दलितों को मनाने की कोशिश पर सवर्ण वोट खोने का ख़तरा

  • 2 अगस्त 2018
दलितों का विरोध प्रदर्शन इमेज कॉपीरइट Getty Images

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचारों की रोकथाम) क़ानून यानी एससीएसटी (प्रीवेन्शन ऑफ एट्रोसिटीज़ एक्ट) को फिर से बहाल करने संबंधी संशोधन विधेयक को बुधवार को मंजूरी दे दी.

सरकार का कहना है कि इस क़ानून के मूल प्रावधानों को बहाल करने वाला संशोधन विधेयक जल्द संसद में लाया जाएगा. इस मुद्दे को लेकर बीते कुछ महीनों से देश भर में दलित संगठनों ने प्रदर्शन किए हैं और अपने हकों की रक्षा की मांग कर रहे हैं.

कैबिनेट की बैठक के बाद क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संवाददाता सम्मेलन में इस बात की ओर इशारा किया कि कैबिनेट ने एससी-एसटी एक्ट को फिर से उसकी पुरानी शक्ल में बहाल करने के विधेयक को मंजूरी दे दी है.

उन्होंने सीधे तौर पर एससी-एसटी एक्ट की बात नहीं की, लेकिन कहा, "कैबिनेट ने एक महत्वपूर्ण फ़ैसला किया है लेकिन संसदीय परंपरा का सम्मान करते हुए आपके सामने फ़िलहाल ये बता नहीं सकते."

"नरेंद्र मोदी की सरकार इस देश के दलितों और आदिवासियों के विकास के लिए कृतसंकल्प है और इसके लिए जो संभव होगा वो करेगी."

सरकार के इस फ़ैसले का कुछ दलित नेताओं ने स्वागत किया है. लोक जनशक्ति पार्टी के नेता और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने दूरदर्शन से बात करते हुए कहा, "दलित एक्ट के मामले को लेकर पूरे देश में गुस्सा था उसको आज दुरुस्त कर दिया गया है."

एक ट्वीट में उन्होंने लिखा, "अब इस क़ानून में बदलाव कर कहा जाएगा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मामलों में एफ़आईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच ज़रूरी नहीं होगी."

'वोट देने वाला मूर्ख नहीं'

दलित संगठनों की मांग थी कि एससी-एसटी एक्ट में किए गए बदलावों में ख़त्म किया जाए और उसे उसके पुराने स्वरूप में फिर से बहाल किया जाए.

इसी संबंध में नौ अगस्त को दलित संगठनों ने 'भारत बंद' का भी आह्वान किया था. लेकिन डॉक्टर आंबेडकर इंटरनेशनल सोशल रिफॉर्म संगठन से जुड़े नेता बीएस आज़ाद कहते हैं कि सरकार 2019 चुनावों की तैयारी कर रही है.

बीएस आज़ाद कहते हैं, "सरकार ने 20 मार्च के बाद भी ये कहा था लेकिन वो अपनी बात पर खरे नहीं उतरे थे. उन पर कैसे विश्वास किया जाए?"

"भारत बंद की हमारी अपील केवल एससी/एसटी के मुद्दे को लेकर नहीं है. सरकार पहले काम करके दिखाए, आंदोलन उसके बाद ही बंद करेंगे."

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क्या कैबिनेट के फ़ैसले के बाद दलित नेता अब खुश है. इसके उत्तर में बीएस आज़ाद कहते हैं, "सरकार में बैठे मंत्री अब तक कुछ नहीं कह रहे थे. लेकिन आज जब 2019 की रणभेरी बज चुकी है तो उन्हें लगता है कि वो ये मुद्दा हथिया लेंगे."

"अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लोग जागरूक हैं और जानते हैं कि सरकार की दो ज़बानें होती हैं. सरकार को ये नहीं समझना चाहिए कि वोट देने वाला इतना मूर्ख है कि वो आपके बहकावे में आ जाएगा."

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समाजशास्त्री दिलीप मंडल कहते हैं, "एससी-एसटी एक्ट का कमज़ोर होना सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद से हुआ था जो ग़लत था. सरकार ने इस बात को स्वीकार किया है. अब एससी-एसटी एक्ट से जुड़े मामलों में एफ़आईआर दर्ज की जा सकेगी, जिन पर आरोप होगा उनकी अग्रिम जमानत नहीं हो सकेगी."

"मैं मानता हूं कि अब ये एक्ट अपनी पुरानी स्थिति में आ गया है. मैं इसे जीत नहीं मानता ना ही ये सरकार ने कोई बड़ा काम किया है. सरकार की तरफ से एडिशनल सोलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट मे ग़लती की थी और कहा था कि इस एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है. उन्होंने एक तरह से रास्ता खोल दिया था कि ये एक्ट अपने मूल स्वरूप में ना रहे."

दिलीप मंडल सवाल करते हैं, "कोर्ट के फैसले के बाद हुए आंदोलन में जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया. वो अब भी जेल में क्यों है? जिन लोगों पर मुकदमें हुए उन पर मुकदमें क्यों चल रहे हैं?"

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सरकार किसे खुश करे?

हाल के वक्त में दलितों पर हुए हमले बढ़े हैं और एससी-एसटी एक्ट के कमज़ोर होने को भी इससे जोड़ कर देखा जा रहा है.

इस पर दिलीप मंडल कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले और सरकार के ऑर्डिनेंस लाने के बीच छह महीने का जो समय था उस दौरान दलितोँ और आदिवासियों पर हमले बढ़े और उनकी सुनवाई नहीं हुई.

वो कहते हैं, "लगातार हिंसा के बाद दूसरी हिंसा की गुंजाइश तब बन जाती है जब पहली हिंसा के बाद कोई कार्रवाई नहीं की जाती. सरकार ने सख्ती नहीं की इसीलिए हिंसा और जतिवादी घटनाओं की बाढ़ आ गई है."

वो कहते हैं कि एससी-एसटी लोगों के लिए सरकार को कुछ कारगर कदम उठाने पड़ेंगे, लेकिन ऐसा करने से सरकार को अपना पारंपरिक सवर्ण वोटबैंक खोने का ख़तरा है.

दिलीप मंडल कहते हैं, "देखा जाए तो सरकार एक पतली गली से गुज़र रही है जिसमें उसके पास हाथ हिलाने की गुंजाइश बहुत है. लेकिन अगर सरकार नाराज़ दलितों को मना नहीं पाई तो आगामी चुनावों में उसके लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है."

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दलित कार्यकर्ताओं पर एफ़आईआर और गिरफ़्तारी के विरोध में प्रदर्शन

दलित संगठनों की मांग क्या थी?

मामला इस साल मार्च का है जब सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताई थी और इसके तहत मामलों में तुरंत गिरफ़्तारी की जगह शुरुआती जांच की बात कही थी.

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले पर स्टे देने से इनकार कर दिया था.

कोर्ट के फ़ैसले से नाराज़ दलित सड़कों पर उतर आए और कई जगहों पर हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए जिनमें कम से कम 10 लोग मारे गए. समर्थक कहते हैं कि ये क़ानून दलितों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल होने वाले जातिसूचक शब्दों और हज़ारों सालों से चले आ रहे ज़ुल्म को रोकने में मदद करता है.

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भारत बंद: सड़क पर गिराकर पुलिस ने लाठियों से पीटा
  • मुक़दमे की कहानी महाराष्ट्र के सतारा ज़िले के गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ़ फ़ार्मेसी, कराड से शुरू होती है. कॉलेज के स्टोरकीपर भास्कर करभारी गायकवाड़ की सालाना गोपनीय रिपोर्ट में उनके ख़िलाफ़ निगेटिव कॉमेंट्स किए गए.
  • एससी/एसटी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले भास्कर के ख़िलाफ़ ये कॉमेंट्स उनके आला अधिकारी ने किए थे जो इस वर्ग से नहीं आते थे. 4 जनवरी, 2006 को भास्कर ने कराड पुलिस थाने में एफ़आईआर दर्ज कराई. भास्कर ने 28 मार्च, 2016 को इस मामले में एक और एफ़आईआर दर्ज कराई जिसमें उनकी 'शिकायत पर कार्रवाई न करने वाले' दूसरे अधिकारियों को भी नामजद किया.
  • एससी/एसटी एक्ट के तहत आरोपों की जद में आए अधिकारियों का कहना था कि उन्होंने अपनी आधिकारिक क्षमता में अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए ये प्रशासनिक फ़ैसले लिए थे.
  • सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एके गोयल और जस्टिस यूयू ललित ने 20 मार्च को स्पष्ट कर दिया कि अब किसी दलित या आदिवासी की शिकायत पर तुरंत गिरफ़्तारी नहीं की जा सकती.
  • किसी भी सरकारी अधिकारी या नागरिक को अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति क़ानून के तहत गिरफ़्तार करने से पहले पुलिस को पूरी तहक़ीक़ात करनी होगी.

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