क्या प्राचीन भारत का हिंदू वाक़ई सहिष्णु था?

  • 5 अगस्त 2018
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प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय इतिहास के विशेषज्ञ द्विजेंद्र नारायण झा वो भारतीय इतिहासकार हैं जिन्होंने 'मिथ ऑफ़ द होली काउ' जैसी किताब लिखी जिसमें वे साबित करते हैं कि प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था. ज़ाहिर है, ऐसे विषय पर विवाद तो होगा ही.

हाल ही में प्रकाशित उनकी नई किताब 'अगेंस्ट द ग्रेन: नोट्स ऑन आइडेंटिटी, इन्टॉलरेंस एंड हिस्ट्री' में प्राचीन भारत में असहिष्णुता समेत उन विभिन्न मुद्दों पर रोशनी डाली गई है जिनका सामना आज का भारत राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर कर रहा है.

इस किताब और देश के मौजूदा हाल से जुड़े कई सवाल बीबीसी भारतीय भाषाओं की संपादक रूपा झा ने प्रोफ़ेसर डीएन झा से पूछे, जिनके जवाब उन्होंने ईमेल से भेजे हैं.

हिंदुत्व के विचारक प्राचीन भारत को स्वर्ण युग कहते हैं, जिसमें सामाजिक सद्भाव था. वहीं, मध्यकालीन भारत को वो आतंक का दौर ठहराते हैं, जिसमे मुस्लिम शासकों ने हिंदुओं पर बहुत ज़ुल्म ढाए. ऐतिहासिक सबूत इस बारे में क्या कहते हैं?

प्रोफ़ेसर डी.एन. झा- ऐतिहासिक साक्ष्य ये कहते हैं कि भारतीय इतिहास में कोई स्वर्ण युग नहीं था. प्राचीन काल को हम सामाजिक सद्भाव और संपन्नता का दौर नहीं मान सकते. इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि प्राचीन भारत में जाति व्यवस्था बहुत सख़्त थी.

गैर-ब्राह्मणों पर सामाजिक, क़ानूनी और आर्थिक रूप से पंगु बनाने वाली कई पाबंदियां लगाई जाती थीं. ख़ास तौर से शूद्र या अछूत इसके शिकार थे. इसकी वजह से प्राचीन भारतीय समाज में काफ़ी तनातनी रहती थी.

आज के अंबानी या अडानी की तरह उस दौर में भी ऊंची जाति के लोग, सामंत और ज़मींदार संपन्न और ख़ुश थे. लेकिन, हम तो देखते आए हैं कि ऐसे लोगों के लिए तो हमेशा ही स्वर्ण युग रहता है.

प्राचीन भारत में स्वर्ण युग था, ये विचार उन्नीसवीं सदी के आख़िर से उपजा था. बीसवीं सदी की शुरुआत में इतिहासकार ये कहने लगे कि गुप्त राजवंश ने राष्ट्रवाद को फिर से ज़िंदा किया. गुप्त शासकों के दौर को स्वर्ण युग कहा जाता है.

लेकिन, डीडी कोसांबी के शब्दों में कहें तो, गुप्त राजवंश ने राष्ट्रवाद को पुनर्जीवित नहीं किया. बल्कि राष्ट्रवाद ने गुप्त राजवंश को फिर से ताक़त दी थी. हक़ीक़त ये है कि सामाजिक सद्भाव और संपन्नता वाले स्वर्ण युग की कल्पना का इतिहासकारों ने भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में दुरुपयोग किया है.

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जहां तक मध्यकालीन मुस्लिम शासकों के आतंक और ज़ुल्म वाली हुकूमत करने की बात है, तो मुस्लिम शासकों को दानव के तौर पर पेश करने का दौर भी उन्नीसवीं सदी के आख़िर से ही शुरू हुआ था. क्योंकि उस दौर के कुछ सामाजिक सुधारकों और दूसरे अहम लोगों ने मुसलमानों की छवि को बिगाड़कर पेश करने को अपनी ख़ूबी बना लिया.

जैसे कि दयानंद सरस्वती (1824-1883). उन्होंने अपनी किताब सत्यार्थ प्रकाश में दो अध्याय इस्लाम और ईसाई धर्म की बुराई को समर्पित कर दिए. इसी तरह विवेकानंद (1863-1902) ने कहा कि, 'प्रशांत महासागर से लेकर अटलांटिक तक पूरी दुनिया में पांच सौ साल तक रक्त प्रवाह होता रहा. यही है इस्लाम धर्म.'

मुस्लिम शासकों को ख़राब बताकर, उनकी छवि बिगाड़कर, उन्हें ज़ुल्मी ठहराना जो तब से शुरू हुआ, वो आज तक जारी है. हिंदुत्व के विचारक और अनुयायी मुस्लिम शासकों को षडयंत्रकारी और हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराने वाला बताते हैं. जिन्होंने हिंदुओं के मंदिर ढहाए और हिंदू महिलाओं से बलात्कार किए.

लेकिन मध्यकालीन भारत और मुस्लिम शासकों के बारे में ऐसी सोच को ताराचंद, मोहम्मद हबीब, इरफ़ान हबीब, शीरीन मूसवी, हरबंस मुखिया, ऑड्रे ट्रश्क और दूसरे इतिहासकारों ने लगातार चुनौती दी है.

इन इतिहासकारों ने रिसर्च से साबित किया है कि मुस्लिम शासकों की ज़्यादतियों को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है. इन इतिहासकारों ने बताया है कि मुस्लिम शासकों ने उस वक़्त जो ज़ुल्म किए वो उनकी सियासी ज़रूरत थी.

साम्राज्यवाद से पहले के दौर में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तनातनी के ज़्यादा सबूत नहीं मिलते. हक़ीक़त ये है कि मुग़लों के दौर में संस्कृत वाली संस्कृति ख़ूब फली-फूली.

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आपने अपनी नई किताब 'अगेंस्ट द ग्रेन नोट्स ऑन आइडेंटिटी, इन्टॉलरेंस एंड हिस्ट्री' में ज़िक्र किया है कि ब्राह्मणवादियों ने कभी भी बौद्ध धर्म को स्वीकार नहीं किया. इसका क्या मतलब है? हाल में जिस तरह दलितों को आक्रामकता का सामना करना पड़ा है, उसे आप किस तरह देखते हैं?

प्रोफ़ेसर डीएन झा- हिंदुत्ववादी असहिष्णुता का मैंने पहले भी ज़िक्र किया है. उसी की रोशनी में ये एकदम साफ़ है कि ब्राह्मण हमेशा ही बौद्ध धर्म के अनुयायियों के घोर विरोधी रहे हैं.

मौजूदा वक़्त में दलितों, ख़ास तौर से बौद्ध धर्म के अनुयायी दलितों के साथ जो दुश्मनी निभायी जा रही है, उसकी जड़ें हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था में हैं.

वर्गों में बँटे हिंदू धर्म में दलित सबसे निचले पायदान पर हैं. इसकी एक वजह ये भी है कि वो गाय का मांस खाते थे, जो ऊंचे दर्जे के हिंदुओं की मान्यताओं के सख़्त ख़िलाफ़ है.

यही वजह है कि आज बीफ़ खाने वालों या जानवरों का कारोबार करने वालों के साथ मॉब लिंचिंग की जितनी भी वारदातें हो रही हैं, उनमें अक्सर उग्र हिंदुत्ववादी ताक़तों का हाथ देखा जाता है.

हिन्दू धर्म के सहिष्णु होने की कई मिसालें दी जाती हैं, लेकिन क्या आप इसे एक सहिष्णु धर्म मानते हैं?

प्रोफ़ेसर डी एन झा- मेरी नज़र में सारे ही धर्म बाँटने का काम करते हैं. हिंदू धर्म भी इस मामले में कम नहीं. मसलन, ब्राह्मणवादी और श्रमणवादी धर्मों (जैन और बौद्ध) के बीच प्राचीन काल से लेकर मध्य काल तक लंबी प्रतिद्वंदिता रही. प्राचीन काल के ग्रंथों में भी इन दोनों के बीच तल्ख़ी के साफ़ सबूत मिलते हैं.

जैसे कि पतंजलि ने अपने ग्रंथ महाभाष्य में लिखा कि ब्राह्मण और श्रमण, सांप और नेवले की तरह हमेशा से एक-दूसरे के दुश्मन रहे हैं.

ब्राह्मणवाद और बौद्ध धर्म के बीच की स्थायी दुश्मनी की झलक हमें दोनों ही धर्मों के ग्रंथों में मिलती है. इसके अलावा कई पुरातात्विक सबूत भी इस दुश्मनी की तरफ़ इशारा करते हैं, जो हमें ये बताते हैं कि किस तरह बौद्ध धर्म की इमारतों को ढहाया गया और उन पर क़ब्ज़ा कर लिया गया.

हक़ीक़त ये है कि भारत से बौद्ध धर्म के ग़ायब होने की बड़ी वजह ब्राह्मणवादियों का इसे अपना दुश्मन मानना और इसके प्रति उनका आक्रामक रवैया रहा.

साफ़ है कि ब्राह्मण धर्म कभी बौद्ध धर्म की सच्चाई को स्वीकार नहीं कर सका. इसलिए ये कहना ग़लत होगा कि हिंदू धर्म बहुत सहिष्णु है.

भारत की अवधारणा कैसे और कब उभरी?

प्रोफ़ेसर डी एन झा- हिंदुत्व के विचारक लगातार ये प्रचार करते रहते हैं कि भारत अनंत काल से है. लेकिन भौगोलिक भारत का ज़िक्र तो वैदिक ग्रंथों में भी नहीं मिलता, जो भारत की सबसे पुराने साहित्यिक कृतियां हैं.

हालांकि वेदों में कई जगह भारत क़बीले का ज़िक्र ज़रूर मिलता है.

भारतवर्ष का पहला प्रमाण हमें ईसा पूर्व की पहली सदी में राजा खारवेला के दौर के एक शिलालेख में मिलता है.

हम कह सकते हैं कि इस भारतवर्ष का मतलब आज का उत्तर-भारत रहा होगा. हालांकि इसमें मगध शामिल नहीं था.

महाभारत में जिस भारत का ज़िक्र है, वो काफ़ी बड़े इलाक़े में फैला हुआ था. लेकिन, इसमें भी दक्कन और सुदूर दक्षिणी भारत का ज़िक्र नहीं मिलता.

पुराणों में भारतवर्ष का ज़िक्र कई बार हुआ है. लेकिन, हर बार इसका दायरा अलग-अलग बताया गया है. कई पुराणों में इसे चंद्रमा के आकार का बताया गया है, तो कई जगह इसका आकार तिकोना कहा गया है.

कई जगह इसे बेमेल चतुर्कोण के आकार का बताया गया है और कुछ पुराणों में इसे धनुष जैसा बताया गया है. लेकिन, ग़ौर करने लायक़ बात ये है कि प्राचीनकाल के किसी भी भारतीय ग्रंथ में भारत को मातृभूमि या भारत माता नहीं कहा गया है.

भारत के स्त्री रूप यानी भारत माता का पहला ज़िक्र हमें बंगाली लेखक द्विजेंद्र रॉय की एक कविता में मिलता है. इसके बाद हम बंकिम चटर्जी की आनंदमठ में भारत मां का ज़िक्र देखते हैं.

भारत का मानवीय स्वरूप में 1905 में अवनींद्र नाथ टैगोर की बनाई पेंटिंग में दिखता है. जिसमें भारत मां को हिंदू वैष्णव संन्यासिन के तौर पर पेश किया गया है. भारत मां का पहला नक़्शा हमें 1936 में वाराणसी में बने भारत माता मंदिर में देखने को मिलता है.

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मौजूदा वक़्त में हिंदुत्व की पहचान को आप कैसे देखते हैं?

प्रोफ़ेसर डी एन झा- प्रोफ़ेसर डी एन झा- हिंदुत्व इस देश में लंबे समय से चली आ रही तमाम मान्यताओं, परंपराओं और आस्थाओं-कर्मकांडों का मेल है.

लेकिन नए दौर के हिंदुत्ववादी इसे एक ही तरह की मान्यताओं, आस्थाओं और कर्मकांडों वाले लोगों का धर्म बनाने पर आमादा हैं.

इस धर्म की विविधता को नकार कर इसे एक जैसे लोगों वाले उग्र मज़हब के तौर पर पेश करने की कोशिश की जा रही है.

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इस नए हिंदुत्व में गाय की उपासना को सर्वोपरि बताया जा रहा है. भगवान राम को सभी देवी-देवताओं से ज़्यादा पूज्य ऊपर और रामायण को सभी शास्त्रों में सबसे बेहतर बताया जा रहा है.

मैंने तो कुछ समय पहले ये भी सुना कि कुछ हिंदुत्ववादी संगठन मनुस्मृति को आज के दौर के हिसाब से फिर से लिखने की कोशिश कर रहे हैं.

इससे ज़ाहिर है कि आज हिंदुत्व की एक बनावटी पहचान गढ़ी जा रही है, जो पहले नहीं थी. नतीजा ये है कि भारत को आज अंधे युग की तरफ़ धकेला जा रहा है, जहां पर धार्मिक, सांस्कृतिक और सियासी परिचर्चा बेहद ज़हरीली हो गई है.

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आपके मुताबिक़ गाय किस दौर में भावनात्मक सांस्कृतिक पहचान के तौर पर उभरी? आज इस पहचान को किस तरह इस्तेमाल किया जा रहा है?

प्रोफ़ेसर डीएन झा- यूं तो गो-कशी के ख़िलाफ़ जज़्बाती माहौल की ज़मीन प्राचीन काल और मध्यकाल के दौर में ही तैयार होने लगी थी. लेकिन, भारत में इस्लाम धर्म के आने के बाद इसके ख़िलाफ़ माहौल और आक्रामक हो गया.

मज़े की बात ये है कि जो ब्राह्मण वैदिक काल में गाय का मांस खाते थे, उन्होंने ही मुसलमानों की गाय का मांस खाने वालों की छवि गढ़ डाली.

इसमें कोई शक नहीं कि मध्यकालीन भारत में गाय एक जज़्बाती सांस्कृतिक प्रतीक के तौर पर उभरी थी.

गाय की ये छवि मराठों के सत्ता में आने के बाद और मज़बूत हुई. मराठा राजा शिवाजी के बारे में तो माना जाता था कि वो भगवान अवतार हैं. उनका जन्म ब्राह्मणों और गाय की सेवा के लिए ही हुआ.

हालांकि गाय के नाम पर गोलबंदी की पहली बड़ी कोशिश पंजाब में हुई थी. 1870 के दशक में सिखों के कूका आंदोलन के दौरान गाय को सियासी लामबंदी के लिए इस्तेमाल किया गया.

कमोबेश इसी दौरान दयानंद सरस्वती ने 1882 में पहली गोरक्षिणी सभा का गठन किया. गोरक्षा के लिए चलाए जा रहे आंदोलनों में तेज़ी आने के साथ ही गाय गो-माता बन गई.

ये ठीक उसी दौर में हो रहा था, जब भारत को भारत माता बनाया जा रहा था. हाल ही में एक नया शब्द राष्ट्रमाता सुनने को मिला है.

ये नाम मलिक मोहम्मद जायसी के ग्रंथ पद्मावत के एक किरदार पद्मिनी को दिया गया है. ये सारी बातें भारत के बुनियादी सामाजिक ताने-बाने को नुक़सान पहुंचा रही हैं.

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2019 के चुनाव से पहले राम मंदिर की राजनीति फिर तेज़ होगी. आपने अपनी किताब में लिखा है कि सत्रहवीं-अठारहवीं सदी तक उत्तर भारत में शायद ही कहीं राम मंदिर हुआ करते थे.

प्रोफ़ेसर डीएन झा- प्रोफ़ेसर डीएन झा- हिंदुत्व ब्रिगेड चाहे जो कहे, लेकिन हक़ीक़त यही है कि सत्रहवीं-अठारहवीं सदी तक उत्तर भारत में किसी भी राम मंदिर के सबूत नहीं मिलते.

हां, मध्य प्रदेश में बारहवीं सदी में बने एक-दो राम मंदिर ज़रूर पाए गए हैं. सच कहें तो अयोध्या, जैन और बौद्ध धर्म का बड़ा केंद्र था. 1528 में जब मीर बाक़ी ने वहां मस्जिद बनवाई तब भी वहां कोई राम मंदिर नहीं था.

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आपके मुताबिक़ भारत को सबके लिए एक बेहतर देश बनाने में इतिहास कितना बड़ा रोल निभा सकता है?

प्रोफ़ेसर डीएन झा- भारत को एक बेहतर देश बनाने में इतिहासकार अहम रोल निभा सकते हैं. अभी तक इतिहासकारों ने ऐसी किताबें ज़्यादा लिखी हैं, जिसमें भारी भरकम शब्द हैं.

तकनीकी लफ़्ज़ों पर ज़ोर है. ऐसी किताबें आम लोगों की समझ से परे हैं. अगर इतिहासकार अंग्रेज़ी के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषाओं में किताबें लिखें, तो वो आम लोगों की इतिहास को लेकर समझ बेहतर करने में मददगार होंगी.

वो ऐतिहासिक घटनाओं को ज़्यादा तार्किक नज़रिए से देखेंगे. धर्म के प्रति तार्किक समझ से समाज में मेल-जोल बढ़ेगा. बेतुकी सोच से समाज में दुर्भावना ही बढ़ती है.

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