं पाते हैं. अगर स्टाफ़ बढ़ जाए तो काम ज़्यादा बेहतर होगा".

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Image caption बड़का भाठवा गांव में रहने वाला करीना का परिवार

महाराजगंज के हालात

इसी क्रम में नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर महाराजगंज के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में कार्यरत एक डॉक्टर ने कहा कि काम के बोझ के चलते उनकी 'क्लिनिकल नॉलेज' ख़त्म होती जा रही है.

उन्होंने कहा, "50 की बजाय जब आपको दिन में 180 मरीज़ देखने पड़ेंगे तो आप सबको बुखार के लिए पैरासीटामोल पकड़ा देंगे क्योंकि एक्स-रे देखने, मेडिकल हिस्ट्री पढ़ने और छाती में कान लगाकर कफ़ की जांच करने का आपके पास वक़्त ही नहीं है. इस चक्कर में आप ठीक से प्रैक्टिस नहीं कर पाते और धीरे-धीरे अपना सब सीखा पढ़ा भूलने लगते हैं".

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Image caption गोरखपुर शहर का मुहाना

बीआरडी के 'नाराज़ प्रिंसिपल'

ज़िले के दौरे के बाद वापस गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में हमारी मुलाक़ात मीडिया की 'नकारात्मक रिपोर्टिंग' से नाराज़ कॉलेज के प्रिन्सिपल डॉक्टर गणेश कुमार से होती है.

इंटरव्यू के दौरान वह कहते हैं कि प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को सशक्त बनाने की सरकार की मौजूदा मुहिम से मेडिकल कॉलेज को कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ है.

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Image caption बीआरडी मेडिकल कॉलेज का इंसेफेलाइटिस वार्ड

डॉक्टर कुमार के मुताबिक़, "बुखार आते ही डिस्चार्ज करके यहां भेज देते हैं. सरकार ने मैनपावर नहीं दिया है उनको. मायने यह रखता है की आपने कितने मरीज़ों को वेंटिलेटर पर डाला. हम अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश कर रहे हैं. यहां 79 बिस्तरों का एक नया वार्ड बनाया गया है. हाई डेन्सिटी यूनिट में 6 से बढ़ाकर 37 बिस्तर कर दिए गए हैं. इंसेफेलाइटिस और अगस्त से पहले दवाइयाँ, दस्ताने और दूसरे सभी ज़रूरी समान सब स्टॉक कर लिए गए हैं. लेकिन हम अकेले सब कुछ नहीं कर सकते. शहर में गंदगी कम करनी होगी, बच्चों को पोषण मिले यह सुनिश्चित करना होगा. अब लोग सड़क पर थूकेंगे तो इसके लिए बीआरडी ज़िम्मेदार नहीं है ना".

देश के सबसे ग़रीब इलाक़ों में से एक गोरखपुर के लोगों की सामाजिक स्थिति को दरकिनार करते हुए डॉक्टर गणेश कहते हैं कि शहर और जिले में सफ़ाई के लिए सिर्फ़ नगर पालिका और सरकार ज़िम्मेदार नहीं. "लोगों को ख़ुद अपने पैसे लगाकर सफ़ाई करवानी चाहिए. सभी इतने वेल-ऑफ़ हैं. कूड़ा हटाना सिर्फ़ नगर पालिका का काम नहीं. लोगों का भी है".

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Image caption गोरखपुर अंचल के देवरिया ज़िला अस्पताल का इंसेफेलाइटिस वार्ड

गाँवों में कितनी वैन

इसी बीच पिपरौली में टाटा कंपनी के साथ हुए क़रार के अंतर्गत इंसेफेलाइटिस के इलाज और जागरूकता के लिए गांव-गांव में चलाई जा रही मोबाइल वैन के बारे में जानने के लिए हम पिपरौली पहुंचे. अपने इंटरव्यू में सीएमओ डॉक्टर तिवारी जिन मोबाइल वैन को 'रोस्टर के अनुसार चलता हुआ' बता रहे थे, उनका ज़मीन पर कोई नमो-निशान नहीं है.

टाटा कम्पनी के प्रतिनिधि लल्लन ने बताया कि अभी तो वह गोरखपुर के दफ़्तर के नाम को रजिस्टर करवाने के लिए अर्ज़ी भेज कर आए हैं.

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Image caption चौरी चौरा के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में बन रहा मिनी पीकू

गोरखपुर से लौटते हुए मुझे शतरंज की ऐसी हारी हुई बाज़ी का ख़याल आता है, जिसमें हारने वाला हर प्यादा अपनी हार के लिए दूसरे प्यादे को ज़िम्मेदार ठहराता है.

लौटते हुए मेरी आख़िरी बातचीत स्थानीय पत्रकार मनोज कुमार सिंह से होती है.

इंसेफेलाइटिस से होने वाली बच्चों की मौतों पर लम्बे अरसे से ख़बरें लिख रहे मनोज कहते हैं, "सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार सन् 1978 से 2018 तक 40 सालों में 10 हजार से अधिक मौतें सिर्फ बीआरडी मेडिकल कॉलेज में हुई हैं. और इतने ही बच्चे विकलांग भी हुए हैं. क्या देश का कोई इलाक़ा इससे भी ज्यादा बदनसीब हो सकता है जहां इतने बच्चों की लाशें दफ़नाई गई हों? वह भी बिना किसी युद्ध और आपदा के?"

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