नज़रिया: सवर्णों को नाराज किए बगैर दलितों-पिछड़ों को कैसे मैनेज करेगी बीजेपी

  • दिलीप मंडल
  • वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
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बीजेपी ने लोकसभा चुनाव की तैयारियों को ध्यान में रखते हुए सामाजिक स्तर पर तीन बड़े फ़ैसले किए हैं. ये तीनों विवादास्पद फ़ैसले चुनावी साल में किए गए हैं, इसलिए इनका ख़ास राजनीतिक महत्व है.

इन फ़ैसलों में चुनावों को प्रभावित करने का दम है, क्योंकि इसके दायरे में देश की विशाल आबादी है और इसके पक्ष और विपक्ष में लोगों की बेहद तीखी राय है. इस बारे में विचार करने से पहले जान लेते हैं कि ये तीन बड़े कदम क्या हैं.

पहला, एससी-एसटी एट्रोसिटी प्रिवेंशन एक्ट को फिर से मूल स्वरूप में लाने के लिए कानून बनाने की घोषणा. एससी-एसटी एक्ट 1989 का एक स्पेशल एक्ट है. इसे इसलिए बनाया गया था, क्योंकि भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की धाराओं के बावजूद एससी और एसटी के ख़िलाफ जाति के आधार पर होने वाले अपराध कम नहीं हो रहे थे.

इसमें तत्काल मुकदमा दायर होने और मुकदमा दायर होने के बाद तत्काल गिरफ्तारी का प्रावधान है और अग्रिम जमानत का निषेध है. सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 20 मार्च के फ़ैसले में इन तीनों प्रावधानों को निरस्त कर दिया था. सरकार अब नया कानून लाकर अत्याचार निरोधक कानून को मूल रूप में बहाल करेगी.

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प्रमोशन में आरक्षण

दूसरा, सरकार ने एससी-एसटी कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण दिए जाने के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट में बहस की है. अब तक इस मामले में टालमटोल से काम चलाया जाता रहा था. एससी-एसटी कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण संविधान के अनुच्छेद 16(4) से आया है, जिसमें वंचितों के लिए आरक्षण को समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं माना गया है.

हर स्तर पर एससी-एसटी की पर्याप्त उपस्थिति सुनिश्चित करने का एकमात्र तरीका प्रमोशन में आरक्षण माना गया क्योंकि वे ऊपर की पोजिशन तक नहीं पहुंच पाते. नागराज केस में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि प्रमोशन में आरक्षण देने से पहले इन समुदायों का पिछड़ापन और सेवाओं में इनकी उपस्थिति कम होने का आंकड़े दिए जाएं.

लेकिन सरकार ने अब तक ऐसा आंकड़ा नहीं दिया. इसलिए एक के बाद एक राज्यों में प्रमोशन में आरक्षण देना बंद कर दिया है. और जिनका प्रमोशन इस तरह हुआ है, उन्हें डिमोट कर नीचे के पद पर भेज दिया गया. केंद्र सरकार अब कह रही है कि प्रमोशन में आरक्षण होना चाहिए.

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ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा

तीसरा, केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. इस आयोग का नया नाम सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग होगा.

इस बारे में विधेयक लोकसभा में आम सहमति से पारित हो गया है. अभी तक की स्थिति यह थी कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग संविधान के तहत बने थे.

लेकिन पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा नहीं दिया गया था. इसे सिर्फ पिछड़ी जातियों की लिस्ट बनाने और सुधार के लिए सिफारिश करने का अधिकार था.

नया आयोग अब पिछड़े वर्गों के विकास के लिए भी उपाय सुझाएगा, उनके विकास पर नज़र रखेगा और इन जातियों की शिकायतों की सुनवाई भी करेगा. इसे अब संविधान में जगह दी जा रही है.

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बीजेपी को क्या हासिल?

इनमें से पहले दो फ़ैसले एससी और एसटी समुदाय से जुड़े हैं. भारत की जनगणना, 2011 के मुताबिक इन समुदायों की आबादी क्रमश: 16.6 फ़ीसदी और 8.6 फ़ीसदी है. तीसरा फैसला ओबीसी के बारे में है. ओबीसी की आबादी मंडल कमीशन के मुताबिक 52 फ़ीसदी है.

देश का हर चौथा व्यक्ति या राजनीतिक नज़रिए से देखें तो हर चौथा वोटर एससी या एसटी है. सम्मिलित रूप से इन दो समुदायों का विस्तार अखिल भारतीय है और हर चुनाव क्षेत्र में इनकी उपस्थिति है. ऐसा माना जा रहा है कि बीजेपी के केंद्र में सत्ता में आने के बाद ये समुदाय नाराज हैं.

इसका प्रमाण 2 अप्रैल, 2018 को सामने आया जब एससी-एसटी एक्ट में बदलाव के ख़िलाफ़ दलितों के स्वत:स्फूर्त बंद का देशव्यापी असर नजर आया और कई शहरों में जनजीवन ठप हो गया.

इस बीच, दलितों पर अत्याचार की भी कई घटनाएं सुर्खियां बनती रहीं. इनमें मूंछ रखने से लेकर पशुओं की चमड़ी उतारने पर दलितों की पिटाई से लेकर घोड़ी पर चढ़ने से रोकने, और महिलाओं पर अत्याचार जैसी तमाम घटनाएं शामिल हैं.

इसके अलावा सरकार ने इस बीच में ऐसे तमाम ऐसे काम किए और ऐसी बयानबाज़ियां सत्ता पक्ष की ओर से आईं, जिससे एससी-एसटी और ओबीसी के मन में भी यह शंका पैदा हो गई कि सरकार आरक्षण को खत्म करना चाहती है और संविधान को स्थगित करना चाहती है.

ख़ासकर यूजीसी यानी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा शिक्षकों की नियुक्ति में आरक्षण का आधार यूनिवर्सिटी और कॉलेज की जगह डिपार्टमेंट को बनाए जाने के सर्कुलर से यह शंका प्रबल हो गई कि सरकार आरक्षण को खत्म करना चाहती है क्योंकि डिपार्टमेंट अक्सर इतने बड़े नहीं होते कि वहां आरक्षण लागू हो सके.

अब सरकार ने भी इस सर्कुलर को गलत मान लिया और इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की है.

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इन फ़ैसलों का राजनीतिक मतलब क्या है?

बीजेपी का सार्वजनिक रूप से अघोषित, लेकिन पार्टी संगठन के अंदर घोषित राजनीतिक गणित यह रहा है कि 14.2 फीसदी मुसलमान अगर उसे वोट नहीं देते हैं, तो भी वह जीतने लायक समीकरण बना सकती है.

लेकिन मुसलमानों के बाद अगर एससी और एसटी भी उससे एकमुश्त नाराज हो जाते हैं तो बीजेपी से नाराज तीन बड़े वोटिंग ब्लॉक्स का आंकड़ा 39.4 फीसदी हो जाता है. अगर इसमें ईसाई वोट भी जोड़ दें तो 40 फीसदी से ज्यादा वोट ऐसे हो जाएंगे, जिन्हें लेकर बीजेपी आश्वस्त नहीं होगी कि वे बीजेपी को वोट करेंगे या नहीं.

हर सीट पर माइनस 40 से अपनी रेस शुरू करना एक ऐसा सैद्धांतिक जोखिम है, जो बीजेपी कभी नहीं उठाना चाहेगी.

हालांकि राजनीति में इस तरह के जोड़-घटाव और गुणा-भाग कई बार ग़लत साबित होते हैं, और 2 अप्रैल के भारत बंद का यह मतलब निकालने का कोई कारण नहीं है कि सारे एससी-एसटी बीजेपी से नाराज हैं.

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हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण

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बात सरहद पार

दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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लेकिन इतना तय है कि बीजेपी एससी-एसटी को इतना नाराज नहीं करना चाहेगी कि वे एकमुश्त वोट डालकर बीजेपी को हराने की कोशिश करें. मुसलमान वोटों के साथ बीजेपी का जो रिश्ता है, वैसा रिश्ता बीजेपी एससी-एसटी के साथ नहीं चाहेगी.

बीजेपी मुसलमान वोटरों के अलगाव को अपने लिए अच्छी बात मानकर चलती है क्योंकि इससे उसे हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण में मदद मिलती है. इसलिए बीजेपी बेशक बात विकास वगैरह की करती है, लेकिन यह मंच की बात है.

जमीनी स्तर पर वोट मांगते समय बीजेपी उन मुद्दों को ही फोकस में रखती है जिससे हिंदी-मुसलमान द्वेत यानी बाइनरी मजबूत होती हो. गाय, तलाक, कश्मीर, पाकिस्तान, हलाला, मंदिर, यूनिफॉर्म सिविल कोड, एनआरसी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जिन्ना... ये सब बीजेपी के उपयोगी मुद्दे हैं.

यह तो मुसलमानों की बात है. लेकिन एससी-एसटी या ओबीसी के मुद्दे बीजेपी को परेशान करते हैं. इनके उभरने से हिंदू-मुसलमान का द्वेत टूटता है. हिंदू एकता की खातिर यह जरूरी है कि एससी-एसटी और हिंदू ओबीसी इस खेमे से न छिटकें. बीजेपी सरकार ने जो तीन फ़ैसले किए हैं, वो इसी दिशा में लक्षित हैं.

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सवर्णों की नाराजगी तो नहीं?

यही बात बीजेपी को परेशान कर सकती है. खासकर एससी-एसटी एक्ट और प्रमोशन में आरक्षण ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर आगे बढ़ना बीजेपी के कोर शहरी सवर्ण हिंदू वोटर को नाराज कर सकता है.

इन दोनों खबरों को लेकर सोशल मीडिया में सवर्ण हिंदुओं की प्रतिक्रिया बेहद आक्रामक है. कहां तो उन्हें उम्मीद थी कि बीजेपी अगर पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई तो आरक्षण खत्म हो जाएगा.

आरक्षण खत्म होने की कोई विधिवत घोषणा अब तक नहीं हुई है और दूसरी तरफ प्रमोशन में जो आरक्षण कांग्रेस के शासन काल में कोर्ट द्वारा खत्म हुआ था, वह भी बहाल होता दिख रहा है. ऊपर से एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने जो तथाकथित राहत गैर दलित हिंदुओं की दी थी, सरकार उसे भी छीनती दिख रही है.

सोशल मीडिया में ऐसी प्रतिक्रियाएं भी सवर्ण हिंदू खेमे से आ रही है कि शाहबानो केस में मुसलमानों को खुश करने के लिए जो गलती राजीव गांधी ने की थी, एससी-एसटी एक्ट के मामले में वैसी ही गलती नरेंद्र मोदी कर रहे हैं. लेकिन यह प्रतिक्रिया शिकायत के तौर पर है. यह प्रतिक्रिया निराशा के तौर पर है, जो ऊंची उम्मीदों के गिर कर चूर हो जाने के परिणाम के तौर पर सामने आ रही है.

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बीजेपी और संघ परिवार

सोशल मीडिया में दिख रही सवर्ण हिंदुओं की नाराजगी का क्या बीजेपी के लिए कोई राजनीतिक मतलब है?

शायद नहीं. सवर्ण हिंदू इन तीनों मुद्दों पर बीजेपी से नाराज तो हो सकता है, लेकिन वह इतना नाराज नहीं होगा कि उस गठबंधन में चला जाए, जहां बीएसपी, सपा, आरजेडी, डीएमके जैसी पार्टियां हैं.

हिंदू सवर्ण वोटिंग ब्लॉक अपना मुंह फुलाकर भी बीजेपी और संघ परिवार में बना रहेगा. कम से कम अगले लोकसभा चुनाव तक इस स्थिति में कोई बदलाव आने की संभावना नहीं है.

जैसा कि सोशल मीडिया में कुछ लोग कह रहे हैं कि वे बीजेपी के वोटर थे, लेकिन अब उनका मन नोटा का बटन दबाने का हो रहा है. यानी यह कंट्रोल्ड नाराजगी है. यह अपने रिश्तेदारों से जताई जा रही नाराजगी है कि- कुछ हमारा ध्यान भी रख लो.

बीजेपी की आदर्श राजनीति यह होगी कि वह एससी-एसटी-ओबीसी के लिए कुछ करती हुई नज़र आए, लेकिन वास्तविकता में उन्हें कुछ न दे. इन समुदायों को पंचतीर्थ या कुछ महापुरुषों की जयंती, फोटो, मूर्ति आदि प्रतीक यानी सिंबल देकर उन्हें संतुष्ट किया जाए और राजकाज और शासन का वास्तविक लाभ हिंदू सवर्णों को दिया जाए.

यह काम कांग्रेस काफी समय तक सफलतापूर्वक करती रही है. लेकिन वह पुराना दौर था. क्या बीजेपी 2018 में यह कर पाएगी?

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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